अंतरवर्ती खेती बनी फायदे का सौदा: किसान ने मक्का के साथ उगाई बरबटी, मिला ₹20 हजार का अतिरिक्त लाभ
25 जुलाई 2026, भोपाल: अंतरवर्ती खेती बनी फायदे का सौदा: किसान ने मक्का के साथ उगाई बरबटी, मिला ₹20 हजार का अतिरिक्त लाभ – मध्यप्रदेश के पांढुर्णा जिले में खरीफ मौसम में सर्वाधिक क्षेत्रफल में मक्का की खेती की जाती है। मक्का एक अधिक पोषक तत्व एवं उर्वरक मांगने वाली फसल है। ऐसे में कृषि विभाग द्वारा किसानों को मक्का के साथ दलहनी फसलों की अंतरवर्ती खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
इसका सकारात्मक परिणाम अब खेतों में दिखाई देने लगा है।पादुरना जिले के विकासखंड सौंसर के ग्राम बैरागढ़ निवासी किसान जयराम/लक्ष्मण भुरसे ने कृषि विभाग एवं आत्मा परियोजना के मार्गदर्शन में अपने खेत में स्वीट कॉर्न (मक्का) के साथ बरबटी की अंतरवर्ती खेती अपनाई। लगभग एक एकड़ क्षेत्र में की गई इस खेती से उन्हें अतिरिक्त आय का नया स्रोत मिला है।
किसान को मिला ₹20 हजार का शुद्ध लाभ
किसान बताते हैं कि बरबटी की बेलों को स्वीट कॉर्न के पौधों का प्राकृतिक सहारा मिल गया, जिससे अलग से मचान बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ी और लागत में कमी आई। समय पर बुवाई के कारण बरबटी की पहली तुड़ाई 6 जुलाई को ही शुरू हो गई। वर्तमान में बरबटी लगभग ₹80 प्रति किलोग्राम के भाव से घर से ही बिक रही है तथा अब तक लगभग 3 क्विंटल उत्पादन से करीब ₹20 हजार का शुद्ध लाभ प्राप्त हो चुका है। आगामी तुड़ाइयों से आय में और वृद्धि होने की संभावना है।
अनाज + दलहन की अंतरवर्ती खेती क्यों है लाभकारी?
मक्का जैसी अनाज फसल के साथ बरबटी जैसी दलहनी फसल लगाने से भूमि का बेहतर उपयोग होता है। दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन का जैविक स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होती हैं, जिससे लंबे समय में रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता कम हो सकती है। इसके साथ ही किसानों को एक ही खेत से दो फसलों का उत्पादन, अतिरिक्त आय, जोखिम में कमी तथा बेहतर भूमि उपयोग का लाभ मिलता है। कई अध्ययनों में मक्का–दलहन अंतरवर्ती प्रणाली से भूमि उपयोग दक्षता, मिट्टी की गुणवत्ता और आर्थिक लाभ में वृद्धि देखी गई है।
पांढुर्णा के किसानों के लिए उपयोगी मॉडल
पांढुर्णा जिले में मक्का का रकबा अत्यधिक होने के कारण मक्का + दलहन (बरबटी, , अरहर आदि) की अंतरवर्ती खेती किसानों के लिए एक व्यवहारिक एवं लाभकारी विकल्प बन सकती है। इससे उर्वरकों के उपयोग की दक्षता बढ़ती है, मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है, फसल विविधीकरण होता है तथा किसानों की आय बढ़ाने में सहायता मिलती है। कृषि विभाग ने जिले के किसानों से इस मॉडल को अपनाकर कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त करने की अपील की है।
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