सेलम में सुपारी के बागानों पर माइट का असर, कृषि विश्वविद्यालय ने दी डाइकोफॉल के छिड़काव की सलाह
25 अक्टूबर 2026, सेलम (तमिलनाडु): सेलम में सुपारी के बागानों पर माइट का असर, कृषि विश्वविद्यालय ने दी डाइकोफॉल के छिड़काव की सलाह – तमिलनाडु के सेलम जिले में सुपारी यानी अरेकानट के बागानों पर माइट कीट का प्रकोप सामने आया है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने अक्टूबर महीने की अपनी सलाह में इसका जिक्र करते हुए किसानों को समय पर छिड़काव करने को कहा है।
सुपारी के पेड़ों पर माइट का हमला अक्सर पत्तियों और सुपारी के गुच्छों पर दिखता है। शुरुआती दौर में पत्तियों पर हल्के धब्बे नजर आते हैं, जो बाद में फैलकर पूरी पत्ती को कमजोर कर देते हैं।
डाइकोफॉल की सिफारिश
विश्वविद्यालय ने माइट नियंत्रण के लिए डाइकोफॉल 18.5 ईसी दवा की सिफारिश की है, जिसे 2.5 मिली प्रति लीटर पानी की दर से घोलकर छिड़काव करने को कहा गया है। छिड़काव पूरे पेड़ पर, खासकर पत्तियों के नीचे की सतह और सुपारी के गुच्छों पर अच्छी तरह पहुंचना चाहिए।
सेलम जिला सुपारी उत्पादन के मामले में तमिलनाडु के प्रमुख जिलों में शामिल है, और यहां के कई किसान परिवार पीढ़ियों से इस खेती पर निर्भर हैं। माइट जैसे छोटे कीटों का असर पेड़ों की सेहत और उपज, दोनों पर पड़ता है, इसलिए समय पर पहचान और उपचार जरूरी माना जाता है।
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक अक्टूबर के आसपास मौसम में नमी और हल्की गर्मी बने रहने से माइट जैसे कीटों की संख्या तेजी से बढ़ती है। इसी वजह से बागानों की नियमित निगरानी की सलाह दी जाती है, ताकि प्रकोप बढ़ने से पहले ही उसे काबू में लाया जा सके।
छिड़काव करते समय सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करना और दवा की मात्रा में सावधानी बरतना जरूरी है, क्योंकि ज्यादा मात्रा से पेड़ों को नुकसान हो सकता है और कम मात्रा से कीट पर असर नहीं होगा। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करके अपने बागान की स्थिति के हिसाब से सही समय पर छिड़काव करें। तमिलनाडु में सुपारी की खेती राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, और इसकी उपज का इस्तेमाल पान-सुपारी के अलावा कई पारंपरिक उत्पादों में भी होता है। कीट प्रकोप से बचाव सुपारी किसानों की आय को स्थिर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
हर महीने जारी होती है सलाह
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय का कीट एवं रोग सर्वे-पूर्वानुमान केंद्र हर महीने अलग-अलग जिलों और फसलों के लिए यह एडवाइजरी जारी करता है, ताकि किसान मौसम और कीट-रोग के बढ़ते खतरे के हिसाब से पहले से तैयार रह सकें। सेलम जैसे सुपारी बहुल इलाकों में बागानों की नियमित जांच इस सलाह का सबसे अहम हिस्सा मानी जाती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक सुपारी के पुराने और ऊंचे पेड़ों पर छिड़काव करना मुश्किल होता है, इसलिए कई किसान पावर स्प्रेयर या ऐसे उपकरणों का सहारा लेते हैं जिससे दवा ऊंचाई तक पहुंच सके। दवा का घोल बनाते समय मात्रा का सही हिसाब रखना और लेबल पर दी गई सावधानियों का पालन करना किसानों के लिए जरूरी बताया जाता है।
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