राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

ब्रिटेन में संकट: जेब में पैसा हो तो भी नहीं मिलेंगे दो से ज्यादा आलू, टमाटर या खीरे 

लेखक: राजेश जैन, स्वतंत्र पत्रकार

28 फरवरी 2023, नई दिल्ली: ब्रिटेन में संकट: जेब में पैसा हो तो भी नहीं मिलेंगे दो से ज्यादा आलू, टमाटर या खीरे – अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिलने बाद जहां सात दशक में ही भारत उसको पीछे छोड़कर दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती इकोनॉमी बनकर उभर रहा है,  वहीं जिन अंग्रजों के राज में कभी सूरज नहीं डूबता था, उनके देश में अर्थव्यवस्था में 300 साल की सबसे बड़ी गिरावट आई है। वहां सब्जियों का संकट खड़ा हो गया है। सुपरमार्केट के शेल्फ खाली पड़े हैं और उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं। फ़िलहाल महंगाई चरम पर है। आम लोगों की बात छोड़िए, टीचर्स, स्‍वास्‍थ्‍यकर्मी और पेंशनधारी भी अपने खाने का खर्च नहीं उठा पा रहे और इनको भी फूड बैंक पर निर्भर होना पड़ रहा है। यहां के हालत की तुलना पाकिस्तान से की जा रही है।

ब्रिटेन में सुपर मार्केट में राशनिंग करनी पड़ रही है यानी पैसे देने के बावजूद कोई भी व्यक्ति दो से ज़्यादा आलू, टमाटर, खीरा या अन्य सब्ज़ी नहीं ख़रीद सकता। यह ब्रिटेन के किसी एक सुपरमार्केट की बात नहीं है, बल्कि 4 सबसे बड़े सुपरमार्केट मॉरिसन, अस्दा, एल्डि और टेस्को ने ताजा फल और सब्जियां लेने की सीमा तय कर दी है। पूर्वी लंदन, लिवरपूल और ब्रिटेन के कई हिस्सों में दुकानों से पहले ही फल और सब्जियां गायब हैं। 

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खराब मौसम से हुई फलों और सब्जियों की कमी  

दरअसल हुआ यह कि ब्रिटेन के किसानों ने टमाटर और आलू की उपज पर ध्यान नहीं दिया और जहां से ये चीज़ें आयात की जाती थीं, वे देश भी संकट से जूझ रहे हैं या उत्पादन ज़्यादा न होने के कारण ब्रिटेन को देना नहीं चाहते। सर्दियों में ब्रिटेन खीरे और टमाटर जैसी लगभग 90% वस्तुओं का दूसरे देशों से आयात करता है। इन महीनों में ब्रिटेन केवल 5% टमाटर और 10% सलाद वाले पत्तों का उत्पादन करता है। जिन देशों जैसे स्पेन, साउथ यूरोप, नॉर्थ अफ्रीका, मोरक्को से फल सब्जियां आती हैं, वहां पर इस बार फसल अच्छी नहीं हुई है। खराब मौसम होने की वजह से समुद्री जहाजों के फेरों में भी कमी आई । ऐसे में ब्रिटेन में इन वस्तुओं की काफी कमी हो गई है। सुपरमार्केट के लिए स्टॉक रखना जरूरी है, ऐसे में खरीद की यह लिमिट तय की गई है। 

किसानों से बेरुखी का असर  

ब्रिटिश ग्रोअर्स एसोसिएशन के प्रमुख जैक वार्ड कहते हैं कि लागत बढ़ने और उपज का पर्याप्त पैसा नहीं मिलने के कारण नुकसान के डर से किसानों का फल-सब्ज़ी उगाने के प्रति रुझान काफ़ी कम हो गया है। सरकार रॉयल बोटेनिकल गार्डन को सब्जी उत्पादकों की तुलना में ज्यादा सुविधा दे रही है। वहां काम आने वाली बिजली का खर्च तो सरकार उठाती है, लेकिन किसानों को कोई राहत नहीं दी जाती। ऐसे में सरकार को भी सरकार को सुपर मार्केट्स को ख़ाली शेल्फ़ देखने की आदत डाल लेनी चाहिए। जानकार बताते हैं कि मोरक्को अपनी खाद्य जरूरतों को देखते हुए टमाटर, प्याज और आलू के निर्यात में कमी ला सकता है और समस्या और बढ़ने की आशंका है। 

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पहले ब्रेग्ज़िट फिर कोरोना ने किया बंटाधार 

पिछले कुछ वर्षों से ब्रिटेन आर्थिक  चुनौतियों से जूझ रहा है। 6 साल में 5 प्रधानमंत्री बने हैं। 2016 में ब्रेग्ज़िट पर जनमतसंग्रह के समय से ही कारोबार में निवेश भी स्थिर हो गया। इससे ग्रोथ और कमज़ोर हुई है। 2019 में हुए ब्रेग्जिट (यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के अलगाव) का देश के कारोबार पर बहुत खराब असर हुआ। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रेग्ज़िट से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को सालाना 100 अरब पाउंड का नुक़सान हुआ। अगर ब्रिटेन यूरोपीय संघ का का हिस्सा रहा होता तो शायद उसकी अर्थव्यवस्था में चार फ़ीसदी कम गिरावट आती। दरअसल यूरोपीय संघ दुनिया का सबसे अमीर क्षेत्र है और ब्रेग्जिट के कारण इस ग्रुप के साथ व्यापार और मुश्किल हो गया। लिहाज़ा इसने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आगे बढ़ना मुश्किल कर दिया। 
बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के एक पॉलिसीमेकर ने कहा कि पहले यूरोपीय संघ के कामगार बेरोकटोक ब्रिटेन आते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। इससे हॉस्पिटालिटी, एग्रीकल्चर और केयर सेक्टर के लिए पर्याप्त कर्मचारी मिलना कठिन हो गया। इससे अर्थव्यवस्था को निवेश में 29 अरब पाउंड के नुक़सान झेलना पड़ा। ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स के अनुसार साल 2020 में ब्रिटेन के सकल घरेलू उत्पाद में 11 फीसदी की बड़ी गिरावट आई। यह आंकड़ा पूर्वानुमानों की तुलना में बहुत ज्यादा था। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1709 के बाद से देश की जीडीपी में यह सबसे बड़ी गिरावट रही। इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध, जियोपॉलिटिक्स, ऊर्जा और खाद्य सामग्रियों के बढ़ते दाम और ख़राब मौसम ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को लगातार कमज़ोर किया।

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बढ़ेगी ऋषि सुनक की परेशानी 

ब्रिटिश इतिहास में सबसे कम अवधि तक प्रधानमंत्री के रूप में काम करने वाली लिज ट्रस तक अपने उत्तराधिकारी ऋषि सुनक के खिलाफ मोर्चा खोल चुकी है। द संडे टेलीग्राफ अखबार में  एक लेख में उन्होंने लिखा- वह खुद प्रधानमंत्री के रूप में चीजों को बदलना चाहती थीं लेकिन राजनीतिक समर्थन की कमी के साथ-साथ एक शक्तिशाली आर्थिक प्रतिष्ठान द्वारा मुझे अपनी नीतियों को लागू करने का मौका नहीं दिया गया। ट्रस ने कहा कि 45 बिलियन पाउंड के अनफंडेड मिनी-बजट के बाद ब्रिटेन में आर्थिक संकट आया, लेकिन अब सुनक के कार्यकाल में देश मंदी की चपेट में आ गया है। उधर बोरिस जॉनसन, जो प्रधानमंत्री के रूप में ट्रस से पहले थे, फिर से दौड़ में शामिल होने के लिए जोरदार प्रयास कर रहे हैं। गत माह  जॉनसन ने यूक्रेन का औचक दौरा किया और वहां के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की से मुलाकात की। ब्रिटिश दूतावास के माध्यम से व्यवस्थित नहीं किया गया था और इसे सुनक को कमजोर करने के कदम के रूप में देखा जा रहा है।

देश को उबारना सुनक सरकार के लिए बड़ा टास्क

यह बात और हैं कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्रियों बोरिस जॉनसन और लिज ट्रस के कार्यकाल में कीमतें आसमान को छूने लगी थी। जीवन यापन का खर्च बढ़ता गया। लिज ट्रस की आर्थिक नीतियां विफल रहीं। लिज ट्रस के टैक्स कटौती के फैसले से न सिर्फ पाउंड बल्कि बान्ड मार्किट प्रभावित हुई और ब्याज दरों में बढ़ोतरी होती गई। अर्थव्यवस्था लगातार सिकुड़ती गई और उत्पादन और सेवाओं दोनों में गिरावट आई। जीडीपी में गिरावट ने भी कारोबारियों की चिंताओं को बढ़ा दिया। पिछले साल हुए चुनाव में भारतीय मूल के ऋषि सुनक ने प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल कर उन्होंने देश को आर्थिक संकट से निकालने का संकल्प लिया था। सुनक को आर्थिक मामलों की अच्छी समझ वाला माना जाता है। लेकिन नया साल शुरू होते ही उनके सामने चुनौतियां ही चुनौतियां खड़ी हो गईं। अब जब कि देश की अर्थव्यवस्था संकट में है और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी इस साल मंदी के संकेत दिए हैं । इससे देश को उबारना सुनक सरकार के लिए बड़ा टास्क है । 

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