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फसल की खेती (Crop Cultivation)

सूखे की चिंता छोड़िए! धान की ये 6 बेहतरीन किस्में बोएं, कम पानी में भी मिलेगा बंपर उत्पादन

29 जून 2026, नई दिल्ली: सूखे की चिंता छोड़िए! धान की ये 6 बेहतरीन किस्में बोएं, कम पानी में भी मिलेगा बंपर उत्पादन – देश के कई हिस्सों में अल नीनो और सामान्य से कम बारिश की आशंका ने धान उत्पादक किसानों की चिंता बढ़ा दी है। धान ऐसी फसल है, जिसे सामान्य तौर पर अधिक पानी की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि वर्षा कम होती है या सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं, तो खेती की लागत बढ़ने के साथ उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। इस स्थिति में कृषि विशेषज्ञ किसानों को ऐसी धान की किस्में अपनाने की सलाह दे रहे हैं, जो कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम हैं।

कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली धान की 6 प्रमुख किस्में


1. पीआर-126 (PR-126)

यह कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्म है, जो लगभग 90 से 93 दिनों में पक जाती है। इसे कम पानी और कम उर्वरक की आवश्यकता होती है, फिर भी यह अच्छा उत्पादन देने के लिए जानी जाती है।

2. पूसा बासमती-1509
कम पानी में खेती के लिए यह सबसे लोकप्रिय बासमती किस्मों में से एक है। सामान्य बासमती किस्मों की तुलना में इसे लगभग 33 प्रतिशत कम पानी की जरूरत होती है और यह जल्दी तैयार हो जाती है।

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3. पूसा बासमती-1847
यह किस्म कम पानी में भी अच्छा उत्पादन देती है। इसके साथ ही यह झुलसा (ब्लाइट) और झोंका जैसे प्रमुख रोगों के प्रति भी सहनशील मानी जाती है।

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4. सहभागी (Sahbhagi)
कम वर्षा और सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए यह एक उपयुक्त किस्म है। जहां पानी की उपलब्धता सीमित होती है, वहां भी यह बेहतर प्रदर्शन करती है।

5. प्रभात और तुरंता
ये दोनों किस्में 80 से 110 दिनों के बीच तैयार हो जाती हैं। इन्हें विशेष रूप से ऊपरी (अपलैंड) क्षेत्रों के लिए उपयुक्त माना जाता है और कम पानी की स्थिति में भी अच्छी पैदावार देती हैं।

6. डीआरआर धान-100 (कमला)
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित डीआरआर धान-100 (कमला) कम पानी में खेती करने वाले किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है।

इस किस्म की प्रमुख विशेषताएं:

  • सामान्य धान की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत अधिक उत्पादन देने की क्षमता।
  • करीब 130 दिनों में तैयार होने वाली फसल, जो पारंपरिक किस्मों से 15–20 दिन पहले पक जाती है।
  • कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने की क्षमता और सूखे को कुछ हद तक सहन करने की विशेषता।
  • इसका चावल सांबा मसूरी जैसी गुणवत्ता और स्वाद वाला माना जाता है।
  • मजबूत तनों के कारण फसल गिरने की संभावना कम रहती है।
  • इस किस्म से लगभग 20 प्रतिशत कम मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है, जिससे यह पर्यावरण के लिए भी बेहतर मानी जाती है।
  • इसे CRISPR तकनीक की मदद से विकसित किया गया है, जिसमें बाहरी डीएनए का उपयोग नहीं किया गया है।

अल नीनो के बीच भी बढ़ा धान का रकबा

अल नीनो और गर्मी की आशंकाओं के बावजूद इस खरीफ सीजन में धान की खेती को लेकर सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। देश के कुछ हिस्सों में मानसून समय से पहले पहुंचने के कारण किसानों ने पिछले वर्ष की तुलना में अधिक क्षेत्र में धान की बुवाई की है।

कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 12 जून तक, धान का रकबा 3.88 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 4.98 लाख हेक्टेयर हो गया है। यानी करीब 1.09 लाख हेक्टेयर (लगभग 28 प्रतिशत) की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि, खरीफ फसलों की कुल बुवाई पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 3.9 प्रतिशत कम रही। इस अवधि तक 84.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 88.04 लाख हेक्टेयर था। 

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