जल है तो कल है

रबी के मौसम में खेती और सिंचाई का चोली-दामन का साथ है। देश में विभिन्न सिंचाई परियोजना के तहत छोटे, मध्यम तथा बड़े – बड़े बांध – बांधकर वर्षा जल का संचय किया जाकर उसका सद्उपयोग रबी की फसलों की प्यास बुझाने में किया जाने लगा। जहां कहीं भी बांध बंधे वहां नहरों का मकडज़ाल बिछाया गया ताकि अधिक से अधिक क्षेत्र में पानी पहुंचाया जा सके बांध के उपलब्ध जल और सिंचित क्षेत्र का हिसाब जो बांध बनाते समय तय किया गया था आज बीसों साल बाद भी उपलब्ध जल एवं आपेक्षित सिंचित क्षेत्र की दूरी बनी हुई है। जल उपयोगिता का आंकड़ा आज भी 60-65 प्रतिशत के आंकड़े से ऊपर नहीं बढ़ पाया है। अर्थात् निर्धारित क्षेत्र में पानी आज भी पहुंच के बाहर जिसके अनेकों कारण हंै जैसे जल का रिसाव, नहरों का रखरखाव और सबसे प्रमुख जल का बराबरी के वितरण में विसंगतियां हैं जो पहले थी आज भी जस की तस है हालांकि जिला स्तर पर जल उपभोक्ता समितियां हंै। ग्रामीण स्तर तक सिंचाई पंचायत है परंतु इनकी क्रियाशीलता अपेक्षा से कम होने से आज भी जल उपभोक्ता का प्रतिशत लक्ष्य के नीचे है। जल ही जीवन हैं परंतु जल ही विष का काम कर सकता  है यदि उसका उपयोग विवेक तथा निर्धारित मापदंडों के आधार पर ना किया गया हो तो आज भी कृषकों की यह आमधारणा है कि जितना अधिक जल उतनी अधिक उपज प्राप्त होगी किंतु यह सोच सत्य से काफी दूर है। पानी उतना ही लाभदायक होगा जितना पौधे की आवश्यकता है। अधिक जल मिट्टी से रिस कर गहराई में चला जाता है जहां पौधों की सक्रिय जड़ उसके अवशोषण के लिये उपलब्ध नहीं होती इस प्रकार अंधाधुंध अनियंत्रित सिंचाई का 2/3 जल बेकार होकर नष्ट हो जाता है केवल 1/3 जल का ही उपयोग हो पाता है तो क्या हम यह निर्धारित नहीं कर सकते हैं कि 1/3 जल का ही उपयोग करके 2/3 जल बचा लें ताकि अन्य जरूरत के समय उसका उपयोग हो सके अथवा असिंचित क्षेत्र में उसका फैलाव होकर जल उपयोगिता का प्रतिशत बढ़ा लें विशेषकर काली गहरी भूमि के क्षेत्रों में इस प्रकार का अनियंत्रित जल भूमि के स्वास्थ्य पर विपरीत असर करता है। सपाट खेत ना ही हो तो पोषक तत्वों को बहाकर निचली सतह पर ले जायेगा जो पौधों की पहुंच के बाहर होगा  और पौधों को पोषक तत्वों का टोटा पडऩे लगेगा देखने में आया होगा खेतों में पीलापन फैलने लगता है। मिट्टी के कण चिपक जाने से और देर तक यह स्थिति  बनी रहने से पौधों को वायु के प्रवाह में भी रूकावट पैदा होने लगेगी और फसल की बढ़वार पर भी विपरीत असर होता है। लगातार यह स्थिति यदि बनी रहेगी तो भूमि  से लवण खेत में जमा होकर लवणीयता की स्थिति पैदा होने लगती है।  देश के पंजाब , हरियाणा तथा राजस्थान प्रांतों में भूमि का ऊसरपन पैर पसारते जा रहा है जिसका कारण असंतुलित उर्वरक उपयोग के साथ-साथ अनियंत्रित जल उपयोग है। बुआई के तुरंत बाद खेत में बंड फारमर से बंड तैयार किया जाना चाहिये आज इस यंत्र के क्रम के लिये अनुदान की पात्रता उपलब्ध है। कृषकों को भय रहता है कि बंड फारमर के उपयोग से फसल में पौध संख्या कम हो जायेगी ऐसी बात नहीं है बंड फारमर से बंड बनाकर सिंचाई नालियों का सुधार करके कुलावा से जल प्रवाह किया जाये। पहली पट्टी में जल प्रवाह से 75 प्रतिशत क्षेत्र सींचने के बाद नाली बंद करके तीसरी पट्टी में जल छोड़ा जाये इस प्रकार एक पट्टी छोड़ विधि से जल प्रवाह करने से शनै: -शनै: पानी पूरे खेत में बराबरी से फैल जाता है ना पोषक तत्वों का रिसाव ना ही खेत में बाढ़ जैसी स्थिति, इस विधि से उपज में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि संभव है। सिंचाई केवल क्रांतिक अवस्था पर ही की जाये जिससे पानी कम लगेगा और उद्देश्य पूरा होकर अधिक उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा हो सकेगा।

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