इस तरह अपनी मक्का को प्रमुख रोगों से बचाएं

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इस तरह अपनी मक्का को प्रमुख रोगों से बचाएं – संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व में सर्वाधिक मक्का उत्पादन करने करने वाला देश है जो कुल मक्का उत्पादन में 35 प्रतिशत की हिस्सेदारी अकेले अदा करता है तहा मक्का के अमेरिका की अर्थव्यवस्था का संचालक भी कहा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका मक्का की उत्पादकता (79.6 प्रतिशत) उत्पादित करता है जोकि विश्व की औसत का दोगुना है, जबकि भारत में मक्का की औसत उत्पादकता 2.43 टन प्रति हेक्टेयर है। भारत देश में वर्ष भर सभी राज्यों में मक्का की खेती की जाती है। विभिन्न उद्देश्यों से जैसे- अनाज, हरा चारा, हरा भुट्टा, मिठी मक्का तथा पोप कॉर्न आदि के लिए की जाती है।

मक्का कार्बोहाइड्रेट का बहुत अच्छा स्रोत है, मक्का के दाने में 10 % प्रोटीन पायी जाती है। यह एक बहपयोगी फसल है। देश के प्रमुख मक्का उत्पादन राज्य आंध्र प्रदेश (20.9 प्रतिशत), कर्नाटका (16.5 प्रतिशत), राजस्थान (9.9 प्रतिशत), महाराष्ट्र (9.1 प्रतिशत), बिहार (8.9 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश (4.4 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश आदि। इसके अतिरिक्त जम्मू कश्मीर तथा उत्तरी पूर्वी राज्यों में भी की मक्का की खेती की जाती है। मक्का के रोग संभावित उपज को साकार करने में एक मुख्य बाधा है जिसके कारण फसल उत्पादन की मात्रा व गुणवत्ता में कमी आ जाती है साथ ही साथ फसल लागत में भी वृद्धि होती है।

मक्का की फसल में लगने वाले मुख्य रोग एवं रोगों का निम्नलिखित प्रबंधन –

मक्का का तुलासिता रोग – भारत में मक्का तुलासिता रोग हिमालय के तराई क्षेत्रों मे उग्रता से आता है मक्का की उपज उत्पादन मे इस रोग के कारण 63 प्रतिशत तक की हानि प्रतिवेदित की गयी है ।

लक्षण – इस रोग के लक्षण पत्तियों पर लम्बे, बड़े, हल्के पीले, भूरे रंग के और ऊतकक्षय (मृत ऊतक) धारियों के रूप में प्रकट होते हैं तथा पत्तियों की निचली सतह पर ऊन के जैसी सफ़ेद रंग की कवक की कवक जाल दिखाई पड़ती है। पौधे की वृद्धि में कमी होने के कारण पौधा लबाई में छोटा रह जाता है और पुष्पमंजरी कुरूप हो जाती है। भुट्टे के निर्माण आंशिक या पूर्णतया नहीं हो पाता और यदि भुट्टे का निर्माण हो भी जाता है तो उसमें दाना नहीं बन पाता है तथा रोग की उग्र अवस्था में सम्पूर्ण पौधा सूखकर भूसे के रंग का हो जाता है।

प्रबंधन –

  • रोगरोधी कि़स्मों को उगाना जैसे- डीएमआर-1, 2, 3, 4, 5, गंगा-5, अमरिलो और फिल आदि।
  • फसल चक्र 3-4 वर्ष का अपनायें।
  • रोगग्रस्त पौधों एवं फसल अवशेषों को जला कर नष्ट करें।
  • बीज उपचार: रिडोमिल 25WP @ 4 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
  • खड़ी फसल में रिडोमिल 25WP @ 6 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर बुवाई के तीन सप्ताह बाद छिड़काव करें।

डंठल गलन रोग – मक्का का डंठल गलन रोग कई देशों में पाया जाता है जैसे की संयुक्त राज्य अमेरीका, इजरायल, ग्रीस, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, भारत और नेपाल आदि। भारत में यह रोग कुछ राज्यों जैसे- उत्तर प्रदेश, बिहार, कश्मीर, राजस्थान और आंध्र प्रदेश आदि में उग्र अवस्था में पाया जाता है। यह रोग भारी मात्र में हानि पहुंचाता है।

लक्षण – रोग के लक्षण सर्वप्रथम पौधे के परिपक्व होने के पूर्व से ही दिखाई देने लगते हैं। रोगग्रस्त पौधों की ऊपरी पत्तियाँ प्रारम्भ में मुरझा तथा अंत में सूख जाती हैं जो कि शीघ्र ही पौधे की निचली पत्तियों की ओर वृद्धि करता है। डंठल गलन रोग के लक्षण पौधों के ऊपरी भाग (शीर्ष) या पौधों के आधार से प्रारम्भ होते हैं। आधार गलन रोग में पौधे की पत्तियाँ पीली और प्रभावित ऊतक भूरे रंग के तथा मुलायम पानी में भीगे हुए दिखाई पड़ते हैं जबकि शीर्ष गलन रोग के लक्षण पौधे के ऊपरी भाग पर झुलसा के रूप में प्रकट होते हैं तथा पौधे के ऊपरी भाग में गलन हो जाती है और अंत में सम्पूर्ण पौधा सूखा हुआ दिखाई देता है।

प्रबंधन –

  • फसल चक्र अपनायें।
  • रोगग्रस्त फसल अवशेषों को नष्ट एवं जला दें।
  • मक्के के पौधे के आस पास पानी का ठहराव नहीं हो।
  • जनजाति कि़स्मों की बुवाई करना जैसे- डीकेई-9770, 9712 9740, 9555, 9727, 9560 और सीएम-113 7
  • क्लोरोसिन @ 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मृदा को दस-दस के अंतराल पर पुष्प बनने से पहले भिगोयें।

मक्के का लीफ ब्लाईट – मक्का का यह रोग एक महत्वपूर्ण है तथा यह रोग विश्वव्यापी एवं जहाँ पर मक्का की खेती की जाती है उन जगहों पर रोग पाया जाता है। और इस रोग के कारण भारत में प्रत्येक राज्य, जहां मक्का की खेती की जाती है वहाँ पर मक्के का (Maydis Leaf Blight) रोग लगता है। यह रोग ज़्यादातर 41-70 प्रतिशत तक उत्पादन में हानि पहुंचाता है।

लक्षण – मक्के की पत्तियों की शिराओं के बीच में पीले एवं भूरे अण्डागकार धब्बे बनते हैं जो बाद में लम्बे होकर चौकोर हो जाते हैं। इनसे पत्तियां जली हुई दिखाई देने लगती हैं ।

प्रबंधन

  • रोगग्रस्त पौधों को जला दें।
  • फसल चक्र अपनायें।
  • रोगरहित प्रजातियों की बुवाई करना जैसे- सीएम-104,105, एससी-24-(92)-3-2-1-1, सुवन-1, एससी- 7-2-1-2-6-1, और सीएम-116 7
  • दो से चार छिड़काव डाईथेन जेड -78 और डाईथेन एम-45 @ 2.5 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोग के लक्षण दिखाई देने पर छिड़काव करें।

मक्के का टर्सिकम पत्ती झुलसा रोग – मक्के का टर्सिकम पत्ती झुलसा रोग को उत्तरी झुलसा रोग के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग मक्का उत्पादित देशों में मक्का उत्पादन में एक प्रमुख्य बाधा है। भारत में यह रोग उन सभी राज्यों में पाया जाता है जिन राज्यों में मक्के की खेती की जाती है। इस रोग के कारण फसल उपज में लगभग 70 प्रतिशत तक की हानि प्रतिवेदित की गई है।

लक्षण – रोग के लक्षण आसानी से पत्तियों पर पहचाने जा सकते हैं। रोग के लक्षण पत्तियों पर छोटे-छोटे अंडाकार या गोलाकार जल में भीगे हुए जैसे दिखाई देते हैं जो कि बाद में सर्वप्रथम लम्बे तर्कू आकार उत्तकक्षय (मृत ऊतक) हो जाते हैं। प्रारम्भ में रोग के लक्षण पौधों की निचली पत्तियों से आरम्भ होकर कुछ समय पश्चात पौधों की ऊपरी पत्तियों की ओर बढ़ता है। अनुकूल वातावरण मिलने पर धब्बों की संख्या एवं उनके आकार में वृद्धि होती है और धीरे-धीरे धब्बे पौधों की जड़ को छोड़कर सभी भागों पर फैल जाते हैं। धब्बों की सघनता अधिक हो जाती है और आपस में मिल जाते हैं जिससे सम्पूर्ण पत्तियाँ झुलसी हुई दिखाई देते हैं।

प्रबंधन –

  • रोगग्रस्त फसल अवशेषों को नष्ट एवं जला दें।
  • रोग रोधी कि़स्मों की बुवाई करना जैसे- गंगा-4, हिम-123, वीएल-43, हिम-129, केएच-810 और प्रभात इत्यादि।
  • दो से तीन छिड़काव डाईथेन जेड-78 @ 2.5 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोग के लक्षण दिखाई देने पर सात दिन के अंतराल पर करें।
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