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फसल की खेती (Crop Cultivation)

गेहूं में खरपतवार प्रबंधन समस्यायें एवं निदान

  • डॉ. आर. पी. श्रीवास्तव,
    पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी, उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद्, शाहजहांपुर, उ.प्र.
    डॉ राजिंदर प्रसाद
    Former Assistant Director General ( Agril. Extension), Indian Council of Agricultural Research,
    Min. of Agriculture & Farmer’s Welfare, Govt. of India

 

6 दिसंबर 2021, गेहूं में खरपतवार प्रबंधन समस्यायें एवं निदान –

गेहूं की फसल में खरपतवार प्रबंधन – गेहूं  भारत के खाद्यान्न में चावल के बाद दूसरे नंबर की महत्वपूर्ण फसल है भारत में मुख्यरूप से इसकी अधिकतम खपत उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भाग में होती है। आजादी के बाद भारत में गेहंू की उपज मात्र 663 कि.ग्रा./ हेक्टेयर थी, इस कारण भारत में गेहंू की आपूर्ति विदेश से होती थी। हरित क्रांति के बाद अर्थात् 1960 में गेहूं  की उन्नतशील जातियों के प्रादुर्भाव के साथ भारत उत्तरोत्तर गेहूं  में आत्मनिर्भर होने लगा। आज भारत 870 लाख टन उपज प्राप्त कर विश्व में चायना के बाद दूसरे पायदान पर है। आज हम 3533 कि.ग्रा./हेक्टेयर उपज प्राप्त कर रहे हंै।

भारतवर्ष में उत्तर प्रदेश सर्वाधिक 252.2 लाख टन उपज के साथ प्रथम पायदान पर है तथा पंजाब 157.8 लाख टन तथा मध्य प्रदेश 141.8 लाख टन के साथ क्रमश: दूसरे एवं तीसरे स्थान पर है। जहाँ तक उत्पादकता का प्रश्न है उत्तर प्रदेश सर्वाधिक क्षेत्रफल होते हुए इसकी उत्पादकता 3432 किलोग्राम/हेक्टेयर है जो राष्ट्रीय मानक से नीचे है पर वही पंजाब 5188 कि.ग्रा./हेक्टेयर उत्पादकता के आधार पर अन्य सभी प्रदेशों से ऊपर है।

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किसी भी फसल की अधिकतम उपज मुख्यरूप से फसल सुरक्षा पर निर्भर करती है। इस दिशा में जैविक एवं अजैविक कारकों में हम जैविक कारकों को नियंत्रित कर अधिक से अधिक उपज प्राप्त कर सकते है। जैविक कारकों में खरपतवार प्रबंधन और रोग एवं कीट प्रबंधन मुख्य है। यहाँ खरपतवार प्रबंधन के विषय में चर्चा करेंगे।
अन्य फसलों की भांति गेहंू की फसल में भी खरपतवारों से काफी नुकसान होता है। गेहंू की फसल में पाये जाने वाले खरपतवार मुख्यतया कृष्णनील, सत्यानाशी, प्याजी, जंगली जई, भृंग, बथुआ, कटहली, हिरन खुरी, गजरी, मटरी, मैना, मेथा, मंडूसी, बनघनिया, गेला आदि हैं।

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मंडूसी अथवा गुल्ली डंडा अथवा गेहूं  का मामा खरपतवार, गेहंू की फसल का मुख्य खरपतवार है। इसको यदि समय से नियंत्रित नहीं किया गया तो इसकी संख्या एक वर्ग मीटर में लगभग 2000 से 3000 तक पहुँच जाती है परिणामत: किसान इसे गेहंू की फसल को चारे के रूप में प्रयोग करने को बाध्य हो जाते है। 1980 के दशक में आइसोप्रोटोरान खरपतवार नाशक द्वारा इस खरपतवार के नियंत्रण के लिए प्रयोग किया जाता रहा लेकिन बाद के वर्षो में मंडूसी इस खरपतवारनाशक के प्रति प्रतिरोधी हो गयी तथा इस दवा से नियंत्रित नहीं होने लगी।

गेहूं की फसल में तीन प्रकार से किसान खरपतवारों का नियंत्रण करते हैं –

1. कर्षण क्रियाओं द्वारा
2. यांत्रिक विधि द्वारा
3. खरपतवारनाशक रसायन द्वारा

ऊपर की दोनों विधियों (कर्षण/यांत्रिक) द्वारा खरपतवारों का नियंत्रण करने में किसान को धन एवं श्रम की व्यवस्था करने में काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। अत: किसान खरपतवारनाशकों द्वारा गेहंू की फसल में खरपतवार नियंत्रण करने की दिशा में आकर्षित होते जा रहे हैं। भारत में अधिकांश पेस्टिसाइड कंपनियां खरपतवार नियंत्रण हेतु उत्तम से उत्तम रसायनों को लेकर बाजार में आ गई है, जिसके सही समय पर तथा सही मात्रा के प्रयोग से खरपतवार का नियंत्रण प्रभावी रूप से होने लगा है तथा खरपतवारों से होने वाली हानियों से किसान को छुटकारा मिल रहा है। किसान गेहंू की भरपूर उपज प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हैं।
किसानों द्वारा खरपतवारनाशकों के प्रयोग के सम्बंध में कुछ आवश्यक सुझाव/ जानकारियां इस शोध लेख में देने का प्रयास किया गया है। निम्नलिखित खरपतवारनाशक गेहंू के खेत में खरपतवारों को नियंत्रित करने में उत्तम पाये गये हैं –

गेहूं  में खरपतवारनाशी का प्रयोग दो तरह से किया जा सकता है –

  • फसल और खरपतवार जमने से पहले (प्री-एमरजेंस)
  • खरपतवार जब दो से चार पत्ती में हों (पोस्ट-इमरजेंस)
  • फसल और खरपतवार जमने से पहले (प्री-इमरजेंस)

गेहूं  बिजाई के तुरंत बाद पेंडीमिथालिन 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल कर छिडक़ाव करने से उगती हुए खरपतवारों का नाश किया जा सकता है।
पेंडीमिथालिन के प्रयोग से शुरूआती पहले फसल की मंडूसी/गेहंू का मामा एवं बथुआ का नियंत्रण किया जा सकता है।

खरपतवार जब दो से चार पत्ती में हो (पोस्ट-इमरजेंस)

गेहूं में पोस्ट-इमरजेंस खरपतवारनाशी का प्रयोग पहली सिंचाई (बुवाई के 21 दिन बाद) के 7 से 10 दिन बाद जब खेतो में पैर टिकने लगे और खरपतवार 2 से 4 पत्ती अवस्था में हो तभी किया जाना चाहिये।

सावधानियाँ-

  • रसायनिक खरपतवारनाशी (उगने से पहले या उगने के बाद) का प्रयोग तब करें जब मिट्टी में नमी हो।
  • खरपतवार उगने के बाद (पोस्ट-इमरजेंस) के खरपतवारनाशी का प्रयोग तभी करें जब खरपतवार-नाशी 2 से 4 पत्ती अवस्था में हों।
  • किसी भी खरपतवारनाशक का छिडक़ाव मृदा नमी की अवस्था में ही किया जाय।
  • मंडूसी की 2-3 पत्ती की अवस्था पर ही छिडक़ाव करें अन्यथा अनुकूल परिणाम प्राप्त नहीं होंगे।
  • साफ़ मौसम में फ्लैट फेन/ फ्लड जेट नोजल से छिडक़ाव करें
  • खरपतवारनाशी रसायनों का समान रूप से छिडक़ाव करें।
  • सल्फोसल्फ्यूरॉन का छिडक़ाव उस खेत में कदापि न करें जिसमें कोई अन्य फसल ली जा रही हो।

गेहूं  का बीज उपचार –

गेहूं की बिजाई से पूर्व गेहूं  के बीज का बीजोपचार उत्पादन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण होता है। इसके लिये वीटावैक्स अल्ट्रा एक उत्तम फफूंदीनाशक है इसमें दो शक्तिशाली फफूंदीनाशक कार्बोक्सिन एवं थाइरम का यौगिक है। इसके उपचार से बीज को कई प्रकार के फफूंदीजनक बीमारियों से बचाया जा सकता है तथा अच्छे जमाव के साथ अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

80-120 मि.ली. फफूंदीनाशक 200 मि.ली. पानी में घोल लिया जाता है। 40 कि.ग्रा. बीज को एक प्लास्टिक चादर पर फैलाकर दवा के मिश्रण को समान रूप से छिडक़ दिया जाता है तथा चादर के चारों कोनों को पकडक़र अच्छी प्रकार से दवा को बीज में मिला दिया जाता है। छांव में रखकर बीज को सुखा लिया जाता है।


सोत : कृषि विभाग, भारत सरकार।