रायपुर : ढैंचा की हरी खाद अपनाकर किसान घटाएं यूरिया खपत, बढ़ाएं मिट्टी की उर्वरता
06 जून 2026, रायपुर: रायपुर : ढैंचा की हरी खाद अपनाकर किसान घटाएं यूरिया खपत, बढ़ाएं मिट्टी की उर्वरता – कृषि विभाग किसानों को हरी खाद के रूप में ढैंचा (सेसबेनिया) के उपयोग के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। ढैंचा एक दलहनी फसल है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया पर निर्भरता कम करने में मदद करती है। विभाग ने जिले के धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी तथा सोयाबीन आधारित फसल चक्रों में ढैंचा को शामिल करने की सलाह दी है।
प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ढैंचा को खेत में मिलाने से प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध होती है। इतनी नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए सामान्यतः 90 से 130 किलोग्राम यूरिया की जरूरत पड़ती है। ऐसे में किसान प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत कर सकते हैं। साथ ही जैविक कार्बन और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ने से मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार होता है।
मानसून में करें बुवाई, 40 दिन बाद खेत में मिलाएं
ढैंचा की बुवाई मानसून की शुरुआत में 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से की जाती है। बुवाई के 35 से 40 दिन बाद, जब पौधे 1 से 1.5 मीटर ऊंचे हो जाएं और फूल आने की शुरुआती अवस्था में हों, तब उन्हें रोटावेटर, डिस्क हैरो या मिट्टी पलटने वाले हल से खेत में मिला देना चाहिए। 15 से 20 दिनों में ढैंचा सड़-गलकर मिट्टी में मिल जाता है और उसके पोषक तत्व अगली फसल को मिलते हैं।
मिट्टी की सेहत सुधरेगी, मिलेगा अनुदान
कृषि विभाग के अनुसार ढैंचा हरी खाद के रूप में कम लागत वाला और पर्यावरण अनुकूल विकल्प है। इसके नियमित उपयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है, लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं और खेती अधिक टिकाऊ बनती है। किसानों को ढैंचा बीज की लागत पर 50 प्रतिशत अनुदान भी दिया जा रहा है। विभाग ने किसानों से मानसून शुरू होते ही ढैंचा की बुवाई कर हरी खाद के रूप में इसका अधिक से अधिक उपयोग करने की अपील की है।
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