PM-KUSUM के नए चरण में किसानों को मिलेगा सौर खेती का अलग कार्यक्रम, नई दिल्ली सम्मेलन में बड़ा एलान
24 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: PM-KUSUM के नए चरण में किसानों को मिलेगा सौर खेती का अलग कार्यक्रम, नई दिल्ली सम्मेलन में बड़ा एलान – केंद्र सरकार किसानों को खेत पर ही सौर बिजली बनाने का मौका देने के लिए एक अलग योजना लाने की तैयारी में है। यह बात केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में हुए सातवें एग्रीवोल्टाइक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस 2026 में कही। उनके मुताबिक आने वाले PM-KUSUM चरण में एग्रीवोल्टाइक्स यानी खेत में फसल के साथ-साथ सौर बिजली बनाने के लिए एक अलग हिस्सा जोड़ा जाएगा।
21 से 23 अक्टूबर तक चले इस आयोजन का उद्घाटन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान, जोशी, कृषि सचिव अतीश चंद्रा, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट की मौजूदगी में हुआ। यह सम्मेलन श्रृंखला पहली बार किसी “ग्लोबल साउथ” देश में आयोजित हुई है।
छोटे किसानों पर फोकस
मंत्री जोशी के अनुसार नई योजना का फायदा खासतौर पर छोटे और सीमांत किसानों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और पंचायतों को मिलेगा। जमीन का मालिकाना हक पूरी तरह किसान के पास ही बना रहेगा।
उन्होंने बताया कि इस मॉडल से किसानों की आय तीन तरफ से बढ़ सकती है — फसल की बिक्री से, बिजली वितरण कंपनियों को बेची गई अतिरिक्त बिजली से, और डीजल पर होने वाले खर्च की बचत से। उनका कहना था कि खेती की आय मानसून और बाजार भाव पर निर्भर रहती है, इसलिए सौर बिजली से किसानों को आय का एक और पक्का जरिया मिल सकता है।
जोशी ने एग्रीवोल्टाइक्स को “एक जमीन, दो फसल” की अवधारणा बताया। कृषि मंत्री चौहान ने कहा कि सौर पैनल लगने से खेती बंद नहीं होनी चाहिए, बल्कि किसान फसल उगाने के साथ-साथ ऊर्जा का भी उत्पादन कर सकते हैं। उन्होंने देश के 15 कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए अलग-अलग, सबूत-आधारित फसल योजना बनाने पर जोर दिया।
नीति पुस्तिका और आंकड़े
सम्मेलन में MNRE और ICAR ने मिलकर भारत में एग्रीवोल्टाइक्स पर एक नीति पुस्तिका जारी की। साथ ही दुनिया भर में एग्रीवोल्टाइक्स को एक जैसे मानकों पर लाने के लिए एक वैश्विक तकनीकी ढांचा भी शुरू किया गया। आयोजन में एक अलग सत्र भी हुआ, जिसमें स्टार्टअप और शोध संस्थानों ने अपने सौर-कृषि मॉडल पेश किए।
सम्मेलन में दी गई जानकारी के मुताबिक भारत में 85 फीसदी से ज्यादा किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है, और औसत जोत का आकार करीब 0.96 हेक्टेयर है। पिछले साल देश में 16.3 गीगावाट की विकेंद्रीकृत सौर क्षमता जुड़ी, जिसमें से 7.6 गीगावाट PM-KUSUM और 8.7 गीगावाट छतों पर लगे सोलर पैनल से आई। PM-KUSUM के तहत अब तक करीब 29 लाख खेती के पंप सौर ऊर्जा पर चलाए जा चुके हैं, जबकि पीएम सूर्य घर योजना के तहत 56 लाख लाभार्थी जुड़ चुके हैं।
डॉ. जाट ने बताया कि देश में मौजूद करीब 14 लाख खेत तालाबों और खेतों की मेड़ों का, खासकर दक्षिण भारत में, उपयोग भी सौर बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है। पुणे में बाएफ के ग्रामीण नवाचार केंद्र में 30 फसलों पर 17 तरह के सौर ढांचों की जांच चल रही है, और अब तक करीब 70 हजार “सूर्य मित्र” प्रशिक्षित किए जा चुके हैं।
एक अध्ययन के मुताबिक भारत की करीब 30 फीसदी खेती वाली जमीन तकनीकी रूप से एग्रीवोल्टाइक्स के लिए उपयुक्त है, जिसकी आधी क्षमता महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में है। क्षेत्रीय अध्ययनों में दोहरे इस्तेमाल से फसल की उपज 10 से 20 फीसदी बढ़ने और पानी की खपत करीब 30 फीसदी घटने का अनुमान बताया गया है। जोशी के मुताबिक इस क्षेत्र से देश में साढ़े तीन लाख के करीब पूर्णकालिक रोजगार बन सकते हैं।
सरकार की ओर से अभी नई योजना के लिए अलग से बजट, लक्ष्य या क्षमता का कोई आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है। अधिकारियों के मुताबिक सौर ढांचे की ऊंचाई, पंक्तियों की दूरी, फसल चयन और कारोबारी मॉडल तय करने के लिए ICAR, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों से मिलने वाले स्थानीय आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि हर इलाके की जरूरत के हिसाब से मॉडल बनाया जा सके।
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