कपास का रकबा बढ़ेगा, धान घटेगा

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भारतीय बीज कंपनियों के शीर्ष संगठन नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनएसए) के अध्यक्ष श्री मांडव प्रभाकर राव के मुताबिक बाजार कारकों के असर और मानसून की अनिश्चितताओं से आगामी खरीफ सीजन में फसलों के पैटर्न में बड़ा बदलाव आएगा और कपास एवं तिलहनी की तरफ रुझान बढऩे की संभावना है। श्री राव हैदराबाद स्थित नुजीवीडू सीड्स लिमिटेड (एनएसएल) के प्रबंध निदेशक हैं। खरीफ सीजन कैसा रहेगा, इसके बारे में बीज उद्योग के दृष्टिकोण के बारे में उनके विचार-
मानसून में देरी पर- मानसून के ताजा अनुमान में कहा गया है कि यह देरी से आएगा, लेकिन इससे पहले के दो-तीन अनुमानों में इससे विपरीत बात कही गई थी। मानसून की देरी से आवक के बावजूद जून में बारिश शुरू होने पर बुआई शुरू होगी और इसलिए बीज उद्योग को इस देरी पर अनावश्यक परेशान होने की जरूरत नहीं है। हमारे जैसे बड़े देश में एक सामान्य वर्ष में भी कुछेक हिस्सों में 10 फीसदी बारिश कम रहना आम बात है।
खरीफ सीजन पर असर
पूरे देश में कपास का रकबा, विशेष रूप से तेलंगाना और महाराष्ट्र में बढ़ेगा, क्योंकि अन्य फसलों के मुकाबले इस फसल को कम बारिश की जरूरत होती है। इस फसल का रकबा पिछले साल के रिकॉर्ड रकबे 1.25 करोड़ हेक्टेयर के बराबर या ज्यादा रहेगा। पिछले कपास वर्ष में इस जिंस की कीमतें अच्छी नहीं रहीं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से कीमतें बढऩा शुरू हो गई हैं। अगर बारिश पर्याप्त रही तो कर्नाटक में मक्के का रकबा बढ़ सकता है, जबकि आंध्र प्रदेश में चने और मिर्च के रकबे में बढ़ोत्तरी के आसार हैं। कीमतें ऊंची होने से दलहन के रकबे में अच्छी खासी बढ़ोत्तरी होगी। मानसून के पूर्वानुमान को देखते हुए हमारा अनुमान है। कि धान के रकबे में 20 से 30 लाख हेक्टेयर में कमी आएगी। जिसकी आमतौर पर देश में करीब 4.5 करोड़ हेक्टेयर में बुआई होती है। धान की कीमतें भी नीची हैं। सोयाबीन का रकबा भी घट सकता है, क्योंकि पिछले साल कीमतें अच्छी नहीं थीं और सोयाबीन के रकबे के एक हिस्से में इस बार कपास और मक्का उगाई जा सकती है।
आमतौर पर यह उद्योग हर साल कीमतों में 10 फीसदी बढ़ोत्तरी कर लागत में वृद्धि का बोझ ग्राहकों पर डालने में सफल रहा है। हालांकि बीटी कपास इसका अपवाद है, जिसकी कीमतें पिछले चार वर्षों से एक समान बनी हुई हैं। तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य बीटी कपास की कीमत को नियंत्रित करते हैं और इन राज्यों ने इस साल भी कीमतों में किसी बढ़ोत्तरी को मंजूरी देने से इंकार कर दिया है। इसलिये कंपनियां देश भर में चार साल पहले तय की गई कीमत पर बीज की बिक्री कर रही हैं। हालांकि तेलंगाना सरकार ने बीज उत्पादकों को फायदा पहुंचाने के लिये प्रत्येक पैकेट पर रॉयल्टी 90 रुपये से घटाकर 50 रुपये कर दी थी। लेकिन उच्च न्यायालय ने अपना फैसला तकनीकी स्वामित्व धारक कंपनी मॉन्सेंटो के पक्ष में बरकरार रखा। इसलिये उद्योग को इस साल कोई राहत नहीं मिल सकी। हम चाहते हैं कि कम से कम अगले साल कीमतों में संशोधन किया जाना चाहिए, क्योंकि कंपनियां उत्पादन की बढ़ी लागत समायोजित करने की स्थिति में नहीं हैं।

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