Ad DesktopAd TabletAd Mobile
राज्य कृषि समाचार (State News)

महासमुंद में धान के साथ मछली पालन बना किसानों की अतिरिक्त कमाई का जरिया, सरकार दे रही 60 प्रतिशत तक अनुदान

07 अक्टूबर 2026, महासमुंद (छत्तीसगढ़): महासमुंद में धान के साथ मछली पालन बना किसानों की अतिरिक्त कमाई का जरिया, सरकार दे रही 60 प्रतिशत तक अनुदान – छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में लगभग 150 किसान अब सिर्फ धान पर निर्भर न रहकर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मछली पालन से भी अच्छी खासी अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। जिले के बिरकोनी गांव के किसान दिनेश चंद्राकर और बकमा गांव के हिमांशु चंद्राकर इसकी मिसाल हैं।

दिनेश चंद्राकर ने एक हेक्टेयर क्षेत्र में तालाब बनाने पर 7.50 लाख रुपये और 20 हजार वर्गफुट की हैचरी पर 14 लाख रुपये यानी कुल 21.50 लाख रुपये का निवेश किया। इस निवेश से उन्हें आठ से नौ महीने में करीब 15 टन मछली का उत्पादन मिल रहा है।

महासमुंद जिला छत्तीसगढ़ के उन इलाकों में शामिल है जहां धान की खेती सदियों से मुख्य व्यवसाय रही है, लेकिन हर साल धान की कीमत और मौसम पर निर्भरता किसानों के लिए जोखिम बनी रहती है। मत्स्य विभाग ने ऐसे किसानों को तालाब और हैचरी के लिए प्रोत्साहित किया, जिनके खेतों में पानी रुकने की सुविधा पहले से मौजूद थी।

Ad DesktopAd TabletAd Mobile
Ad DesktopAd TabletAd Mobile

लागत से दोगुने दाम पर हो रही बिक्री

दिनेश चंद्राकर की मछली उत्पादन लागत 70 से 80 रुपये प्रति किलो बैठती है, जबकि बाजार में यह मछली 120 से 150 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है। इस तरह उन्हें हर खेप पर अच्छा मुनाफा मिल रहा है।

कृषक जगत को व्हाट्सएप पर फॉलो करें
खेती-किसानी की ताज़ा खबरें, सीधे आपके फ़ोन पर
चैनल फॉलो करें

शुरुआत में बड़ी राशि का निवेश करना आसान नहीं था, लेकिन मत्स्य विभाग से मिली तकनीकी सलाह और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अनुदान ने उनका हौसला बढ़ाया। धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ने के साथ ही उन्होंने तालाब और हैचरी दोनों के बुनियादी ढांचे को और मजबूत किया।

बकमा गांव के हिमांशु चंद्राकर ने पाउंड लाइनर यूनिट पर 28 लाख रुपये का निवेश किया है, जिस पर उन्हें सरकार से 60 प्रतिशत अनुदान मिला। इससे उन्हें सालाना तीन से चार लाख रुपये की शुद्ध बचत हो रही है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत महिलाओं और अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के किसानों को 60 प्रतिशत तक जबकि सामान्य वर्ग के किसानों को 40 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है।

मछली पालन के इन उपक्रमों से स्थानीय मजदूरों को भी रोजगार मिल रहा है। गांव के मजदूरों को तालाबों और हैचरी में काम करने पर करीब 9 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी हो रही है। जिला मत्स्य विभाग के अधिकारियों के मुताबिक महासमुंद में धान की खेती के साथ-साथ मछली पालन को बढ़ावा देने से किसानों की आय में स्थिरता आई है, क्योंकि फसल खराब होने पर भी उन्हें मछली से आमदनी मिलती रहती है।

हैचरी से मिल रहा बीज उत्पादन में भी फायदा

दिनेश चंद्राकर की हैचरी सिर्फ उनके अपने तालाब के लिए ही नहीं, बल्कि आसपास के अन्य किसानों को भी मछली का बीज यानी स्पॉन उपलब्ध कराती है। इससे इलाके के अन्य छोटे मछली पालकों को बाहर से बीज मंगाने की जरूरत कम हुई है और उनकी लागत में भी कमी आई है।

मत्स्य विभाग का कहना है कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मिलने वाला अनुदान छोटे और मझोले किसानों के लिए शुरुआती निवेश का जोखिम कम करता है, जिससे वे बिना बड़ा कर्ज लिए भी मछली पालन शुरू कर पा रहे हैं। आने वाले समय में जिले के और गांवों में भी इस मॉडल को बढ़ाने की योजना है, ताकि अधिक से अधिक किसान धान के साथ मछली पालन को आय का स्थायी जरिया बना सकें।

जिला प्रशासन का कहना है कि महासमुंद में तालाबों की उपलब्धता और पानी की समुचित व्यवस्था की वजह से मछली पालन का यह मॉडल दूसरे धान बहुल जिलों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। विभाग किसानों को मछली की उन्नत प्रजातियां चुनने, तालाब की गहराई और पानी की गुणवत्ता बनाए रखने जैसे विषयों पर भी लगातार प्रशिक्षण दे रहा है, ताकि उत्पादन में आने वाले समय में और बढ़ोतरी हो सके।

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture