फसल की खेती (Crop Cultivation)

किस क्षेत्र में कब करें सोयाबीन की बुवाई? ICAR ने बताई बीज दर और खाद की पूरी जानकारी

30 जुलाई 2026, नई दिल्ली: किस क्षेत्र में कब करें सोयाबीन की बुवाई? ICAR ने बताई बीज दर और खाद की पूरी जानकारी – खरीफ सीजन में सोयाबीन की बेहतर पैदावार के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (NSRI), इंदौर ने किसानों के लिए साप्ताहिक (29 जून से 5 जुलाई 2026) कृषि परामर्श जारी करते हुए देश के विभिन्न  कृषि जलवायु क्षेत्रों के अनुसार सोयाबीन की बुवाई का उपयुक्त समय, बीज दर, कतारों की दूरी, पोषक तत्वों की मात्रा और उर्वरकों की अनुशंसित खुराक बताई है। इन सिफारिशों का पालन करने से फसल की अच्छी बढ़वार, संतुलित पोषण और बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

100 मिमी बारिश के बाद ही करें बुवाई

आईसीएआर-एनएसआरआई के अनुसार, किसानों को सोयाबीन की बुवाई मानसून आने और कम से कम 100 मिमी वर्षा होने के बाद ही करनी चाहिए। इससे बीजों का अंकुरण बेहतर होता है और पौधों की शुरुआती बढ़वार मजबूत रहती है।

क्षेत्रवार बुवाई का समय, बीज दर और पोषक तत्व

क्षेत्रबुवाई का उपयुक्त समयबीज दर (किग्रा/हे.)कतार दूरीN:P:K:S (किग्रा/हे.)
मध्य क्षेत्र (मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात आदि)20 जून–5 जुलाई65–8030–45 सेमी25:60:40:20
उत्तर-पूर्वी पहाड़ी क्षेत्र15–30 जून5545 सेमी25:100:50:50
उत्तरी मैदानी क्षेत्र20 जून–5 जुलाई6545 सेमी25:75:25:37.5
पूर्वी क्षेत्र15–30 जून5545 सेमी25:100:50:50
दक्षिणी क्षेत्र15–30 जून6540 सेमी25:80:20:30

बीज उपचार से घटेगी खाद की लागत

आईसीएआर-एनएसआरआई ने किसानों को सलाह दी है कि यदि बुवाई से पहले बीजों का माइक्रोबियल कंसोर्टिया (जैविक कल्चर)  से उपचार किया जाए तो अनुशंसित रासायनिक उर्वरकों की मात्रा में करीब 25 प्रतिशत तक कमी की जा सकती है। ऐसी स्थिति में यूरिया की मात्रा 56 किलोग्राम से घटाकर 40 किलोग्राम, एसएसपी 375-400 किलोग्राम से घटाकर 280 किलोग्राम और म्यूरेट ऑफ पोटाश 67 किलोग्राम से घटाकर 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक की जा सकती है। इसी तरह डीएपी और मिश्रित उर्वरकों की आवश्यकता भी कम हो जाती है, जिससे किसानों की लागत में बचत होती है।

इसके अलावा, संस्थान ने कहा है कि जिन खेतों में जिंक या आयरन की कमी पाई जाती है, वहां आवश्यकता के अनुसार 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 50 किलोग्राम आयरन सल्फेट प्रति हेक्टेयर का प्रयोग किया जा सकता है। इससे पौधों की बढ़वार बेहतर होगी और पोषक तत्वों की कमी से होने वाली समस्याओं से बचाव होगा।

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