सुकमा के आदिवासी किसान मड़कम देवा ने झींगा पालन से कमाए 5 लाख रुपये सालाना
20 सितंबर 2026, सुकमा (छत्तीसगढ़): सुकमा के आदिवासी किसान मड़कम देवा ने झींगा पालन से कमाए 5 लाख रुपये सालाना – छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल सुकमा जिले के दुब्बाटोटा गांव के किसान मड़कम देवा ने पारंपरिक खेती के साथ झींगा (श्रिम्प) और मछली पालन शुरू कर पहले ही साल में करीब 5 लाख रुपये की आय हासिल की है। मत्स्य विभाग की योजना से तालाब बनवाकर शुरू हुई यह पहल अब जिले के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।
योजना से मिली मदद
मड़कम देवा ने कृषि विज्ञान केंद्र और मत्स्य विभाग से प्रशिक्षण लेकर वैज्ञानिक तरीके से जलीय कृषि अपनाई। तालाब निर्माण के लिए उन्हें मत्स्य विभाग की योजना के तहत 7.20 लाख रुपये की सहायता मिली, जिसमें 4.20 लाख रुपये सब्सिडी के रूप में थे। तालाब में पानी की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य नवीकरणीय ऊर्जा विकास अभिकरण (क्रेडा) की सब्सिडी योजना के तहत सोलर पंप भी लगवाया गया।
इससे पहले मड़कम देवा की आजीविका पूरी तरह पारंपरिक खेती और मौसमी मजदूरी पर निर्भर थी, जो बस्तर क्षेत्र के अधिकतर आदिवासी किसानों की सामान्य स्थिति है। तालाब बनने और मछली विभाग से तकनीकी मार्गदर्शन मिलने के बाद उन्होंने पहले सामान्य मछली पालन शुरू किया, और भरोसा बढ़ने पर धीरे-धीरे झींगा पालन की ओर कदम बढ़ाया, जो मीठे पानी में अपेक्षाकृत नई तकनीक मानी जाती है।
जून तक उनके तालाब से 2.50 क्विंटल झींगा और 15 क्विंटल मछली का उत्पादन हुआ, जिससे उन्हें पहले ही वर्ष में करीब 5 लाख रुपये की आय हुई। इस शुरुआती नतीजे ने इलाके में इस मॉडल को लेकर स्थानीय किसानों के बीच उत्सुकता बढ़ा दी है।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बने देवा
रायपुर में विश्व पशु चिकित्सा दिवस कार्यक्रम में कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने मड़कम देवा की इस उपलब्धि को सम्मानित किया। जिला प्रशासन का कहना है कि सुकमा जैसे इलाकों में मीठे पानी में झींगा पालन की काफी संभावनाएं हैं, और देवा की सफलता से इलाके के अन्य किसान भी पारंपरिक खेती के साथ इस पूरक आय के स्रोत की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार अब दूर-दराज के इलाकों से भी लोग उनके तालाब से झींगा खरीदने आ रहे हैं, जिससे बिचौलियों की जरूरत कम हो गई है और उन्हें उपज का बेहतर दाम सीधे मिल रहा है।
बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित और कृषि की दृष्टि से पिछड़े माने जाने वाले इलाकों में सरकारी योजनाओं की मदद से जलीय कृषि जैसे नए विकल्प अपनाना बड़ी बात है। इससे पता चलता है कि सही प्रशिक्षण और थोड़ी सी सरकारी सहायता मिलने पर आदिवासी किसान भी पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर अतिरिक्त आय के स्रोत खड़े कर सकते हैं। इसका असर स्थानीय स्तर पर मत्स्य बीज, फीड और सोलर पंप जैसे कृषि-इनपुट कारोबार पर भी सकारात्मक पड़ सकता है।
देश में केंद्र सरकार लंबे समय से अंतर्देशीय मत्स्य पालन (इनलैंड फिशरीज) को बढ़ावा देने की नीति पर काम कर रही है, ताकि तटीय राज्यों के अलावा छत्तीसगढ़ जैसे भू-आबद्ध (लैंडलॉक्ड) राज्यों के किसान भी तालाबों के जरिए अतिरिक्त आय कमा सकें। मड़कम देवा जैसी कहानियां इस दिशा में जमीनी स्तर पर हो रहे बदलाव का उदाहरण हैं, जहां छोटे तालाबों से भी उल्लेखनीय आय संभव हो पा रही है।
बस्तर संभाग जैसे इलाकों में जहां खेती की जमीन सीमित और असिंचित रहती है, वहां तालाब-आधारित मॉडल किसानों को साल भर की स्थिर आय का एक अतिरिक्त जरिया दे सकता है, बशर्ते सरकारी विभागों से तकनीकी सहयोग और सही प्रजाति के बीज-चारे की उपलब्धता बनी रहे।
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