राज्य कृषि समाचार (State News)

छत्तीसगढ़ में फसल विविधीकरण को रफ्तार, 6,139 हेक्टेयर में धान की जगह बोई गईं दूसरी फसलें

18 जुलाई 2026, रायपुर: छत्तीसगढ़ में फसल विविधीकरण को रफ्तार, 6,139 हेक्टेयर में धान की जगह बोई गईं दूसरी फसलें – छत्तीसगढ़ में खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और जल संरक्षण आधारित बनाने की दिशा में फसल विविधीकरण अभियान तेजी से आगे बढ़ रहा है। महासमुंद जिले में धान की अधिक जल खपत वाली खेती के स्थान पर दलहन, तिलहन, मक्का, रागी, कपास और अन्य वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान का सकारात्मक असर अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। जिले में अब तक 6,139 हेक्टेयर क्षेत्र में किसानों ने धान की जगह दूसरी फसलों की बुवाई कर दी है। जिला प्रशासन का मानना है कि यह बदलाव न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा देगा।

राज्य सरकार की मंशा के अनुरूप कलेक्टर विनय लंगेह के निर्देशन में खरीफ सीजन के दौरान जनभागीदारी के साथ यह अभियान संचालित किया जा रहा है। वर्ष 2026-27 के लिए जिले में 15,150 हेक्टेयर क्षेत्र में धान के स्थान पर दलहन, तिलहन और अन्य वैकल्पिक फसलों का रकबा बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक हुई प्रगति को देखते हुए प्रशासन इसे उत्साहजनक शुरुआत मान रहा है।

विकासखंडवार तय किए गए लक्ष्य

फसल विविधीकरण अभियान के तहत जिले के सभी विकासखंडों के लिए अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। महासमुंद विकासखंड में 2,560 हेक्टेयर, बागबाहरा में 3,500 हेक्टेयर, पिथौरा में 2,890 हेक्टेयर, बसना में 2,980 हेक्टेयर तथा सरायपाली में 3,220 हेक्टेयर क्षेत्र में धान की जगह वैकल्पिक फसलों की खेती का लक्ष्य रखा गया है। कृषि विभाग इन क्षेत्रों में लगातार किसानों को नई फसलों के प्रति जागरूक कर रहा है।

अनुदान से बढ़ रहा किसानों का भरोसा

अभियान को सफल बनाने के लिए कृषि विभाग गांव-गांव में जागरूकता शिविर आयोजित कर रहा है। इन शिविरों में किसानों को जल उपलब्धता, मिट्टी की गुणवत्ता और आर्थिक लाभ के आधार पर उपयुक्त फसल चुनने की जानकारी दी जा रही है। प्रशासन का विशेष फोकस उन क्षेत्रों पर है, जहां धान की खेती अपेक्षाकृत कम लाभकारी और अधिक पानी की मांग करती है।

किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार सामान्य भूमि में दलहन और तिलहन की खेती करने पर 15 हजार रुपये प्रति एकड़ का अनुदान दे रही है। वहीं ऊंची और असिंचित भूमि में दलहन, तिलहन, रागी और कपास जैसी फसलों की खेती अपनाने वाले किसानों को 10 हजार रुपये प्रति एकड़ की विशेष सहायता प्रदान की जा रही है।

मॉडल प्लॉट से दिखाई जा रही नई खेती की सफलता

कृषि उपसंचालक एफ.आर. कश्यप ने बताया कि किसानों को गुणवत्तायुक्त बीजों का वितरण लगातार किया जा रहा है। इसके साथ ही विभिन्न गांवों में मॉडल प्लॉट विकसित कर आधुनिक खेती और फसल विविधीकरण के फायदे प्रत्यक्ष रूप से दिखाए जा रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक किसान नई खेती अपनाने के लिए प्रेरित हों।

उन्होंने बताया कि ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी किसानों के लगातार संपर्क में रहकर फसल चयन, बीज उपचार, उर्वरक प्रबंधन और वैज्ञानिक खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। किसानों की समस्याओं का समाधान भी मौके पर किया जा रहा है।

जल संरक्षण के साथ बढ़ेगी किसानों की आय

जिला प्रशासन का मानना है कि ऊंची भूमि में धान की तुलना में दलहन और तिलहन जैसी फसलें कम पानी में बेहतर उत्पादन देती हैं। इससे भूजल संरक्षण, सिंचाई लागत में कमी, मिट्टी की उर्वरता में सुधार और किसानों की आय में वृद्धि संभव है। विशेष रूप से दलहनी फसलें भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाती हैं, जिससे अगली फसल को भी लाभ मिलता है।

फसल विविधीकरण अभियान का असर अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगा है। ग्राम कस्तुरबोड़ के किसान चैन सिंह मरार ने एक हेक्टेयर भूमि में धान की जगह मक्का की खेती शुरू की है। वहीं दाबपाली, चपिया, जमदरहा, पुरुषोत्तमपुर और बोदानवापाली सहित कई गांवों में किसान दलहन, तिलहन और अन्य वैकल्पिक फसलों की खेती की ओर बढ़ रहे हैं।

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