जीविका से जुड़ी रीना देवी ने ड्रैगन फ्रूट की खेती से बदली किस्मत, अब सालाना 7-8 लाख की कमाई
27 सितंबर 2026, कटिहार (बिहार): जीविका से जुड़ी रीना देवी ने ड्रैगन फ्रूट की खेती से बदली किस्मत, अब सालाना 7-8 लाख की कमाई – जिले के बरारी प्रखंड की सुजापुर पंचायत की रहने वाली रीना देवी आज इलाके की महिलाओं के लिए मिसाल बन चुकी हैं। कभी परंपरागत खेती से गुजारा मुश्किल था, लेकिन ड्रैगन फ्रूट की खेती अपनाने के बाद अब उनकी सालाना आय लाखों रुपये में पहुंच गई है।
रीना देवी साल 2014 से मां दुर्गा जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। उन्होंने बताया, “पहले खेती में मेहनत तो बहुत होती थी, लेकिन आमदनी नहीं बचती थी।” इसी सोच के साथ उन्होंने 2018 में सिर्फ दो बीघा जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की।
धीरे-धीरे बढ़ता गया उत्पादन
शुरुआती वर्षों में उत्पादन सीमित रहा। तीसरे साल यानी 2021 में करीब 4 क्विंटल ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन हुआ। लेकिन 2022 के बाद पौधे पूरी तरह परिपक्व हो गए और उत्पादन बढ़कर 7 से 10 क्विंटल सालाना तक पहुंच गया। इसी उत्पादन से रीना देवी को अब सिर्फ ड्रैगन फ्रूट से सालाना 7 से 8 लाख रुपये की आमदनी हो रही है।
रीना देवी ने अपनी आय के स्रोत यहीं तक सीमित नहीं रखे। 2023 में उन्होंने 10 बीघा जमीन पर मक्का की खेती भी शुरू की, जिससे करीब 400 क्विंटल उत्पादन हुआ। ड्रैगन फ्रूट और मक्का दोनों को मिलाकर उनकी कुल सालाना आय अब 8 से 12 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है।
जीविका समूह और सरकारी मदद का साथ
रीना देवी की इस सफलता में जीविका के महिला स्वयं सहायता समूह नेटवर्क की भूमिका अहम रही है। सागर जीविका महिला ग्राम संगठन से जुड़कर उन्हें न सिर्फ तकनीकी जानकारी मिली, बल्कि बाजार तक पहुंचने में भी मदद मिली। इसके अलावा सरकार की तरफ से उनकी बेटी की पढ़ाई के लिए 50,000 रुपये की वित्तीय सहायता भी दी गई, जिसने परिवार को आर्थिक रूप से और मजबूत बनाया।
आज इलाके की कई महिलाएं रीना देवी से प्रेरित होकर ड्रैगन फ्रूट की खेती की तरफ रुख कर रही हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की जलवायु में ड्रैगन फ्रूट की खेती कम पानी और सीमित देखभाल में भी अच्छा मुनाफा दे सकती है, बशर्ते शुरुआती तीन-चार साल किसान धैर्य बनाए रखें।
ड्रैगन फ्रूट कैक्टस प्रजाति का फल है, जिसे परंपरागत धान-गेहूं जैसी फसलों की तुलना में काफी कम पानी की जरूरत होती है। यही वजह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कई जिलों में अब किसान इसे नकदी फसल के तौर पर अपनाने लगे हैं। एक बार पौधा लगने के बाद उससे कई वर्षों तक लगातार उत्पादन मिलता रहता है, जिससे शुरुआती निवेश के बाद हर साल की लागत काफी कम हो जाती है।
जीविका जैसे महिला स्वयं सहायता समूह नेटवर्क का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि नई फसल अपनाने में लगने वाला जोखिम बंट जाता है। समूह की महिलाएं एक-दूसरे से तकनीकी जानकारी साझा करती हैं और सामूहिक रूप से बाजार तक पहुंचने की रणनीति भी बनाती हैं, जिससे अकेले खेती करने वाले किसान की तुलना में मुनाफा और स्थिरता दोनों बेहतर होते हैं।
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