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राज्य कृषि समाचार (State News)

सोयाबीन-मक्का छोड़ी, रोजेल की खेती शुरू की: हरदा के किसान को हो रहा हेक्टेयर में ढाई-तीन लाख का मुनाफा

25 अक्टूबर 2026, हरदा: सोयाबीन-मक्का छोड़ी, रोजेल की खेती शुरू की: हरदा के किसान को हो रहा हेक्टेयर में ढाई-तीन लाख का मुनाफा – मध्य प्रदेश के हरदा जिले में नहाल खेड़ा गांव के किसान संदीप विश्नोई ने परंपरागत सोयाबीन और मक्का की खेती छोड़कर रोजेल की खेती शुरू की है, जिसे अंबाड़ी या लाल अंबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है। जिला मुख्यालय से महज पांच किलोमीटर दूर इस गांव में अब उनकी फसल देखने आसपास के किसान भी पहुंचने लगे हैं।

संदीप पिछले करीब आठ साल से खेती कर रहे हैं और उन्होंने यह काम अपने पिता से संभाला था। कुछ समय पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर रोजेल की खेती के बारे में जानकारी जुटाई और बीज इंदौर से लाकर प्रयोग के तौर पर बुवाई शुरू की।

जून में बुवाई, नवंबर में कटाई

रोजेल की बुवाई जून-जुलाई में होती है और फसल तैयार होने में करीब पांच महीने लगते हैं, यानी कटाई नवंबर में होती है। पौधे की सूखी पंखुड़ियां और बीज, दोनों ही बाजार में बिकते हैं।

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संदीप के मुताबिक सूखी पंखुड़ियों का बाजार भाव 25 हजार से 30 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक मिलता है, और एक हेक्टेयर में औसतन 8 से 10 क्विंटल पंखुड़ियां निकलती हैं। इसी तरह बीज का भाव 18 हजार से 20 हजार रुपये प्रति क्विंटल रहता है, जबकि बीज की उपज 5 से 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। सारा खर्च निकालने के बाद एक हेक्टेयर से करीब ढाई से तीन लाख रुपये की आय होने का अनुमान संदीप ने बताया, जो परंपरागत सोयाबीन-मक्का की तुलना में कहीं ज्यादा है।

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संदीप कहते हैं, “जब कुछ नया करने का जज्बा होता है तो खेती भी कमाई का नया रास्ता बन सकता है।” वे चाहते हैं कि इस फसल की जानकारी ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचे। उनका कहना है, “हम चाहते हैं कि इस फसल की जानकारी अन्य किसानों तक पहुंचे।”

रोजेल का इस्तेमाल चाय, जैम, चटनी और शरबत जैसी चीजों में होता है, और औषधीय गुणों के चलते भी इसकी मांग बढ़ रही है। रोजेल की खेती में सिंचाई और खाद की जरूरत सोयाबीन की तुलना में कम बताई जाती है, जिससे लागत भी घटती है। हालांकि अभी इसके लिए बड़े स्तर पर मंडी व्यवस्था न होने के कारण किसानों को खरीदारों से सीधे संपर्क करना पड़ता है।

हरदा जिले में ज्यादातर किसान अब भी सोयाबीन-गेहूं के चक्र पर निर्भर हैं, लेकिन मौसम की बेरुखी और भाव में उतार-चढ़ाव की वजह से कई किसान वैकल्पिक फसलों की तरफ देखने लगे हैं। संदीप जैसे किसानों के प्रयोग इस बदलाव को गति दे रहे हैं और इलाके में रोजेल को लेकर दिलचस्पी बढ़ा रहे हैं।

पड़ोसी किसानों में भी दिलचस्पी

संदीप के खेत की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर होने के बाद हरदा और आसपास के गांवों के कई किसान खुद उनके खेत पर पहुंचकर फसल देखने और जानकारी लेने लगे हैं। कई किसान पूछते हैं कि बीज कहां से मिलेगा और बुवाई का सही समय क्या है।

संदीप का कहना है कि शुरुआत में उन्हें भी बाजार ढूंढने में मुश्किल हुई थी, लेकिन अब स्थानीय व्यापारियों के साथ-साथ दूसरे शहरों के खरीदार भी सीधे संपर्क करने लगे हैं। वे मानते हैं कि अगर ज्यादा किसान इस फसल की तरफ आएं तो आगे चलकर संगठित मंडी व्यवस्था बनने में भी आसानी होगी, जिससे भाव को लेकर अनिश्चितता कम होगी।

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