राज्य कृषि समाचार (State News)

मध्य प्रदेश में मूंग की खेती: प्रमुख रोग एवं उनका वैज्ञानिक प्रबंधन

मध्य प्रदेश की ‘सुनहरी फसल’ – मूंग

लेखक: प्रथम कुमार सिंह (पीएचडी स्कॉलर)डॉ. रजनी सिंह ससोदे (एचओडी डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी), डॉ. सुचरिता महापात्रा, डॉ. प्रद्युम्न सिंह आर.वी.एस.के.वी.वी. ग्वालियर, मध्य प्रदेश

18 अप्रैल 2026, भोपाल: मध्य प्रदेश में मूंग की खेती: प्रमुख रोग एवं उनका वैज्ञानिक प्रबंधन – मूंग, जिसे ‘हरा चना’ भी कहा जाता है, भारतीय कृषि और खान-पान का एक अभिन्न हिस्सा है। मध्य प्रदेश, विशेष रूप से होशंगाबाद (नर्मदापुरम), हरदा, सीहोर और रायसेन जैसे जिलों में मूंग की खेती एक क्रांति बनकर उभरी है। यह फसल न केवल कम समय (60-65 दिन) में तैयार होती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने (नाइट्रोजन स्थिरीकरण) में भी सहायक है।

हालांकि, मूंग की खेती में सबसे बड़ी बाधा रोगों का प्रकोप है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि रोगों का समय पर प्रबंधन न किया जाए, तो फसल की पैदावार में 30% से 70% तक की गिरावट आ सकती है। मध्य प्रदेश की गर्म और आर्द्र जलवायु कई विषाणुजनित और कवकजनित रोगों के लिए अनुकूल होती है। इस लेख में हम मूंग के प्रमुख रोगों, उनकी पहचान और बचाव के उपायों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

1. मूंग का पीला मोजेक वायरस

यह मध्य प्रदेश में मूंग का सबसे खतरनाक रोग है। यह एक विषाणु है जिसे सफेद मक्खी एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैलाती है।

पहचान:

  • शुरुआत में पत्तियों पर छोटे-छोटे पीले धब्बे दिखाई देते हैं।
  • धीरे-धीरे पूरी पत्ती पीली पड़ जाती है, लेकिन नसें (veins) हरी रहती हैं।
  • गंभीर अवस्था में पूरी फसल सुनहरी पीली दिखने लगती है और फलियां नहीं बनतीं।

निवारण प्रबंधन:

  • प्रतिरोधी किस्में: हमेशा रोगरोधी किस्में जैसे PDM-139 (सम्राट), SML-668, या शिखा ही बोएं।
  • सांस्कृतिक उपाय: खेत से खरपतवार हटाते रहें क्योंकि सफेद मक्खी इन्हीं पर पनपती है।

रासायनिक नियंत्रण:

यदि खेत में सफेद मक्खी दिखाई दे, तो तुरंत इनका छिड़काव करें:

  1. इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL (Imidacloprid): 0.5 मिली प्रति लीटर पानी।
  2. थियामेथोक्सम 25% WG (Thiamethoxam): 100 ग्राम प्रति हेक्टेयर (लगभग 0.5 ग्राम प्रति लीटर)।

2. चूर्णी फफूंद

यह रोग अधिकतर फसल पकने की अवस्था में आता है, जब तापमान में उतार-चढ़ाव होता है।

पहचान:

  • पत्तियों, तनों और फलियों पर सफेद रंग का पाउडर (आटे जैसा) जमा हो जाता है।
  • पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं और दाने छोटे रह जाते हैं।

रासायनिक नियंत्रण:

  • घुलनशील गंधक (Wettable Sulphur 80% WP): 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
  • हेक्साकोनाजोल 5% EC (Hexaconazole): 2 मिली प्रति लीटर पानी।

3. सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट

यह कवक के कारण होता है और नमी वाले मौसम में तेजी से फैलता है।

पहचान:

  • पत्तियों पर छोटे, गोल, भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जिनके किनारे लाल-भूरे होते हैं।
  • धब्बों के बीच का हिस्सा बाद में गिर जाता है, जिससे पत्तियों में छेद हो जाते हैं।

रासायनिक नियंत्रण:

  • कार्बेन्डाजिम 12% + मैनकोजेब 63% WP (Saaf): 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव अत्यंत प्रभावी है।

4. शुष्क जड़ सड़न

मध्य प्रदेश के शुष्क क्षेत्रों में जहां सिंचाई की कमी होती है, वहां यह रोग अधिक देखा जाता है।

पहचान:

  • पौधा अचानक सूखने लगता है। जड़ें उखाड़ने पर वे काली और सूखी दिखाई देती हैं।
  • तने का निचला हिस्सा छीलने पर काला दिखाई देता है।

प्रबंधन:

  • बीज उपचार: बुवाई से पहले बीज को कार्बेन्डाजिम + मैंकोजेब (2 ग्राम/किग्रा बीज) या ट्राइकोडर्मा विरिडी (5 ग्राम/किग्रा बीज) से उपचारित जरूर करें।

5. लीफ क्रिंकल वायरस

यह वायरस मुख्य रूप से बीज और एफिड्स (चेपा) द्वारा फैलता है।

  • पहचान: संक्रमित पौधे की पत्तियां सामान्य से काफी बड़ी, मोटी और झुर्रीदार  हो जाती हैं। पत्ती का सिरा नीचे की ओर मुड़ जाता है। पौधा झाड़ीनुमा हो जाता है।
  • प्रबंधन: प्रभावित पौधों को देखते ही जड़ से उखाड़कर गड्ढे में दबा दें। इसके वाहक कीट ‘एफिड’ को मारने के लिए डाइमेथोएट 30% EC का 1.5 मिली/लीटर की दर से छिड़काव करें।

रासायनिक दवाओं के प्रयोग में सावधानियां

खेती में रसायनों का उपयोग करते समय सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:

  1. प्रतीक्षा अवधि: अंतिम छिड़काव और फसल कटाई के बीच कम से कम 10-15 दिनों का अंतर रखें ताकि फसल में विषैले तत्व न रहें।
  2. तैयारी: दवा को कभी भी हाथ से न घोलें, लकड़ी की छड़ी का उपयोग करें। घोल बनाने के लिए हमेशा साफ पानी का प्रयोग करें।
  3. सुरक्षा किट: छिड़काव करते समय शरीर पर सुरक्षा कवच , दस्ताने, चश्मा और मास्क जरूर लगाएं।
  4. समय: छिड़काव हमेशा सुबह (10 बजे से पहले) या शाम (4 बजे के बाद) करें जब हवा शांत हो। हवा के विपरीत दिशा में स्प्रे न करें।
  5. मिश्रण: दो अलग-अलग प्रकार के कीटनाशकों या फफूंदनाशकों को बिना विशेषज्ञ की सलाह के न मिलाएं।
  6. संग्रहण: दवाओं को बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से दूर, ठंडी और सूखी जगह पर रखें।

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