फसल बीमा योजना से आत्मनिर्भर कृषि

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  • डॉ. अजय कुमार साह
    प्रधान वैज्ञानिक, प्रभारी, प्रसार एवं प्रशिक्षण
    भाकृअनुप- भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, पोस्ट- दिलकुशा,
    लखनऊ,
    email-ajaysahiisr@gmail.com

28 जून 2021, लखनऊ। फसल बीमा योजना से आत्मनिर्भर कृषि – आत्मनिर्भर भारत योजना का शुभारम्भ 12 मई 2020 को किया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य लगभग 130 करोड़ भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हे रोजगार मुहैया कराना है। पिछले डेढ़ वर्ष में फैली कोरोना जैसी भयंकर महामारी के संकट से जूझ रहे भारतीयों को निजात दिलाने तथा प्रत्येक वर्ग के लोगो को रोजगार उपलब्ध कराने में यह योजना अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होगा। भारत सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत 20 लाख करोड़ रुपए की धनराशि का आवंटन राहत पैकेज के रूप में किया जो कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का का लगभग 10 प्रतिशत है। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र को और अधिक बेहतर बनाने के लिए भारत सरकार ने इस योजना के अंतर्गत एक लाख करोड़ रुपए की धनराशि एग्री- इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड के रूप में भी प्रदान किया तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करके खाद्य वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया गया जिससे खाद्य वस्तुओं के भंडारण को बढ़ाया जा सका। किसानों को कृषि उत्पादों के विक्रय में सरलता लाने के लिए भारत सरकार ने ‘वन नेशन वन मार्केट’ के तहत किसानों को अपनी सुविधा के आनुसार अपने कृषि उत्पाद का क्रय एवं विक्रय करने का अधिकार भी प्रदान किया है। यदि इन महत्वपूर्ण योजनाओं को ध्यान में रखते हुए विश्वासपूर्ण ढंग से कृषि क्षेत्र में आगे की ओर कदम बढ़ाया जाए तो अपितु आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में सबसे अग्रणी क्षेत्र कृषि का हो सकता है। इसके साथ ही किसानों एवं मजदूरों को रोजगार प्राप्त कराने तथा उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति को मजबूत बनाने में पुन: एक नयी आशा की किरण नजर आएगी, जिसके साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को सफलता पूर्वक आगे बढऩे में गति प्रदान की जा सकेगी। इस नई आत्मनिर्भर योजना से कृषि क्षेत्र तथा किसानों को अधिकतम लाभ प्रदान करने में सुरक्षा कवच का होना भी आवश्यक है। और इसलिए इस संदर्भ में किसानों द्वारा उत्पादित फसलों को किस प्रकार प्राकृतिक आपदाओं से आर्थिक सुरक्षा प्रदान किया जाए इस पर विचार करना अति आवश्यक होगा।

भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर होने के कारण सदैव जोखिम भरा व्यवसाय रहा है। प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक आपदाओं जैसे- बाढ़, सूखा, चक्रवात इत्यादि के कारण बड़े पैमाने पर फसल की विफलता देश के किसी न किसी हिस्से में देखने को मिलता है। जिससे भारतीय किसानों को व्यापक रूप से जोखिम उठाना पड़ता है तथा उनको आर्थिक नुकसान होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का बहुत बड़ा योगदान होने के कारण कृषि के प्रभावित होने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। विभिन्न प्रकार से कृषि में होने वाले नुकसानों से किसानों को निजात दिलाने के लिए भारत सरकार ने फसल बीमा योजना को नए स्वरूप में प्रारंभ किया है। जिसका मुख्य उद्देश्य किसानों की फसलों को सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ किसानों की आय को दोगुना करके भारतीय किसानों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति को और अधिक मजबूती प्रदान करना है।

भारतीय कृषि की अनूठी प्रकृति और किसानों की असमान आर्थिक एवं मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर सरकार द्वारा फसल बीमा योजना को लाया गया और बार-बार असफल प्रयासों को दोहराया गया। समयांतराल पर कुछ संशोधन भी किए गए परन्तु प्रीमियम सब्सिडी समर्थन के बाद भी फसल बीमा योजना अपेक्षित परिणामों को प्राप्त करने तथा किसानों को लाभ पहुंचाने में विफल रहा।

भारतीय किसानों को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा विभिन्न वर्षों में फसल बीमा पर आधारित योजनाओं को लागू किया गया जो कि निम्नलिखित है

1. साधारण बीमा योजना (1972-1979)
2. पायलेट फसल बीमा योजना (1979-1984)
3. व्यापक फसल बीमा योजना (1985 -1999)
4. राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (1999- 2000)
5. मौसम आधारित फसल बीमा योजना (2007-2008)
6. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (2016)- वर्तमान सरकार द्वारा लाया गया

फसल बीमा योजना का महत्व

भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर होने के कारण तथा अनिश्चित समय पर वर्षा एवं वर्षा के असमान वितरण के कारण फसल की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके साथ मूल्य अस्थिरिता होने के कारण किसानों को अधिक जोखिम सहन करना पड़ता है। जोखिमों और अनिश्चिता के परिदृश्य को देखते हुए कृषि के जोखिमों को कम करने अथवा किसानों को जोखिमों से निजात दिलाने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को 2016 में शुभारम्भ किया गया। भारतीय फसल बीमा योजना कृषि क्षेत्र में विकास प्रक्रिया को आगे ले जाने में एक महत्वपूर्ण अंग बना। भारत में पारंपरिक रूप से जोखिमों को निजी तौर पर निहित करने में कुछ हद तक सफलता प्राप्त की जा सकी। जिससे भारतीय किसानों के आर्थिक विकास में बदलाव लाने में भी फसल बीमा योजना सक्षम हो सका है।

एफएओ एवं विभिन्न कृषि संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय कृषि में सबसे अधिक क्षेत्रफल सूखे से प्रभावित होता है जो कि सभी आर्थिक प्रभावों में से लगभग 84 प्रतिशत है अर्थात् जब तक कृषि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए प्रभावी प्रयोजन नहीं किए जाएगे तब तक यह स्थिति अनुकूल होने के बहुत ही कम आसार नजर आ रहे है। कृषि क्षेत्र के विकास में यह आवश्यक हो गया है कि जनसांख्यिकीय संरचना में सीमांत एवं लघु किसानों के विकास का बोध सर्वोपरि किया जाए।

फसल बीमा योजना की चुनौतियाँ
बीमा संस्कृति का अभाव

आमतौर पर किसानों को कृषि बीमा योजना के बारे में पर्याप्त जानकारी न होने के कारण दौड़ भाग बहुत ज्यादा करनी पड़ जाती है तथा इसके साथ ही फसल बीमा योजना को अक्सर गैर निवेश के रूप में भी माना जाता है। क्योंकि प्रतिवर्ष किसानों से प्रीमियम के रूप में भारी मात्रा में धनराशि वसूली जाती है। परंतु किसानों की फसलों से संबंधित क्षतिपूर्ति भूगतान बहुत ही कम मात्रा में अथवा न के बराबर बीमा कम्पनियों के द्वारा किया जाता है।

कृषि में अधिक लागत

कृषि में आय का ह्रास के लिए कृषि उत्पाद के बाजार मूल्यों अनिश्चितता को सदैव से एक मुख्य कारण माना गया है। किसानों को बीज, खाद एवं उर्वरक को अधिक दामों पर क्रय करना पड़ता है। जिसके साथ ही किसानों को गुणवत्ता युक्त बीज, खाद एवं उर्वरक समय पर उपलब्ध न होने के कारण किसानों को विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

भूमि का असमान वितरण

कृषि क्षेत्रफल वितरण सदैव से एक जटिल समस्या रही है। देश में बढ़ती आबादी के कारण लगातार सीमांत एवं लघु किसानों की जनसंख्या बढऩे के साथ-साथ जोत का आकार भी छोटा होता जा रहा है। जिसके कारण वुवाई से लेकर कटाई तक के कृषि कार्य में जटिलता के साथ लागत भी बढ़ जाता है और औसत उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लाभ
आय की स्थिरिता

आय की स्थिरिता से आशय यह है कि किसानों की खराब हुई फसलों के कारण होने वाले नुकसान से निजात दिलाने में फसल बीमा योजना एक प्रकार से सुरक्षा कवच का काम करता है। तथा किसानों को उनकी उपज मूल्य जोखिमों का प्रबंधन करने की अनुमति देता है।

तकनीकी उन्नति

फसल बीमा योजना के अंतर्गत कृषि कंपनियाँ कृषि यंत्रिकरण को बढ़ावा देने के साथ – साथ कृषि में होने वाली क्षति को कम करने में भी सहायता प्रदान करती है तथा किसानों को नयी-नयी तकनीकों की जानकारी भी समय पर उपलब्ध कराती है। साथ ही गुणवत्ता युक्त बीज, उर्वरक, रसायन तथा अन्य निवेश भी समय पर उपलब्ध करता है।

जागरूकता प्रदान करना

बीमा कंपनियां किसानों को विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं की अग्रिम जानकारी तथा इन आपदाओं से फसल को कैसे बचा सकते हैं इस बारे में भी जागरूक करते हैं। साथ ही होने वाले नुकसान तथा उसके आकलन पर भी दिशा निर्देश दिया जाता है।

नुकसान भरपाई

किसानों को विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली क्षति की भरपाई करने में फसल बीमा कम्पनियाँ क्षति-आपूर्ति राशि प्रदान करती है। जिससे किसानों को कृषि उपज में होने वाले नुकसान से कुछ हद तक आर्थिक सुरक्षा प्रदान किया जा सके।  संभावित जोखिमों के खिलाफ किसानों के आर्थिक हित की रक्षा करने में नई कृषि विधियों को अपनाने में फसल बीमा कम्पनियाँ सहयोग प्रदान करती है। तथा लगातार फसल उत्पादन विफलता के कारण उत्पन्न हो रही समस्या से छुटकारा पाने एवं ग्रामीण ऋण की समस्या को दूर करने में फसल बीमा कम्पनियाँ सहयोग प्रदान करती है।

कुछ सुझाव

फसल बीमा योजना के अंतर्गत निम्नलिखित बिन्दुओं को ध्यान में रखना अति आवश्यक है। जो कि निम्नलिखित है-

  • ग्राम पंचायत स्तर पर फसल बीमा योजना इकाई की स्थापना किया जाना अति आवश्यक हो गया है।
  • अनुमानित उपज का अग्रिम मूल्य तय किया जाना तथा उस मूल्य पर ही फसल का क्रय किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। क्योंकि इसके आभाव में लगातार बीज, खाद एवं उर्वरक के बढ़ते दामों के कारण खेती करना लगातार कठिन एवं घाटे का सौदा होता जा रहा है।
  • कटाई के पहले एवं बाद में होने वाले फसल के नुकसान को पूर्ण रूप से योजना के अंतर्गत समाहित किया जाना चाहिए।
  • एसएमएस के माध्यम से फसल बीमा कंपनियों के द्वारा समय-समय पर कृषि की सूचना जैसे- मौसम संबंधित जानकारी, सिंचाई, बाजार भाव, कटाई इत्यादि प्रदान करना अति आवश्यक है। जिससे आने वाली आपदाओं से बचने के लिए समय पर फसलों का उचित प्रबंधन किया जा सके और विपणन को सुदृढ़ करते हुए किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके।

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