ग्वार की उन्नत खेती और महत्व

Share
  • रोहिताश नागर ,डॉ. राकेश मीणा असिस्टेंट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ
    एग्रीकल्चरल साइंसेज, कैरियर पॉइंट यूनिवर्सिटी, कोटा (राजस्थान)

1 जून 2021, भोपाल । ग्वार की उन्नत खेती और महत्व – ग्वार की फसल मुख्यत: भारत के उत्तर-पश्चिमी राज्यों (राजस्थान, हरियाणा, गुजरात एवं पंजाब) में उगाई जाती है। ग्वार एक बहुउद्देशीय फसल है जोकि बढ़ते जलवायु परिवर्तन एवं घटते संसाधनों में अहम भूमिका निभाती है। इससे प्राप्त होने वाली फलियों को सब्जी के रूप में एवं दानों को पशु आहार एवं गोंद उद्योग में प्रयोग किया जाता है। इससे प्राप्त होने वाले पौष्टिक चारे को हरे एवं शुष्क चारे के रूप में पशुओं को खिलाया जाता है। गोंद निचोडऩे के बाद विभिन्न प्रकार के उत्पाद जैसे-ग्वार आटा, ग्वार खली, ग्वार चूरी एवं ग्वार कोरमा (अधिक प्रोटीन युक्त) पशुओं एवं सूअरों को दाने के रूप में खिलाया जाता है और ग्वार गम का प्रयोग पेपर उद्योग, कपड़ा उद्योग एवं इमारती लकड़ी फिनीशिंग के रूप में किया जाता है। ग्वार की बढ़ती मांग और उत्पादन लागत में कमी को देखते हुए किसानों में ग्वार की खेती की लोकप्रियता बढ़ी है। वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर ग्वार के बीज की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। क्योंकि ग्वार बीज का उपयोग गोंद उद्योग के साथ-साथ पेट्रोलियम उद्योग में भी किया जा रहा है।

जलवायु

ग्वार शुष्क जलवायु की कम पानी की आवश्यकता वाली फसल है। ग्वार को ग्रीष्म और वर्षा ऋतु दोनों में ही उगाया जा सकता है। इसे भारी काली मृदाओं को छोड़कर सभी प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। अधिक ग्वार उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट से दोमट मृदाएं सर्वोत्तम होती है।


भूमि की तैयारी

रबी फसल की कटाई के बाद खाली पड़े खेतों में पहली जुताई मिट्टी पलट हल (हैरो) से करने के बाद दो जुताई कल्टीवेटर से करें और बाद में पाटा लगाकर खेत को समतल कर लें। पाटा लगाने से भूमि में नमी बनी रहती है।

बुआई का समय एवं बीज की मात्रा- बुआई दो समय पर की जा सकती है।

  • सब्जी के लिए ग्वार को फरवरी-मार्च में आलू, सरसों, गन्ना आदि के खाली पड़े खेतों में बोया जाता है।
  • जून-जुलाई में ग्वार मुख्य रूप से चारे और दाने के लिए पैदा की जाती है। इस फसल की बुआई प्रथम मानसून के बाद जून या जुलाई में की जाये। कुछ क्षेत्रों में ग्वार की बुआई सितम्बर से अक्टूबर में भी की जाती है। ग्वार की फसल के लिए 5-8 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर बीज की आवश्यकता पड़ती है। ग्वार के बीज को राईजोबियम व फॉस्फोरस सोलूबलाइजिंग बैक्टीरिया (पीएसबी) कल्चर से उपचारित करें।
उन्नतशील प्रजातियाँ

पूसा मौसमी: ग्वार की यह प्रजाति वर्षा ऋतु में यह खून में कोलेस्टरोल को कम करता है। उगाई जाने वाली फसल के लिए सर्वोत्तम है।पूसा सदाबहार एवं पूसा ग्रीष्म ऋतु में कारण हड्डियों को मजबूत करता है।

  • एच.जी. 563, एच.जी. 870: यह दाने की उपज के लिए उत्तम प्रजातियाँ हैं।
  • एच.एफ.जी 156: यह एक लम्बी, शाखादार, खुरदरी पत्तियों वाली चारे की प्रजाति है, इसके हरे चारे की औसत उपज 130-140 क्ंिवटल प्रति एकड़ है।
खाद एवं उर्वरक की मात्रा

बुआई से पहले खेत की जुताई के समय 10-12 टन प्रति हेक्टर सड़ी हुई गोबर की खाद मिलायें। ग्वार फसल में सामान्यत: 25 कि.ग्रा. नाइट्रोजन,50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस और 50 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग करें। जिसमें नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा का प्रयोग बुआई के समय करें, तथा शेष नाइट्रोजन बुआई से एक माह बाद छिटकवां विधि से प्रयोग करें।


खरपतवार एवं सिंचाई प्रबंधन

खरपतवारों को रोकने के लिए बुआई के एक माह बाद एक निराई-गुड़ाई करें तथा बुआई के तुरन्त बाद बासालीन 800 मि.ली. प्रति एकड़ 250 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। सामान्यत: जुलाई में बोई गई फसलों में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। परन्तु वर्षा न होने की दशा में एक सिंचाई फलियाँ बनते समय अवश्य करें।

कीट एवं रोग नियंत्रण

ग्वार की फसल में कीटों की समस्या कम रहती है। ग्वार में लगने वाले कीटों में एफिड (माहू), पत्ती छेदक, सफेद मक्खी, लीफ हापर या जैसिड व केटरपिलर प्रमुख हैं। भरपूर उत्पादन हेतु इन कीटों को नियंत्रित करना बहुत जरूरी है। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 0.03 प्रतिशत का छिड़काव करें। इसके अलावा जहां पानी की सुविधा हो, मिथाइल पैराथियान 50 प्रतिशत 750 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की मृदाओं में भूमिगत कीटों विशेषकर दीमक का अधिक प्रकोप होता है। इसकी रोकथाम हेतु क्लोरोपायरीफास या क्विनालफास 1.5 प्रतिशत पूर्ण 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई पूर्व मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दें।

ग्वार की फसल के प्रमुख रोगों में जीवाणुज अंगमारी, ऑल्टरनेरिया पर्ण अंगमारी, जड़ गलन, चूर्णिल आसिता व एन्थ्रेक्नोज है। इनमें जीवाणुज अंगमारी ग्वार में लगने वाली भयंकर बीमारी है। बीमारी के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों की ऊपरी सतह पर बड़़े-बड़े धब्बे के रूप में प्रकट होते हैं। ये धब्बे शीघ्र ही संपूर्ण पत्तियों को ढक लेते हैं। अत: पत्तियां गिर जाती हैं। इससे बचाव हेतु रोगरोधी किस्में बोएं। बुवाई से पूर्व बीज उपचार अवश्य करें। इसके लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 100-250 पीपीएम (100-250 मिलीग्राम प्रति लीटर) घोल का प्रयोग करें। ऑल्टरनेरिया पर्ण अंगमारी वर्षा होने के समय फसल को नुकसान पहुंचाती है। यह एक फफूंदजनित बीमारी है। इसमें पत्तियों के किनारों पर गहरे भूरे, गोलाकार व अनियमित आकार के धब्बे बन जाते हैं।

परिणाम स्वरूप पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और अन्तत: झड़ जाती हैं। इससे बचाव हेतु डाइथेन जेड-78 का 0.20 प्रतिशत का छिड़काव रोग के लक्षण प्रकट होने पर 15 दिन के अंतराल पर दो या तीन बार करें। एन्थ्रेक्नोज भी एक फफूंदीजनित रोग है। इसमें पौधों के तनों, पर्णवृन्तों और पत्तियों पर काले धब्बे बन जाते हैं। इससे बचाव हेतु डायथेन जेड-78 का 0.20 प्रतिशत का छिड़काव करें। जड़ गलन रोग से बचाव हेतु वीटावैक्स या बाविस्टीन की दो ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित करने के बाद बुवाई करें। चूर्णिल आसिता बीमारी की रोकथाम के लिए घुलनशील गंधक (0.3 प्रतिशत) का एक किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 15 दिनों के अंतराल पर खड़ी फसल में छिड़काव करें।

हरे चारे के रूप में कटाई का समय

ग्वार के हरे चारे वाली फसल की कटाई बुआई के 50-60 दिन के बाद फूल आने की अवस्था में की जाये। फली बनने की अवस्था में ग्वार के हरे चारे को खिलाना दुधारू पशुओं के लिए उपयोगी होता है।

कटाई और उपज

ग्वार की कटाई उस समय करें जब उसकी पतियाँ पीली पड़ कर झड़ जायें तथा फलियों का रंग भूसे जैसा दिखने लगे, अन्यथा कटाई में देरी करने पर फलियों के छिटकने से बीज जमीन पर गिर जाएंगे। ग्वार फसल से हरे चारे की औसत उपज 150-225 क्विंटल प्रति हेक्टर एवं हरी फलियों की उपज 40-60 क्ंिवटल प्रति हेक्टर और दाने की उपज 17-19 क्ंिवटल प्रति हेक्टर प्राप्त होती है।

मृदा स्वास्थ्य पर प्रभाव

ग्वार दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में जड़ ग्रन्थियां पाई जाती है, जो वातावरणीय नाईट्रोजन का स्थिरीकरण करती है और मृदा की भौतिक दशा को सुधारने के साथ-साथ अन्य फसलों की उपज में वृद्धि करती है। ग्वार अनुपजाऊ लवणीय एवं क्षारीय मृदाओं को सुधारने का भी कार्य करती है। प्रयोग हरी खाद के रूप में भी किया जाता है।

Share
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published.