गाभिन गाय एवं भैंस में संभावित प्रसव के लक्षण
लेखक: निर्भय भावसार1, सोनू कुमार यादव2, 1एम.वी. एससी. –प्रसार शिक्षा विभाग, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली, 2सहायक प्राध्यापक, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग, एस.एम. कॉलेज ऑफ वेटरनरी साइंस एंड एनिमल रिसर्च, मथुरा
04 अगस्त 2026, भोपाल: गाभिन गाय एवं भैंस में संभावित प्रसव के लक्षण – गाय एवं भैंस में गर्भावस्था की अवधि पूर्ण होने पर शरीर में अनेक शारीरिक एवं व्यवहारिक परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं, जो आसन्न प्रसव (Parturition) के संकेत होते हैं। इन लक्षणों की पहचान करना पशुपालकों के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे प्रसव के समय उचित देखभाल एवं आवश्यक प्रबंधन किया जा सकता है। सामान्यतः प्रसव से कुछ दिन पूर्व से लेकर कुछ घंटे पहले तक शरीर के विभिन्न अंगों में परिवर्तन दिखाई देते हैं तथा पशु के व्यवहार में भी बदलाव आने लगता है। यदि इन लक्षणों पर ध्यान दिया जाए, तो प्रसव संबंधी जटिलताओं को कम किया जा सकता है तथा माता एवं नवजात बछड़े की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
प्रसव पूर्व लक्षणों की पहचान के लाभ– प्रसव पूर्व लक्षणों की सही पहचान पशुपालकों के लिए अत्यंत लाभकारी होती है। इससे प्रसव के समय गाय या भैंस को स्वच्छ, शांत एवं आरामदायक वातावरण प्रदान कर उचित प्रबंधन एवं देखभाल सुनिश्चित की जा सकती है। संभावित प्रसव की जानकारी होने से कठिन प्रसव (Dystocia) अथवा अन्य जटिलताओं की स्थिति में समय रहते पशु चिकित्सक की सहायता प्राप्त की जा सकती है, जिससे माता एवं नवजात बछड़े की मृत्यु दर में कमी आती है। इसके अतिरिक्त समय पर निगरानी एवं उचित देखभाल से अपरा रुकना, गर्भाशय संक्रमण तथा अन्य प्रसवोत्तर रोगों की संभावना भी कम हो जाती है। स्वस्थ एवं सामान्य प्रसव के परिणामस्वरूप पशु शीघ्र स्वस्थ होकर अपनी सामान्य दुग्ध उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता प्राप्त कर लेता है, जिससे पशुपालक को अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
1. अयन (थन) का पूर्ण विकास- प्रसव के निकट आने पर गाय एवं भैंस के थनों का आकार बढ़ने लगता है तथा वे पूर्ण रूप से विकसित होकर भर जाते हैं। यह परिवर्तन दुग्ध ग्रंथियों की सक्रियता तथा कोलोस्ट्रम (खीस) के निर्माण के कारण होता है। थन कड़े एवं तने हुए दिखाई देते हैं तथा स्तनों में दूध का दबाव महसूस किया जा सकता है। कई पशुओं में प्रसव से कुछ समय पहले स्तनों से खीस की बूंदें स्वतः निकलने लगती हैं। अधिक दुग्ध उत्पादन करने वाली गायों एवं भैंसों में यह परिवर्तन अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। थनों का पूर्ण विकास इस बात का संकेत है कि प्रसव का समय निकट है और पशु को विशेष देखभाल की आवश्यकता है।
2. श्रोणि क्षेत्र एवं पूँछ के आसपास की मांसपेशियों का शिथिल होना- प्रसव के समय शरीर में हार्मोनल परिवर्तन होने के कारण श्रोणि क्षेत्र के स्नायु एवं मांसपेशियाँ ढीली पड़ने लगती हैं। पूँछ के दोनों ओर स्थित स्नायु शिथिल होकर धँसे हुए दिखाई देते हैं और पिछले भाग में ढीलापन स्पष्ट दिखाई देता है। यह परिवर्तन प्रसव मार्ग को चौड़ा एवं लचीला बनाने में सहायक होता है, जिससे बछड़े का बाहर निकलना आसान हो जाता है। यह लक्षण सामान्यतः प्रसव से कुछ दिन पहले दिखाई देने लगता है और अनुभवी पशुपालक इसकी सहायता से प्रसव के समय का अनुमान लगा सकते हैं।
3. व्यवहार में परिवर्तन- प्रसव के निकट आने पर गाय एवं भैंस के व्यवहार में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देते हैं। पशु बेचैन हो जाता है तथा बार-बार उठने-बैठने लगता है। कई बार वह झुंड से अलग होकर किसी शांत स्थान पर रहने का प्रयास करता है। भोजन एवं पानी के प्रति उसकी रुचि कम हो जाती है तथा वह सामान्य से कम चारा खाता है। कुछ पशु बार-बार पीछे मुड़कर पेट की ओर देखते हैं, पूँछ उठाते हैं या जमीन को खुरचते हैं। प्रसव पीड़ा बढ़ने पर पशु अधिक बेचैन दिखाई देता है और लेटने तथा उठने की क्रिया बार-बार करता है।
4. योनिद्वार में परिवर्तन एवं श्लेष्मीय स्राव-प्रसव के निकट आने पर योनिद्वार में सूजन आ जाती है तथा उसकी मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। योनिद्वार से पारदर्शी, चिपचिपा एवं श्लेष्मीय द्रव निकलने लगता है, जो गर्भाशय ग्रीवा के खुलने का संकेत होता है। यह स्राव प्रसव मार्ग को चिकना बनाकर बछड़े के बाहर निकलने में सहायता करता है। प्रसव के कुछ समय पहले जल थैली (Water Bag) दिखाई देने लगती है, जो यह संकेत देती है कि प्रसव की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। इस समय पशु पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है।
5. उदर एवं भ्रूण की स्थिति में परिवर्तन- प्रसव से पहले गर्भस्थ बछड़ा धीरे-धीरे श्रोणि क्षेत्र की ओर खिसकने लगता है, जिसके कारण पेट नीचे की ओर झुका हुआ दिखाई देता है। पशु के शरीर के दोनों ओर असमानता दिखाई दे सकती है तथा भ्रूण की हलचल भी स्पष्ट महसूस की जा सकती है। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि भ्रूण ने प्रसव के लिए उचित स्थिति ग्रहण कर ली है। इस अवस्था में पशु को अनावश्यक तनाव एवं अधिक चलने-फिरने से बचाना चाहिए।
6. शारीरिक क्रियाओं में परिवर्तन- प्रसव के निकट आने पर गाय एवं भैंस में श्वसन दर एवं हृदय गति में हल्की वृद्धि देखी जा सकती है। पशु बार-बार मूत्र त्याग करने का प्रयास करता है तथा पूँछ को बार-बार उठाता है। कुछ पशु बार-बार बैठते और खड़े होते हैं तथा दर्द के कारण हल्की आवाजें भी निकाल सकते हैं। ये सभी लक्षण प्रसव पीड़ा के प्रारंभ होने के संकेत होते हैं।
7. जल थैली का बाहर आना- प्रसव की प्रथम अवस्था पूर्ण होने के बाद जल थैली (Water Bag) योनिद्वार से बाहर दिखाई देने लगती है। इसके कुछ समय बाद सामान्य स्थिति में बछड़े के आगे के दोनों पैर एवं सिर दिखाई देने लगते हैं। यदि जल थैली फटने के बाद लंबे समय तक प्रसव आगे न बढ़े या बछड़े की स्थिति असामान्य प्रतीत हो, तो तुरंत पशु चिकित्सक की सहायता लेनी चाहिए, जिससे प्रसव संबंधी जटिलताओं से बचा जा सके।
निष्कर्ष- गाभिन गाय एवं भैंस में थनों का भरना, पूँछ के आसपास की मांसपेशियों का ढीला पड़ना, व्यवहार में परिवर्तन, योनिद्वार में सूजन एवं श्लेष्मीय स्राव, उदर के आकार में परिवर्तन तथा जल थैली का बाहर आना प्रसव के प्रमुख लक्षण हैं। इन लक्षणों की समय पर पहचान करके पशुपालक उचित देखभाल एवं प्रबंधन कर सकते हैं, जिससे प्रसव सामान्य रूप से संपन्न हो तथा माता एवं नवजात बछड़े का स्वास्थ्य सुरक्षित रखा जा सके।
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