केला फसल में पिटिंग (टिकली) रोग से आर्थिक नुकसान
लेखक: डॉ. के. बी. पाटिल,वरिष्ठ केला विशेषज्ञ, जैन इरिगेशन सिस्टम्स लि., जलगांव
13 अगस्त 2026, इंदौर: केला फसल में पिटिंग (टिकली) रोग से आर्थिक नुकसान – वर्तमान में केला उत्पादक किसान कई समस्याओं से जूझ रहे हैं, ऐसे में पिटिंग (टिकली) रोग ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है। पिछले डेढ़-दो महीनों से कटाई पर आए केला बागों में पिट स्पॉट रोग का प्रभाव बड़े पैमाने पर दिख रहा है।जहां बाजार में केले का भाव ₹1200 से ₹1300 प्रति क्विंटल है, वहीं पिटिंग रोग से प्रभावित बागों का केला केवल ₹600 से ₹800 प्रति क्विंटल के हिसाब से बिक रहा है। इससे केला उत्पादकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। मुख्य प्रश्न यह रोग कब आता है? रोग के लिए अनुकूल वातावरण और कारण क्या हैं? तथा इस रोग का नियंत्रण कैसे करें? अधिकांश किसानों को इस रोग की जानकारी न होने के कारण इसका सही प्रबंधन नहीं हो पाता, जिससे नुकसान बढ़ जाता है।
रोग की पहचान – पिट स्पॉट एक फफूंद जनित (Fungal) रोग है। शुरुआत में इस रोग के कारण केले के घार (गुच्छे/लंगर) की डंडी, फणी के जोड़ और केले पर छोटे काले धब्बे दिखाई देते हैं। केले के विकास के समय यह रोग ज्यादा नहीं दिखता, लेकिन जैसे-जैसे केला पकने और तैयार होने लगता है, पिट स्पॉट बढ़ने लगते हैं। पिट स्पॉट में केले पर 4-6 मिमी व्यास के गोल और तश्तरी (Saucer) के आकार के गड्ढेदार व भूरे किनारे वाले धब्बे दिखाई देते हैं। शुरुआत में कम दिखने वाले ये धब्बे धीरे-धीरे फैलते हैं और पूरे केले या घार पर पिटिंग रोग फैल जाता है।
रोग आने के कारण– पिटिंग रोग का प्रकोप मुख्य रूप से जुलाई, अगस्त, सितंबर और अक्टूबर की कटाई वाले बागों में अधिक दिखता है।इन महीनों में बारिश होती है। बाग में सूखी-पीली पत्तियां तने पर लटकी रहती हैं, बाग अस्वच्छ रहता है, घार में काले ब्रैकेट/रिबन अटके रहते हैं। घार के ऊपर की पत्ती आधी सूखकर पीली पड़ी होती है। उन पर फफूंद के धब्बे होते हैं और नम (आर्द्र) मौसम व बारिश के दौरान पिटिंग रोग का प्रकोप सबसे ज्यादा होता है।
परिवहन और निर्यात पर प्रभाव– यदि पिटिंग से प्रभावित बाग के केले की कटाई की जाए, तो ट्रकों में पहुँचने तक केला पक जाता है। इसे ‘ट्रक राइप’ कहते हैं। और यदि निर्यात के लिए पैक किया गया केला जहाज में ही पक जाए, तो उसे ‘शिप राइप’ कहा जाता है। इससे व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान होता है। यद्यपि पिटिंग रोग घातक प्रतीत होता है, फिर भी यदि यह रोग न आए इसके लिए प्रतिबंधात्मक (Preventive) उपाय किए जाएं या शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रण कर लिया जाए, तो नुकसान नहीं होता।
रोग नियंत्रण के उपाय –
सफाई: मानसून शुरू होने से पहले केले के बागों की अच्छी तरह सफाई करें।
पत्तियों की छंटाई: तने पर लटकी हुई, सूखी और पीली पत्तियों को काटकर खेत से बाहर फेंक दें।
घार की सफाई: घार के ऊपर से ब्रैकेट/रिबन हटा दें और घार में फंसा सूखा पत्ता या रिबन का टुकड़ा न रहने दें।
हवा का प्रवाह: बाग के आसपास की हवा रोकने वाली गजराज घास, शेवरी को काटकर बाग में हवा का आवागमन सुनिश्चित करें।
फ्लोरेट्स हटाना: पौधे में झड़े हुए सभी फ्लोरेट्स (केले के फूल का निचला हिस्सा) हटा दें।
फणी की छंटाई: घार में केवल 9 फणियां रखें, बाकी निचली छोटी फणियों को हटा दें।
छिड़काव: केले की निसावन/निकलने (Emergence) के बाद नियमित रूप से निम्नलिखित फफूंदनाशक व कीटनाशक का छिड़काव करें:
मैंकोजेब 30 ग्राम + इमिडा 7 मिली (15 लीटर पानी में)
टॉपसिन 20 ग्राम + कॉन्फिडॉर 7 मिली (15 लीटर पानी में)
डायथेन एम-45 30 ग्राम + इमिडा 7 मिली (15 लीटर पानी में)
विशेष टीप : घार और तने पर हर 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें। केले की कटाई से एक दिन पहले घार पर उपर्युक्त छिड़काव करने से कटाई के बाद परिवहन के दौरान केला जल्दी नहीं पकता। इस प्रकार केले के पिटिंग रोग का सही प्रबंधन करके होने वाले आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता है।
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