संपादकीय (Editorial)

संरक्षित खेती

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गतांक से आगे…
प्लग ट्रे पौध उत्पादन प्रौद्योगिकी : इस प्रकार के पौध उत्पादन को शहरी क्षेत्रों में लघु उद्योग के रुप में अपनाया जा सकता है। इस विधि द्वारा विभिन्न सब्जियों की पौध दो प्रकार की प्लास्टिक प्रो-ट्रे में तैयार की जाती है। एक प्रो-ट्रे में छेदों का आकार 1.0 से 1.5 वर्ग इंच होना चाहिए। इसमें शिमला मिर्च, फूलगोभी, पत्तागोभी, गांठगोभी, ब्रोकली, मिर्च सलाद व टीपीएस आलू आदि की पौध तैयार की जा सकती है। दूसरी प्रो-ट्रे में छेदों का आकार 1.5 से 2.0 वर्ग इंच होना चाहिए। इसमें टमाटर, बैंगन, खीरा, खरबूजा, तरबूज, लौकी, तोरई, चप्पन कद्दू आदि सब्जियों की पौध तैयार की जा सकती है।

हमारे देश में जहां आबादी एक अरब पन्द्रह करोड़ से भी अधिक है वहां 35-40 प्रतिशत जनसंख्या केवल शहरों में रह रही है तथा शहरी आबादी का यह अनुपात वर्ष 2025 तक लगभग 60 प्रतिशत तक बढऩे की उम्मीद है। प्रतिदिन गांव से शहरों की तरफ युवा रोजगार व बेहतर भविष्य की उम्मीद में हजारों की संख्या में विस्थापित हो रहे हैं। यह विस्थापन एक ओर रोजगार के विकल्प पर प्रशनचिन्ह लगा रहा है वहीं दूसरी तरफ बढ़ती शहरी जनसंख्या खाद्य आपूर्ति पर भी गंभीर दबाव बढ़ा रही है। इस शहरी आबादी में प्रति व्यक्ति कम आय वाले लोग अपनी लगभग 50 से 80 प्रतिशत तक आय भोजन उपलब्ध करने में लगा देते हैं। इस वर्ग के भोजन की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती जिनमें मुख्य पोषक तत्वों की मात्रा आवश्यकता से कहीं कम होती है।

आजकल भारतीय बाजारों में 98 छेदों वाली प्लास्टिक ट्रे आसानी से मिल रही है जिनका उपयोग पौध उगाने में किया जा सकता है। अब इन प्रो-ट्रेज में परलाइट, वर्गीकुलाइट व कोकोपीट का 1:1:3 अनुपात का मिश्रण तैयार करके उसका उपयोग भू-रहित माध्यम के रुप में किया जा सकता है। आमतौर पर इन तीनों माध्यम पूर्णतया रोगाणुरहित होते हैं। अब ट्रे के प्रत्येक छेद में एक बीज बोया जाता है तथा बाद में बीज के ऊपर वर्गीकुलाइटकी एक पतली परत डाली जाती है तथा सर्दी के मौसम में प्रत्येक ट्रे को अंकुरण के लिए ऐसे कमरे में रखा जा सकता है जहां का तापमान लगभग 24 से 25 डिग्री से.ग्रे. हो, ताकि बीजों का अंकुरण जल्दी व ठीक प्रकार से हो सके। अंकुरण के बाद सभी ट्रे ग्रीनहाउस या अन्य संरक्षित क्षेत्र में बने प्लेटफार्म या फर्द्गा पर फैलाई जा सकती है या फिर ईंटों द्वारा बने फर्द्गा पर उनको फैला कर रख दिया जाता है। उपरोक्त माध्यम में से कोकोपिट को नारियल के कवच के ऊपर उपस्थित रेशों से बनाया जाता है तथा यह जड़ों की बढ़वार के लिए माध्यम के रुप में कार्य करता है। परलाइट वोल्कैनिक उत्पत्ति की चट्टानों से निकले पदार्थ को अत्यधिक तापक्रम पर गर्म करके तैयार किया जाता है। यह माध्यम भी जल निकास व माध्यमों के मिश्रण के बीच उचित हवा उपलब्ध कराने में सहायता करता है। यह सफेद रंग का बहुत हल्का माध्यम है जिसका एक भाग माध्यम मिश्रण में मिलाया जाता है।
सर्दी में पौध तैयार करते समय ग्रीनहाउस या अन्य संरक्षित क्षेत्र में रात को हीटर का प्रयोग किया जा सकता है तथा यह हीटर रात को तब चलाया जा सकता है जब तापमान 13 या 14 से.ग्रे. कम होता है। सर्दी में पौध की प्रारम्भिक अवस्थाप में 70 पी.पी.एम. (10 लाख भाग में से 70 भाग) घोल जिसमें नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश को 1:1:1 अनुपात में मिलाकर बनाया जाता है तथा बाद में यह मा़त्रा 140 पी.पी.एम. प्रति सप्ताह तथा कभी-कभी 200 पी.पी.एम. मात्रा के घोल तक बढ़ा दी जाती है। खाद व पानी को एक विशेष प्रकार की बूम प्रणाली या फव्वारा पद्धति द्वारा दिया सकता है जिससे खाद व पानी एक समान मात्रा में सभी ट्रे में जा सके तथा पौध की बढ़वार व गुणवत्ता एक समान रहे। गर्मी में बीज बोने के बाद ट्रेज को अंकुरण कमरे में रखने की आवशकता नहीं रहती है तथा खाद 70 पी.पी.एम. की मात्रा में दी जाती है। पौध पर एक बार विशेष प्रकार के वृद्धि नियामक घोल का छिड़काव भी किया जाना चाहिए। इसका छिड़काव तभी किया जाता है जब दिन का तापमान 20 से 30 डिग्री से.ग्रे. के बीच हो। खाद के प्रयोग हेतु फुहारानुमा बूम प्रणाली या फिर सामान्य फुहारे का प्रयोग किया जा सकता है। इसके जरिये समस्त खाद व घोल समय-समय पर पौध को दिये जाते हैं। इस प्रकार इस तकनीक द्वारा सर्दी के मौसम में पौध तैयार होने में 28 से 30 दिन लगते हैं। तैयार पौध को माध्यम सहित निकालकर मुख्य खेत में रोपाई की जाती है। माध्यम के चारों ओर जड़ों का जाल फैला रहता है जो पौध की ओज व गुणवत्ता को दर्शााता है। पौध को दूर स्थान तक भेजने के लिए माध्यम सहित पैक करके ले जाया जा सकता है। यदि कद्दूवर्गीय फसलों की पौध गर्मी के मौसम में तैयार की जाती है तो इसमें कुल 12 से 15 दिन का समय लगता है। इस तकनीक द्वारा पौध तैयार करने में पौध में जड़ों का विकास बहुत अच्छा व अधिक होता है।
गंदे नालों के पानी द्वारा ताजी सब्जियों को न उगा कर किसान उसके स्थान पर निम्नलिखित खेती कर सकते है जिसका हमारे स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव भी नहीं पड़ेगा तथा इससे अधिक लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है।
1. फूलों की खेती
2. सब्जी और फूली के बीजों का उत्पादन
3. सजावटी पौधों व फूलों की पौध तैयार करना।
फूलों की खेती : फूलों का हमारे स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है क्योंकि फूलों को हम सब्जियों की तरह खाने के उपयोग में नहीं लाते हैं। आज बड़े शहरों में उपलब्ध बाजारों में जिस तरह से फूलों की मांग लगातार बढ़ रही है, उस भाग को ध्यान में रखते हुए भी हमें बड़े पैमाने पर पुष्प उत्पादन की ओर बढऩा चाहिए। गंदे नालों में फूलों का उत्पादन किया जा सकता है इससे फूलों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं पड़ता। ताजे फूल बहुत ही नाजुक होते हैं जिस कारण से तोडऩे के बाद लम्बे समय तक ठीक अवस्था में रखना बहुत कठिन होता है। इसलिये उन्हें दूरस्थ क्षेत्रों में पैदा करके शहरों तक पहुंचाना बहुत कठिन व महंगा पड़ता है। जबकि गंदे नाले अधिकतर शहरों के करीब होते हैं तो ऐसी भूमि पर सब्जी उत्पादन को छोड़कर फूलों का उत्पादन किया जाये जिससे फूलों को उन शहरों में उपलब्ध बाजारों में आसानी से बेचा जा सकता है। इस प्रकार के क्षेत्रों में फूलों को बाजार की मांग के अनुसार उगाया जा सकता है, जैसे कि शादियां, उत्सव (दीपावली, क्रिसमस, नया साल इत्यादि) और आजकल हमारे समाज में पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण भी आजकल बाजार में फूलों की मांग लगातार बढ़ रही है। कई उत्सवों पर फूलों के भाव बढ़ जाते हैं। गेंन्दा फूल की मांग सतत मंदिरों में फूल माला के रुप में बहुत अधिक होती है। अगर कृषक बाजार में फूलों की सामयिक भाग को देख कर उत्पादन करें तो वे और अधिक लाभ कमा सकते हैं।
किसान इस सब के अतिरिक्त फूलों के बीजों का उत्पादन भी कर सकते हैं जिसमें मुख्यत: गेंदा हो सकता है। किसान ऐसे क्षेत्रों में मुख्यत: कट पुष्प जैसे रजनीगंधा, गुलदाऊदी, लिलियन, ग्लोडियोलस इत्यादि का उत्पादन करके निकट शहरों में उपलब्ध बाजारों में बेचकर अधिक लाभ कमा सकते हैं।
सब्जी बीज उत्पादन : यदि किसान ऐसे स्थानों पर सब्जियों के स्थान पर सब्जी बीज उत्पादन करते हैं तो इसका जन स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर नहीं पड़ेगा तथा साथ ही साथ ताजी सब्जी उत्पादन के मुकाबले बीज उत्पादन द्वारा अधिक लाभ कमा सकते हैं, लेकिन इसके लिये उन्हें तकनीकी जानकारी होना आवश्यक है कि कौन-सी सब्जियां का कब और कैसे बीज उत्पादन करना है। लेकिन ऐसे क्षेत्रों में सब्जी बीज उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं जिन्हें निश्चित तौर पर किसान अपना सकते हैं।
सजावटी पौधों व फूलों का पौध उत्पादन : ऐसे क्षेत्रों में सब्जी उत्पादन करने वाले किसान सब्जी उत्पादन को छोड़कर सजावटी पौधों, बोगेनविलिया, हेज तथा फूल वाले पौधों व एक वर्षीय पुष्पों की पौध तैयार कर उन्हें आसानी से बड़े शहरों में बेचकर अधिक लाभ कमा सकते हैं। आज बड़े शहरों में इस प्रकार के पौधों व पुष्पों की पौध भाग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अत: इनका उत्पादन इस प्रकार के क्षेत्रों में सब्जी उत्पादन का तीसरा विकल्प हो सकता है। पौध लगाने में कुछ नई तकनीक व सामग्री का इस्तेमाल करने पर बेहतर उपज प्राप्त होगी जैसे प्रो-ट्रेज, नेट इत्यादि का उपयोग।

सारांश

बड़े शहरों के उपभोक्ताओं की मांग को ध्यान में रखते हुए अब समय आ गया है कि शहरी क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाली सब्जियों का उत्पादन किया जाये जिसके लिए संरक्षित कृषि एक कारगर व आकर्षक विकल्प है। संरक्षित खेती द्वारा इन क्षेत्रों में खेती करने वाले जिसके किसान उच्च गुणवत्ता वाली सब्जियों को लम्बी अवधि तक उगाकर तथा सब्जियों, फूलों तथा स्ट्राबेरी जैसे फूलों की बेमौसमी खेती करके बड़े शहरों में उपलब्ध उच्च बाजारों से अघिक लाभ कमा सकते हैं।

आधुनिक तकनीक द्वारा पौध तैयार करने के लाभ

  • इस प्रकार पौध को कम समय में तैयार किया जा सकता है तथा खासकर सर्दी के मौसम में जहां बाहर खुले वातावरण में क्यारियों में टमाटर जैसी फसल की पौध तैयार करने में 50 से 60 दिन लगते हैं। इस तकनीक द्वारा केवल 28 से 30 दिन में स्वस्थ व उच्च गुणवत्ता वाली पौध तैयार हो जाती हैं।
  • बीज की मात्रा को भी काफी कम किया जा सकता है क्योंकि इस विधि द्वारा प्रत्येक बीज को अलग-अलग छेदों में बोया जाता है जिससे प्रत्येक बीज स्वस्थ पौध देता है।
  • पौध को समस्त प्रकार के भू-जनित रोगों व कीटाणुओं से बचाया जा सकता है तथा सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पौध को विषाणु रोगों के प्रकोप से बचाया जा सकता है।
  • जब पौध बाहर क्यारियों में तैयार की जाती है तो पौध को उखाड़ते समय जड़ आदि टूटने से पौधों की मरण क्षमता लगभग 10 से 15 प्रतिशत रहती है। लेकिन इस तकनीक द्वारा तैयार पौध में एक भी पौध के मरने की संभावना नहीं रहती है। इससे पौध को झटका भी नहीं लगता है।
  • पौध मे जड़ें अधिक विकसित व लम्बी होती हैं जिसके कारण पौध अधिक व उच्च ओज वाली होती है।
  • इस प्रकार संरक्षित पौध तैयार करने की तकनीक द्वारा किसी भी सब्जी फसल की पौध को कभी भी तैयार किया जा सकता है। खासकर मौसम से पहले फसल उगाने हेतु ताकि बेमौसमी सब्जी उत्पादन द्वारा अधिक लाभ कमाया जा सके। कद्दूवर्गीय सब्जियों की पौध को भी इस विधि द्वारा बड़ी सरलतापूर्वक तैयार किया जाता है जो पहले भूमि में क्यारियों में सम्भव नहीं होता था।
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