खरीफ फसलों में खरपतवार प्रबंधन

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खरीफ फसलों में खरपतवार प्रबंधन

खरीफ फसलों में खरपतवार प्रबंधन – विश्व में तीन लाख से अधिक पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमे से केवल तीन हज़ार जातियां आर्थिक रूप से फायदेमंद पाई गई हैं। जब आर्थिक महत्व की प्रजातियाँ अर्थात् फसलें खेतों में उगाई जाती है, तो उनके साथ बहुत से अवांक्षित पौधे भी स्वत: उग जाते है जो फसल उत्पादन और उत्पाद की गुणवत्ता को भारी क्षति पहुंचाते है। इन्ही अवांक्षनीय पौधों को हम खरपतवार कहते है। खरीफ मौसम में खरपतवारों का प्रकोप बहुत अधिक होता है।

फसलों की पैदावार में विशेष तौर पर खरपतवार, कीट, पादप रोग अधिक नुकसान पहुंचाते है। कृषि उत्पादों के कुल वार्षिक हानि में खरपतवारों द्वारा लगभग 45 प्रतिशत, कीटों द्वारा 30 प्रतिशत, पादप रोगों द्वारा 20 प्रतिशत तथा अन्य कारकों द्वारा 5 प्रतिशत क्षति होती है।

खरपतवार नियंत्रण के लिए खरपतवारों की जानकारी होना अति आवश्यक है। वर्षा आधारित उपजाऊ भूमि में प्राय: एकवर्षीय एवं बहुवर्षीय खरपतवार अधिक उगते हैं, जबकि निचली भूमियों में एकवर्षीय घासें, मोथावर्गीय एवं चौड़ी पत्तियों वाले खरपतवार पाए जाते हैं। खरीफ फसलों में पाए जाने खरपतवारों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार : ये दो बीज पत्रीय पौधे होते हैं, जिनकी पत्तियां प्राय: चौड़ी होती हैं। जैसे सफेद मुर्ग, कनकौवा, जंगली जूट, जंगली तम्बाखू आदि।

संकरी पत्ती वाले खरपतवार : इसको घास कुल के खरपतवार भी कहते हैं। इस कुल के खरपतवारों की पत्तियां पतली एवं लम्बी होती हैं। जैसे सांवा, दूब घास आदि।

मोथावर्गीय खरपतवार: इस कुल के खरपतवारों की पत्तियां लम्बी एवं तना तीन किनारों वाला ठोस होता हैं। जड़ों में गांठें पाई जाती हैं। जैसे मोथा

फसलों के मुख्य खरपतवार

धान के प्रमुख खरपतवार: सावा (इकाइनोक्लोआ कोलोना), कोदो (एल्युसिन इंडिका), कनकौआ (कोमेलिना बेंघालेंसिस), जंगली जूट (कार्कोरस एक्यूटेंगूलस), मोथा (साईंप्रस), जंगली धान आदि।

मक्का, ज्वार, बाजरा : दूबघास (साइनोडॉन डेक्टिलोन), गुम्मा (ल्यूकस अस्पेरा), मकोय (सोलोनम नाइग्रम),कन्कौआ, जंगली जूट, सफ़ेद मुर्ग, सावा, मोथा आदि।

खरीफ की दलहनी एवं तिलहनी फसलें: महकुआ (एजिरेटम कोनीज्वाइडस), हजार दाना (फाइलेंथस निरुरी), दुद्धी (यूफोरबिया हिरटा), कन्कौआ, सफ़ेद मुर्ग, सवां, मोथा आदि।

खरपतवारों से होने वाली हानियाँ

खरपतवारों के प्रकोप से फसल वृद्धि और उपज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। समय रहते इन पर काबू नहीं पाया गया तो ये फसलों की पैदावार में लगभग 10-85 प्रतिशत तक कमीं कर सकते है, लेकिन कभी-कभी यह कमी शत-प्रतिशत तक हो जाती है। दरअसल खरपतवार फसल के साथ स्थान, हवा, प्रकाश, पानी और भूमि में डाले गए पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते है। चूँकि फसलों की अपेक्षा खरपतवार शीघ्र बढऩे वाले पादप होते है जिसके कारण वे भूमि से नमी और पोषक तत्वों का शीघ्रता से अवशोषण कर लेने से फसल को आवश्यक जल और पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिसके फलस्वरूप फसलों की वृद्धि और विकास अवरुद्ध होने से उपज में कमी हो जाती है।

खरपतवार फसल के ऊपर छाया भी करते है जिसके कारण फसल को पर्याप्त प्रकाश और हवा नहीं मिलने से उनमे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया ठीक से संपन्न नहीं हो पाती है जिसका उपज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा खरपतवार बहुत से कीट और रोगों को आश्रय प्रदान करते है जिसके कारण फसलों में कीट-रोग का अधिक आक्रमण होता है। खरपतवारों की उपस्थिति से फसल उत्पाद की गुणवत्ता खराब होती है जिससे उत्पाद के मूल्य में भी गिरावट आ जाती है। मनुष्य और जानवरों के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है। नदी और तालाबों में प्रदूषण फैलाते हंै और सिंचाई तथा जल निकास में भी बाधा पहुंचाते हैं।

खरपतवार नियंत्रण का उचित समय

खरपतवारों के प्रकोप के कारण होने वाली हानि की सीमा कई बातों पर निर्भर करती है। फसलों में किसी भी अवस्था में खरपतवार नियंत्रण करना समान रूप से आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं होता है। इसीलिए प्रत्येक फसल के लिए खरपतवारों की उपस्थिति के कारण सर्वाधिक हानि होने की अवधि निर्धारित की गई है। इस अवस्था/अवधि को क्रांतिक अवस्था कहते हैं। अत: समय पर खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रत्येक फसल के लिए क्रांतिक अवस्था तथा खरपतवार नियंत्रण न करने पर होने वाली क्षति की सीमा भी दी गई है।

खरपतवारों की रोकथाम के उपाय

सफल फसलोत्पादन के लिए आवश्यक है की खरपतवारों की रोकथाम सही समय पर करना चाहिए जिसके लिए निम्न तरीके अपनाए जा सकते है।

निवारण विधि : इस विधि में वे सभी शस्य क्रियाएं शामिल है जिनके माध्यम से खेतों में खरपतवारों के प्रवेश को रोका जा सकें जैसे उन्नत किस्मों के प्रमाणित बीजों का प्रयोग, अच्छी प्रकार से सड़ी गोबर खाद और कम्पोस्ट खाद का प्रयोग, ग्रीष्मकालीन जुताई, खेती की तैयारी, सिंचाई नालियों की साफ़-सफाई आदि।

यांत्रिक विधि: खरपतवारों पर नियंत्रण पाने की यह सरल और प्रभावकारी विधि है। फसल की प्रारंभिक अवस्था में यानि खरपतवार प्रतिस्पर्धा के क्रांतिक समय (सारिणी-1) में फसलों को खरपतवार प्रकोप से मुक्त रखना जरूरी है। सामान्यत: दो निराई-गुड़ाई, पहली बुआई के 20-25 और दूसरी 45 दिन बाद करने से खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।

मृदा सौरीकरण : इस तकनीक के अंतर्गत विभिन्न मोटाई की पारदर्शी पोलिथाईलिन शीट (50-100 मिलीमाईक्रोन) को समतल नमीयुक्त मिट्टी की ऊपरी सतह पर फसल की बोवाई के पहले मई के महीने में 4-6 सप्ताह तक फैलाकर मिट्टी की ऊपरी सतह का तापमान बाह्य तापमान की तुलना में 8-120 से. ग्रे. ज्यादा किया जाता है। इससे मिट्टी की ऊपरी सतह में जमा खरपतवारों की बीजों के अंकुरण होने की शक्ति कम या निष्क्रिय हो जाती है। इसके आलावा कुछ हानिकारक कीड़े, सूत्रकृमि अन्य नाशक भी नष्ट हो जाते हैं। यह तकनीक पौधशाला में पौध तैयार करते समय खरपतवारों को नियंत्रित करने में बहुत ही प्रभावशाली हैं।

जीरो टिलेज तकनीक: इस तकनीक में खेत में केवल बोवाई के लिए ही विशेष मशीन (जीरो टिलेज मशीन) द्वारा खाद तथा बीज को डाला जाता है। उससे पहले खेत में कोई क्रिया नहीं की जाती है। यह तकनीक गेहूँ की फसल में प्रयोग की जाती है। तकनीक से किसानों को लगभग 2500 रूपये प्रति हेक्टेयर कम लागत आई है और इससे गुल्ली डंडा नामक खरपतवार की संख्या कम होती है।
रसायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण : खेती में लागत कम करने के लिए रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण एक कारगर उपाय है, इसमें समय, श्रम और पैसा कम लगता है।

शाकनाशी रसायनों के प्रयोग में सावधानियां :

  • फसल के अनुसार उपरोक्त शाकनाशी रसायनों का घोल तैयार करने के लिए पानी की सही मात्रा (500-600 लीटर/हेक्टर) का उपयोग करना चाहिए।
  • छिड़काव हेतु नैपशैक स्प्रेयर के साथ फ़्लैट फैन नोज़ल का प्रयोग करें।
  • शाकनाशी रसायनों की फसल अनुसार अनुशंसित मात्रा का ही प्रयोग करें तथा शाकनाशी रसायनों की उपयोग समाप्ति तिथि का भी ध्यान रखें।
  • वर्षा की संभावना होने पर शाकनाशियों का छिड़काव न करें।
  • मिश्रित फसलों में रसायनों का चयन फसलों के मुताबिक ही करें।
  • शाकनाशी रसायनों को उचित समय पर छिड़काव करें।
  • शाकनाशियों के छिड़काव में फ्लैट फेन अथवा जेट नोजल का ही प्रयोग करें।
  • अवर्णात्मक शाकनाशियों के घोल में चिपकने वाले पदार्थो को मिलायें।
  • शाकनाशी रसायनों का छिड़काव पूरे खेत में एक समान हो।
  • शाकनाशी रसायनों के छिड़काव करते समय आपका चेहरा हवा के विपरीत दिशा में नहीं हो।
  • छिड़काव के समय मौसम साफ हो।
  • किसी भी फसल में खरपतवार नाशी प्रयोग करते समय खेत में नमीं हो।
  • फसल-खरपतवार प्रर्तिस्पर्धा के समय हर हाल में खेत खरपतवार मुक्त हो तभी बांक्षित फसलोत्पादन और आमदनी प्राप्त हो सकती है।
  • खरपतवारनाशी दवाएं स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक (जहर) होती है अत: इनका प्रयोग सावधानी पूर्वक करें।
  • छिड़काव करते समय हाथों में दस्ताने, चेहरे पर नकाब आँखों पर चस्मा और पैरों में लम्बे जूते पहनना चाहिए,जिससे शाकनाशी रसायनों के हानिकारक प्रभाव से बचा जा सके।
  • छिड़काव समाप्त होने के बाद साबुन से अच्छी तरह हाथ, मुंह अवश्य धो लें, अच्छा हो यदि स्नान भी कर लें क्योंकि सभी रसायन जहरीले होते हैं।
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