कोरोना हो या किसान सब पर सेंकी जा सकती हैं राजनीतिक रोटियाँ

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  • सुनील गंगराडे

कोरोना हो या किसान सब पर सेंकी जा सकती हैं राजनीतिक रोटियाँ – कृषि विधेयकों के विरोध में विपक्षी दल संसद में सड़क छाप व्यवहार करते हैं, पर सड़क पर संसद लगाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के एंकर, मंडी में खड़े हो कर, ट्रैक्टर पर चढ़ कर, बैलगाड़ी में बैठकर किसानों की राय ले रहे हैं, जैसे इन कृषि एक्ट को लागू कर दिया तो खेती चौपट हो जाएगी, किसान बरबाद हो जाएगा। ये आलेख छपने और वेबसाइट पर जाने तक उनका ‘सारा’ ‘श्रद्धा’ भाव ‘दीपिका’ हो जायेगा किसान पीछे रह जायेगा।

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भेडिय़ा आया, भेडिय़ा आया की तजऱ् पर भयभीत करते हैं इलेक्ट्रॉनिक चैनल, सारे राजनीतिक दल और अपनी सत्ता, अपने स्वार्थ का उल्लू सीधा करते हैं। हमारे देश में जहाँ 65 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है, खेती हमारा जीवन जीने की शैली है, साक्षरता ग्रामीण भारत की लगभग 60 प्रतिशत है, तो वहाँ किसान बेचारा बहुत सॉफ़्ट टार्गेट है सभी के लिए। जिस राजनीतिक दल को मुद्दों का अभाव होता है, हिन्दुस्तान में खेत-किसान की बात कर वाद-प्रतिवाद, विवाद की अंतहीन श्रृंखला खड़ी करता है। मुद्दई किसान हाशिये पर खड़ा रह जाता है, राजनेता अपना कुर्ता झटकारते आगे बढ़ जाता है। और राजनीतिक दल भी ये बवाल क्यों न खड़ा करें। देश की लोकसभा में 543 सीटों में से केवल 342 सीटें ग्रामीण क्षेत्र से आती हैं। इसमें इनका दोष नहीं है। खेती किसानी की समस्याएं अनेक रूप में, कई आकार में, विभिन्न प्रकार में हाजिर स्टॉक में बनी रहती हैं। सुरसा की तरह विशाल भी हो जाती हैं। विचित्र विडम्बना ये है कि ये किसान की दिनचर्या और ग्रामीण जीवन का अनिवार्य अंग बन चुकी हैं।

पिछले सप्ताह संसद ने कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक, 2020 और कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 को लोकसभा ने (17 सितंबर, 2020) को पारित कर दिया था जबकि राज्य सभा ने 20 सितंबर को इस विधेयक को पारित कर दिया। वैसे कृषि से जुड़े इन विधेयकों के शीर्षक में भी ऐसे फ्यूजन याने मिश्रित शब्दों का जाल बनाया है कि किसान की उपज को बेहतर दाम मिलेंगे, किसान की खेती बचेगी या सरकार किसान को संरक्षण देगी या उसकी फसल के दामों को पाताल जाने से इस कानून के तहत रोकेंगे। सरकार द्वारा बनाये गए किसी भी कानूनी प्रावधानों में परंपरानुसार कानूनी, विधिक शब्दों का घटाटोप ऐसा होता है कि केवल वकील ही बता सकता है कि लागू होने वाले इस कानून में किसान खेत उसके पास ही रहेगा या लँगोटी भी उसकी चली जाएगी। ये बाद की बात है। पर राजनैतिक दलों के हाथों में खिलौना बन जाते हैं किसान। मंचों से, माइक से, मन की से, ‘अन्नदाता’ कह-कह कर इमोशनल ब्लैक मैलिंग तो खूब हो गयी। देश में सभी राजनीतिक दलों का 85 प्रतिशत वोट बैंक तो ग्रामीण क्षेत्र और किसान ही है। आज की स्थिति में कोई भी राजनीतिक दल किसानों का अहित कर, उनको नाराज कर, अपनी सत्ता, अपनी कुर्सी खोने का जोखिम मोल नहीं ले सकता।

सरकार को मंडी एक्ट पर आम राय बनवानी थी, लोगों से सुझाव, आपत्ति आमंत्रित करना थी, पर एकला चलो की नीति और अपने-अपने राजनीतिक कमिटमेंट के कारण संभव नहीं हुआ। हालांकि मंडी कानूनों में सुधार का ये प्रस्ताव बरसों से हर सरकार के सामने रखा होता था। पर राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में, किसानों की कर्ज माफी जैसे लालीपॉप नुस्खों में सरकारें अपना मतलब साध लेती थीं। देश के 100 शहरों के लिए स्मार्ट सिटी, 7 बुलेट ट्रेन, सैटेलाइट टाउन की स्थापना तो सरकार तत्काल सोचती है पर गाँवों में रहने वाली देश की दो तिहाई आबादी के लिए जमीनी स्तर पर गंभीर, स्थायी और समुचित प्रयासों का अभाव रहता है। आज किसान की समस्या उसकी उपज का रिकॉर्ड उत्पादन है। जब मंडी में अनाज पहुँचता है तो भारी आवक के कारण फसल के दाम नीचे चले जाते हैं। इन पाताल जाते भावों को थामने किसी भी सरकार ने अभी तक गंभीर होकर दीर्घकालिक निवेश नहीं किया। किसानों को एमएसपी का झुनझुना और सरकारी खरीद का मरहम भी स्थाई समृद्धि नहीं दे पाया।

1981 से लेकर 2014 तक कृषि और सिंचाई के क्षेत्र में सरकारी निवेश क्रमश: औसतन 4.6 और 4.0 प्रतिशत रहा है, जो विकास के तुलनात्मक स्तर पर चीन की निवेश दर से भी बहुत कम है। अपनी उपज के अच्छे दाम, गाँव की अच्छी सड़कें, वेयरहाउस, भंडारण, सिंचाई सुविधाएँ ये सरकारें इस दिशा में काम करें तो बेहतर होगा। गाँव, खेत की सड़कें अच्छी होंगी तो किसान अपनी उपज को दूर की मंडी जहाँ उसको दाम अच्छे मिलेंगे वहां ले जा सकता है। 60 वर्ष पूर्व की जरूरतों को देखते हुए देश में अधिसूचित कृषि मंडियों की स्थापना हुई, लगभग 7000 से ज़्यादा मंडियां देश में हैं। एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक गाँव के हर 5 किलोमीटर के दायरे में मंडी होना चाहिए थी। खेती का रूप, स्वरूप बदल गया। नकदी फसलों, बागवानी फसलों के अनुपात मे बढ़ौतरी हुई , आवक बढ़ गई। पर जो न बदला वो मंडियों का कारोबार, व्यापारियों का किसानों से व्यवहार, किसानों के लिए सुविधाएं शून्य।

इन कृषि कानूनों के अस्तित्व में आने के बाद यदि समय समय पर संशोधन की आवश्यकता होगी तो कोई भी सरकार हो, उसे प्राथमिकता से बदलाव लाने ही होंगे। वैसे भी केन्द्र सरकार कह रही है कि इन एक्ट के लागू होने और अमल में आने पर यदि जरूरत हुई तो आवश्यक संशोधन हो सकते हैं। जख्म लाइलाज बन नासूर न हो जाये, तो चीरा लगाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। कृषि क्षेत्र की समृद्धि, किसानों की तरक्की के लिए ये कृषि विधेयक कितने कारगर होते हैं, ये भविष्य के गर्भ में है।

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