भविष्य की कृषि चुनौतियों से निपटने के लिए शिक्षा और अनुसंधान में बदलाव जरूरी: ICAR महानिदेशक
24 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: भविष्य की कृषि चुनौतियों से निपटने के लिए शिक्षा और अनुसंधान में बदलाव जरूरी: ICAR महानिदेशक – जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण और जैव विविधता में कमी जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि शिक्षा और अनुसंधान को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है। कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने भविष्य के कृषि विशेषज्ञों को इन चुनौतियों के लिए तैयार करने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि कृषि शिक्षा को बदलती जरूरतों के अनुरूप विकसित करना होगा, ताकि कृषि और खाद्य प्रणालियों को अधिक टिकाऊ बनाया जा सके।
डॉ. जाट ने अमेरिका के डेस मोइनेस में विश्व खाद्य पुरस्कार फाउंडेशन के कार्यक्रम के दौरान आयोजित ‘2026 नॉर्मन ई. बोरलॉग इंटरनेशनल डायलॉग’ के मौके पर एक गोलमेज सम्मेलन को संबोधित करते हुए ये विचार रखे। उन्होंने नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS), भारत के अध्यक्ष के रूप में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी।
कृषि शिक्षा और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर
डॉ. जाट ने कहा कि कृषि क्षेत्र की बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए शिक्षा और अनुसंधान के तरीकों में बदलाव जरूरी है। उन्होंने पारंपरिक उत्पादन-केंद्रित कृषि से आगे बढ़कर एकीकृत कृषि-खाद्य प्रणालियों और मूल्य श्रृंखला आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कृषि शिक्षा और उद्योग जगत के बीच मजबूत तालमेल बनाने पर भी जोर दिया। इससे ऐसे कुशल पेशेवर तैयार करने में मदद मिल सकती है, जो उद्योग की जरूरतों को समझने के साथ कृषि क्षेत्र की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान खोज सकें। साथ ही, कृषि-खाद्य मूल्य श्रृंखला में उद्योग की भागीदारी बढ़ने से किसानों को भी सहयोग मिल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग से कृषि अनुसंधान को मिलेगा बढ़ावा
ICAR महानिदेशक ने कृषि क्षेत्र में वैश्विक संस्थानों के साथ लंबे समय से चले आ रहे सहयोग के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के माध्यम से विभिन्न देशों के बीच ज्ञान, अनुभव और वैज्ञानिक उपलब्धियों का आदान-प्रदान किया जा सकता है। इससे कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में नए अवसर विकसित होंगे। उन्होंने कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद के साथ हुए समझौता ज्ञापन का भी उल्लेख किया। इस साझेदारी से कृषि अनुसंधान, क्षमता विकास और ज्ञान साझा करने के क्षेत्र में सहयोग बढ़ने की उम्मीद है।
कृषि नीति निर्माण में शोध और संवाद की भूमिका अहम
डॉ. जाट ने कृषि अनुसंधान एवं विकास से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों के समाधान में नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS) की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने नीतिगत संवाद, नीति पत्रों और संक्षिप्त नीतिगत विवरणों को कृषि क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा और समाधान विकसित करने के महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योग जगत और अन्य संबंधित पक्षों को एक मंच पर लाना जरूरी है। आपसी सहयोग से कृषि क्षेत्र की उभरती चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान तैयार किए जा सकते हैं।
कृषि शिक्षा में वैश्विक अनुभवों को शामिल करने की जरूरत
डॉ. जाट ने कृषि क्षेत्र से जुड़े भारतीय समुदाय को देश के अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों से जोड़ने के प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे नेटवर्क मजबूत होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्ञान और अनुभव साझा करने के अवसर बढ़ेंगे। वैश्विक विशेषज्ञता का लाभ उठाकर कृषि उच्च शिक्षा को बदलती जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ मजबूत साझेदारी कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार सेवाओं को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने विशेष रूप से विकासशील देशों की जरूरतों और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए सामूहिक प्रयास करने का आह्वान किया, ताकि कृषि-खाद्य प्रणालियों को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाया जा सके।
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