राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

ICAR की दो नई आलू किस्में अधिसूचित, ‘कुफरी अभेद्य’ और ‘कुफरी रूबी’ से किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा

29 जुलाई 2026, नई दिल्ली: ICAR की दो नई आलू किस्में अधिसूचित, ‘कुफरी अभेद्य’ और ‘कुफरी रूबी’ से किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला द्वारा विकसित आलू की दो नई उन्नत किस्मों ‘कुफरी अभेद्य’ और ‘कुफरी रूबी’ को केंद्र सरकार ने आधिकारिक रूप से अधिसूचित (नोटिफाई) कर दिया है। 8 जुलाई 2026 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना के बाद अब इन दोनों किस्मों के गुणवत्तापूर्ण बीजों का उत्पादन, प्रमाणीकरण और बिक्री अनुशंसित क्षेत्रों में की जा सकेगी। इससे किसानों को अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता, रोग प्रबंधन और बाजार की नई संभावनाओं का लाभ मिलने की उम्मीद है।

आईसीएआर-सीपीआरआई के अनुसार, नई किस्मों का विकास बदलती जलवायु परिस्थितियों, रोगों के बढ़ते खतरे और बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए किया गया है। संस्थान का मानना है कि इन किस्मों के प्रसार से गुणवत्तापूर्ण बीज प्रणाली मजबूत होगी, आधुनिक तकनीकों का तेजी से विस्तार होगा और किसानों की उत्पादकता के साथ उनकी आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

‘कुफरी अभेद्य’ पहाड़ी क्षेत्रों के लिए वरदान

आईसीएआर-सीपीआरआई के निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह ने बताया कि कुफरी अभेद्य को हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों, तमिलनाडु के नीलगिरि क्षेत्र तथा कर्नाटक और महाराष्ट्र के पठारी इलाकों के लिए अनुशंसित किया गया है। यह किस्म पहाड़ी क्षेत्रों में आलू उत्पादन को अधिक टिकाऊ और लाभदायक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सलेज सूद के अनुसार, यह मध्यम अवधि में तैयार होने वाली टेबल आलू की किस्म है, जो 110 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है। खरीफ मौसम में इसकी औसत उत्पादन क्षमता 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लेट ब्लाइट और पोटैटो सिस्ट नेमाटोड (PCN) जैसी आलू की दो प्रमुख बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है। यह देश की पहली उच्च उत्पादक किस्म है, जिसमें पीसीएन की दोनों प्रमुख प्रजातियों के प्रति प्रतिरोध क्षमता विकसित की गई है। इससे किसानों की फसल हानि कम होगी और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता भी घट सकती है।

90 दिन में तैयार होगी ‘कुफरी रूबी’

डॉ. सलेज सूद ने बताया कि कुफरी रूबी को देश में तेजी से बढ़ रहे बेबी पोटैटो बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। यह मध्यम अवधि की विशेष किस्म है, जिसकी लगभग 60 प्रतिशत उपज 90 दिनों के भीतर बेबी पोटैटो के रूप में तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 23 से 25 टन प्रति हेक्टेयर है।

यह किस्म ताजा प्रीमियम बाजार, फूड प्रोसेसिंग उद्योग और होटल-रेस्तरां (हॉस्पिटैलिटी) क्षेत्र की मांग को पूरा करने के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। इसकी खेती के लिए हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, असम, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र सहित देश के प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों की अनुशंसा की गई है।

हिमाचल के किसानों को मिलेगा विशेष लाभ

डॉ. ब्रजेश सिंह ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में आलू प्रमुख नकदी फसलों में शामिल है और हजारों किसानों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। ऐसे में कुफरी अभेद्य का अधिसूचित होना राज्य के लिए विशेष महत्व रखता है। रोग और कीट प्रतिरोधी होने के साथ इसकी अधिक उत्पादन क्षमता और बेहतर गुणवत्ता वाले कंद किसानों की आय बढ़ाने में सहायक होंगे। साथ ही हिमाचल प्रदेश की गुणवत्ता वाले बीज और टेबल आलू उत्पादन में अग्रणी राज्य के रूप में पहचान भी और मजबूत होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, इन दोनों नई किस्मों के अधिसूचित होने से किसानों को कई स्तर पर लाभ मिलेगा। रोग प्रतिरोधी किस्मों के कारण फसल नुकसान कम होगा, गुणवत्तापूर्ण बीज आसानी से उपलब्ध होंगे और रासायनिक फसल सुरक्षा उपायों पर खर्च घटेगा। वहीं कुफरी रूबी जैसी विशेष किस्म किसानों को बेबी पोटैटो के बढ़ते बाजार से जोड़कर बेहतर कीमत दिलाने में मदद कर सकती है।

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