धान में पत्ती लपेट सुंडी और भूरे फुदके का खतरा, पीएयू लुधियाना ने बताई दवा और मात्रा
11 सितंबर 2026, लुधियाना: धान में पत्ती लपेट सुंडी और भूरे फुदके का खतरा, पीएयू लुधियाना ने बताई दवा और मात्रा – पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना ने सितंबर महीने की ताजा फार्म एडवाइजरी में धान किसानों को पत्ती लपेट सुंडी (लीफ फोल्डर) और भूरे फुदके (प्लांटहॉपर) के प्रकोप से सावधान रहने की सलाह दी है। विश्वविद्यालय के मुताबिक, अभी धान की फसल इन दोनों कीटों के लिए संवेदनशील अवस्था में है।
पीएयू की सलाह के अनुसार, जब पत्तियों को नुकसान 10 फीसदी तक पहुंच जाए, तभी पत्ती लपेट सुंडी के लिए दवा का छिड़काव करना चाहिए। इससे पहले छिड़काव करने से मित्र कीटों को भी नुकसान पहुंचता है।
पत्ती लपेट सुंडी के लिए ये दवाएं कारगर
विश्वविद्यालय ने प्रति एकड़ 100 लीटर पानी में फेम 480 एससी (फ्लूबेंडियामाइड) 20 मिलीलीटर, या टाकुमी 20 डब्ल्यूजी 50 ग्राम, या कोराजन 18.5 एससी 60 मिलीलीटर, या मोर्टार 75 एसजी 170 ग्राम, या सुप्रीमो 50 डब्ल्यूपी 400 ग्राम मिलाकर छिड़काव करने की सलाह दी है। किसान इनमें से कोई एक दवा चुन सकते हैं।
भूरे फुदके पर नियंत्रण के लिए विकल्प
भूरे फुदके की संख्या ज्यादा बढ़ने पर पीएयू ने प्रति एकड़ 100 लीटर पानी में पेक्सालॉन 10 एससी (ट्राईफ्लूमेजोपाइरिम) 94 मिलीलीटर, या चेस 50 डब्ल्यूजी (पाइमेट्रोजिन) 120 ग्राम, या ओशीन/टोकन/डोमिनेंट 20 एसजी 80 ग्राम, या उलाला 50 डब्ल्यूजी (फ्लोनिकामिड) 60 ग्राम के इस्तेमाल की सलाह दी है।
जिन किसानों को जैविक विकल्प चाहिए, वे नीम आधारित इकोटिन (एजाडिरेक्टिन 5 फीसदी) का 80 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव कर सकते हैं। विश्वविद्यालय ने चेतावनी दी है कि दवा का छिड़काव सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही करें, ताकि कीटों में दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता न बढ़े।
पीएयू के कीट वैज्ञानिकों का कहना है कि खेत की नियमित निगरानी सबसे जरूरी है। किसानों को हफ्ते में कम से कम दो बार खेत में जाकर पत्तियों और तने पर कीटों की मौजूदगी देखनी चाहिए, ताकि नुकसान की सीमा तय होने पर ही सही समय पर छिड़काव किया जा सके।
विश्वविद्यालय ने यह भी सुझाव दिया है कि छिड़काव करते समय दवा की मात्रा और पानी की मात्रा दोनों का सही अनुपात बनाए रखना जरूरी है। कम पानी में ज्यादा दवा मिलाने से पत्तियां जल सकती हैं, जबकि तय मात्रा से कम दवा डालने पर कीट पर असर नहीं होता और बेवजह पैसा भी खर्च होता है। खेत के अलग-अलग हिस्सों में कीट के प्रकोप की स्थिति अलग हो सकती है, इसलिए एक साथ पूरे खेत में दवा डालने से पहले नुकसान के स्तर की जांच जरूरी है।
छिड़काव सुबह या शाम के समय करने की सलाह दी जाती है, जब तेज धूप और हवा नहीं होती, क्योंकि इससे दवा पत्तियों पर ज्यादा देर तक टिकती है और असर बेहतर होता है। बारिश की आशंका होने पर छिड़काव टालने की भी सलाह दी गई है, क्योंकि बारिश से दवा धुल जाती है और छिड़काव बेकार चला जाता है।
पंजाब के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े धान उत्पादक राज्यों में भी सितंबर के महीने में इन दोनों कीटों का असर देखा जाता है। किसानों को सलाह है कि दवा खरीदते समय पैकेट पर बैच नंबर और एक्सपायरी तारीख जरूर जांच लें, ताकि नकली या पुरानी दवा से नुकसान न हो।
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