Ad DesktopAd TabletAd Mobile
फसल की खेती (Crop Cultivation)राज्य कृषि समाचार (State News)

कपास में गुलाबी सुंडी और हरा तेला का हमला, पंजाब में किसानों को दी गई सटीक दवा की सलाह

19 सितंबर 2026, बठिंडा (पंजाब): कपास में गुलाबी सुंडी और हरा तेला का हमला, पंजाब में किसानों को दी गई सटीक दवा की सलाह – कपास की फसल पर इस समय गुलाबी सुंडी और हरा तेला (जैसिड) कीट का खतरा बढ़ गया है, जो हर साल इस मौसम में कपास किसानों के बीच सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल बन जाता है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और भारत मौसम विज्ञान विभाग के 15 सितंबर 2026 के संयुक्त बुलेटिन में कपास किसानों को दोनों कीटों से बचाव के लिए दवा और उसकी सटीक मात्रा बताई गई है। यह सलाह 15 से 21 सितंबर तक के लिए है।

बुलेटिन के अनुसार, कपास की टिंडे बनने की अवस्था में गुलाबी सुंडी सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है, क्योंकि यह टिंडे के अंदर घुसकर रुई को खराब कर देती है, जिससे बाजार में उपज का भाव भी गिर जाता है। वहीं हरा तेला यानी जैसिड कीट पत्तियों का रस चूसता है, जिससे पत्तियां किनारों से पीली पड़कर मुड़ने लगती हैं और पौधे की बढ़वार रुक जाती है।

पिछले कुछ मौसमों में उत्तर भारत के कपास बेल्ट में गुलाबी सुंडी की वजह से किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है, इसलिए हर साल सितंबर-अक्टूबर में जब टिंडे बनना शुरू होते हैं, यह कीट किसानों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा और चिंता का विषय बन जाता है।

Ad DesktopAd TabletAd Mobile
Ad DesktopAd TabletAd Mobile

हरा तेला के लिए चार विकल्प

हरा तेला यानी जैसिड की रोकथाम के लिए किसान प्रति एकड़ 125 से 150 लीटर पानी में इनमें से कोई एक दवा मिला सकते हैं: ओशीन 20 एसजी 60 ग्राम, या कीफन 15 ईसी (टॉल्फेनपायरेड) 300 मिलीलीटर, या नियॉन 5 ईसी (फेनपाइरोक्सिमेट) 300 मिलीलीटर, या उलाला 50 डब्ल्यूजी 80 ग्राम। इनमें से कोई भी एक दवा चुनकर छिड़काव करना पर्याप्त है, एक से ज्यादा दवाओं को मिलाने की जरूरत नहीं है।

कृषक जगत को व्हाट्सएप पर फॉलो करें
खेती-किसानी की ताज़ा खबरें, सीधे आपके फ़ोन पर
चैनल फॉलो करें

गुलाबी सुंडी के लिए यह दवा कारगर

गुलाबी सुंडी की रोकथाम के लिए बुलेटिन में प्रोक्लेम 5 एसजी (इमामेक्टिन बेंजोएट) 100 ग्राम प्रति एकड़, या क्यूराक्रॉन/प्रोफेक्स/सेलरॉन (प्रोफेनोफॉस 50 ईसी) 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ के इस्तेमाल की सलाह दी गई है। दोनों ही दवाओं को ऊपर बताई गई मात्रा में पानी में घोलकर पूरे खेत में समान रूप से छिड़कना चाहिए, ताकि टिंडों के अंदर छिपी सुंडी तक दवा का असर पहुंच सके।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि छिड़काव से पहले फेरोमोन ट्रैप लगाकर कीट की मौजूदगी की पुष्टि करें, ताकि बिना जरूरत के दवा का इस्तेमाल न हो। खेत का लगातार निरीक्षण और आर्थिक क्षति स्तर पर ही छिड़काव करने की सलाह पहले भी पंजाब के कृषि अधिकारी दोहराते रहे हैं।

बुलेटिन में किसानों को सलाह दी गई है कि तय मात्रा से ज्यादा दवा का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इससे न सिर्फ लागत बढ़ती है बल्कि रुई में दवा के अंश रह जाने का खतरा भी रहता है, जो निर्यात गुणवत्ता वाली कपास के लिए नुकसानदेह है। छिड़काव के बाद तय प्रतीक्षा अवधि (वेटिंग पीरियड) पूरी होने पर ही चुनाई करने की सलाह दी जाती है। साथ ही, एक ही तरह की दवा को बार-बार इस्तेमाल करने से कीट में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, इसलिए अलग-अलग समूह की दवाओं को बारी-बारी इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है।

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture