सिवनी: पीएसबी से बढ़ेगी फास्फोरस की उपलब्धता, मिट्टी की उर्वरा शक्ति होगी मजबूत
19 जून 2026, सिवनी: सिवनी: पीएसबी से बढ़ेगी फास्फोरस की उपलब्धता , मिट्टी की उर्वरा शक्ति होगी मजबूत – कृषि विज्ञान केंद्र सिवनी के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. शेखर सिंह बघेल ने किसानों को फास्फेट घोलक जीवाणु (पीएसबी) जैव उर्वरक के उपयोग की सलाह देते हुए बताया कि लगातार कई वर्षों तक डीएपी एवं अन्य फास्फोरस युक्त उर्वरकों के प्रयोग से मृदा में बड़ी मात्रा में फास्फोरस स्थिर अवस्था में जमा हो जाता है, जो पौधों को आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में पीएसबी जैव उर्वरक मृदा में उपस्थित अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील बनाकर पौधों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने बताया कि पीएसबी जैव उर्वरक में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु विभिन्न कार्बनिक अम्ल का उत्सर्जन कर मृदा में स्थिर फास्फोरस को घुलनशील अवस्था में परिवर्तित करते हैं। इससे मृदा में जमा लगभग 30 से 40 प्रतिशत फास्फेट पौधों को उपलब्ध हो पाता है, जिससे फसलों की बढ़वार बेहतर होती है तथा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ फफूंद जनित रोगों के नियंत्रण में भी सहायता मिलती है।
डॉ. बघेल ने बताया कि वर्तमान में पीएसबी जैव उर्वरक पाउडर एवं तरल दोनों रूपों में उपलब्ध है। किसान एक एकड़ क्षेत्र के लिए 3 किलोग्राम पाउडर आधारित अथवा 2 से 3 लीटर तरल आधारित पीएसबी कल्चर का उपयोग कर सकते हैं। इसके प्रयोग के लिए निर्धारित मात्रा को 10 से 15 लीटर पानी में घोलकर 40 से 50 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट अथवा अन्य जैविक खाद के साथ मिलाएं। इस मिश्रण को जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ाने के लिए रात भर बोरियों से ढंककर रखें।
इसके बाद तैयार मिश्रण को बुवाई अथवा रोपाई से पूर्व एक एकड़ खेत में समान रूप से छिड़ककर मिट्टी में मिला दें तथा हल्की सिंचाई करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि पीएसबी का प्रयोग केवल मिट्टी उपचार के लिए किया जाना चाहिए तथा इसे पत्तियों पर छिड़काव के रूप में उपयोग नहीं करना चाहिए।
डॉ. बघेल ने कहा कि फास्फेट घोलक जीवाणु मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाने और फसलों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने का एक प्रभावी एवं पर्यावरण अनुकूल माध्यम है। इसके अतिरिक्त किसान एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, माइकोराइजा, पोटाश घोलक जीवाणु, ट्राइकोडर्मा एवं राइजोबियम जैसे अन्य जैव उर्वरकों का भी उपयोग कर सकते हैं। इन सूक्ष्मजीव आधारित जैव उर्वरकों के माध्यम से भूमि में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाकर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है तथा मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है।
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