धान में ग्रीन लीफहॉपर (GLH) दिखे तो क्या करें? जाने कब करें दवा का छिड़काव
30 जुलाई 2026, नई दिल्ली: धान में ग्रीन लीफहॉपर (GLH) दिखे तो क्या करें? जाने कब करें दवा का छिड़काव – खरीफ सीजन में देश में धान की बुवाई 166 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में हो चुकी है। ऐसे में किसानों के लिए फसल की नियमित निगरानी करना बेहद जरूरी है। धान की फसल में ग्रीन लीफहॉपर (GLH) एक प्रमुख कीट है, जो पौधों का रस चूसने के साथ-साथ तुंग्रो (Tungro)जैसी खतरनाक विषाणुजनित बीमारी भी फैलाता है। इसको देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान (ICAR-CRRI) ने किसानों के लिए सलाह जारी की है।
संस्थान के अनुसार, ग्रीन लीफहॉपर दिखाई देते ही दवा का छिड़काव शुरू नहीं करना चाहिए। पहले खेत का निरीक्षण करें और तभी कीटनाशक का उपयोग करें, जब कीट की संख्या आर्थिक क्षति स्तर (Economic Threshold Level-ETL) से अधिक हो जाए।
कब करें कीटनाशक का छिड़काव?
ICAR-CRRI के अनुसार, यदि धान की वानस्पतिक (Vegetative) अवस्था में प्रति पौधा (हिल) 5 या उससे अधिक ग्रीन लीफहॉपर दिखाई दें, तो नियंत्रण उपाय अपनाने चाहिए।
वहीं, जिन क्षेत्रों में तुंग्रो रोग की समस्या रहती है, वहां प्रति पौधा 2 ग्रीन लीफहॉपर मिलते ही नियंत्रण शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि यह कीट बहुत तेजी से तुंग्रो वायरस फैलाता है।
कौन-सी दवा का करें प्रयोग?
यदि ग्रीन लीफहॉपर की संख्या आर्थिक क्षति स्तर से अधिक हो जाए, तो किसान निम्न में से किसी एक कीटनाशक का प्रयोग कर सकते हैं—
- एजाडिरैक्टिन 5% w/w – 80 मिलीलीटर प्रति एकड़
- इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL – 50 मिलीलीटर प्रति एकड़
- थायमेथोक्साम 25 WG – 40 ग्राम प्रति एकड़
- एसीफेट – लेबल पर अनुशंसित मात्रा के अनुसार।
छिड़काव करते समय दवा की अनुशंसित मात्रा, पानी की मात्रा और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन अवश्य करें।
ग्रीन लीफहॉपर से क्या नुकसान होता है?
ग्रीन लीफहॉपर धान के पौधों का रस चूसकर उन्हें कमजोर करता है, जिससे उनकी बढ़वार प्रभावित होती है। इससे भी बड़ा खतरा यह है कि यही कीट तुंग्रो वायरस को एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचाता है। यदि समय रहते इसका नियंत्रण नहीं किया जाए तो फसल की वृद्धि रुक सकती है और उपज में भारी गिरावट आ सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि धान के खेतों का नियमित निरीक्षण, आर्थिक क्षति स्तर के आधार पर ही कीटनाशकों का प्रयोग और समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाकर किसान ग्रीन लीफहॉपर से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं। इससे अनावश्यक कीटनाशकों के उपयोग में भी कमी आएगी और उत्पादन लागत नियंत्रित रहेगी।
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