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राज्य कृषि समाचार (State News)

क्या कृषि विकास का इंजन बन सकती है?

लेखक: डॉ रवींद्र पस्तोर, सीईओ, ई -फसल

30 जुलाई 2024, भोपाल: क्या कृषि विकास का इंजन बन सकती है? – संसद में बजट प्रस्तुत करने के पूर्व आर्थिक समीक्षा 2023-24 प्रस्तुत किया गया। जिसके अनुसार वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 8.2% रहने का अनुमान किया गया है। जबकि मुद्रास्फीति काफ़ी हद तक नियंत्रण में है तथा व्यापार घाटा भी सकल घरेलू उत्पाद का 0.7% ही हैं तथा विदेशी मुद्रा भंडार भी पर्याप्त मात्रा में है। सार्वजनिक व निजी निवेश की गति भी निरंतर जारी है। 33,000 से अधिक निजी कम्पनियों के परिणाम बताते हैं कि वर्ष 2020 से 2023 के बीच भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र का कर पूर्व लाभ लगभग चार गुना हो गया है। जिस कारण निफ़्टी व सेंसेक्स सूचकांकों में तेज़ी बनी हुई है।

कृषि और किसान किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए भारत में किसानों को पानी, बिजली और उर्वरक पर सब्सिडी देता है। उनकी आय पर कर नहीं लगता। सरकार 23 चुनिंदा फसलों के लिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करतीं हैं। पीएम किसान योजना के तहत किसानों को मासिक नक़द राशि प्रदान की जाती है। राष्ट्रीय व राज्य सरकारें समय समय पर किसानों के ऋण माफ़ कर देती है। लेकिन किसानों की समस्याओं को देखते हुए इन नीतियों में बदलाव करने के लिए अखिल भारतीय संवाद की आवश्यकता है।

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भारतीय कृषि क्षेत्र लगभग 42%आबादी को आजीविका प्रदान करता है तथा सकल घरेलू उत्पाद में 18% योगदान देता है। कृषि क्षेत्र 4.18% की गति से प्रति वर्ष वृद्धि कर रहा है। विश्व कृषि में भारत दूध, दालों व मसालों के उत्पादन में प्रथम स्थान व चावल, गेहूँ, कपास और गन्ना उत्पादन में द्वितीय स्थान पर है।

राष्ट्रीय व राज्य सरकारों द्वारा एक-दूसरे के विपरीत उद्देश्यों की नीतियों के कारण किसानों के हितों को नुक़सान पहुँच रहा है, मिट्टी की उर्वरता नष्ट हो रहीं है, भूजल स्तर घट रहा है, नाइट्रेट आॉकसाइड उत्सर्जन से नदियाँ और पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, फसलों में पोषक तत्वों की कमी के कारण हमारे भोजन में फ़ाइबर और प्रोटीन के बजाय चीनी और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन के कारण लोगों के स्वास्थ्य को नुक़सान पहुँच रहा है। यदि हम कृषि नीतियों में व्याप्त विसंगतियों को समाप्त कर दे तो इस के परिणाम स्वरूप बहुत अधिक सामाजिक व आर्थिक लाभ होगा तथा राष्ट्र को बेहतर भविष्य की ओर ले जाने के आत्मविश्वास और क्षमता में विश्वास बहाल होगा।

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पहले के विकास मॉडलों में अर्थव्यवस्था को कृषि, औद्योगीकरण और मूल्य संवर्धित सेवाओं के विकास के क्रम में प्रतिपादित किया जाता रहा है। लेकिन व्यापार संरक्षणवाद, संसाधन जमाख़ोरी, अतिरिक्त क्षमता और डंपिग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आने से विश्व में नई चुनौतियों का निर्माण हो रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण में इसका हल खेती के मामले में जड़ों की ओर लौट कर परम्परागत खेती को बढ़ावा देने के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा उम्मीद की गई है कि इससे किसानों की आय बड़ाई जा कर उच्च मूल्य संवर्धन के लक्ष्य को प्राप्त करने के साथ खाद्य प्रसंस्करण से निर्यात के अवसर पैदा होने की उम्मीद जताई गई है तथा कृषि क्षेत्र को फ़ैशनेबल बना कर शहरी युवाओं को काम करने के आकर्षित किया जा सकता है।

क्या आज के पेचीदा समाज में यह प्रस्तावित समाधान से क्या कृषि क्षेत्र उद्धारक हो सकता है? इस विषय में आप क्या सोचते हैं? आप किसानों को विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से अपनी राय व्यक्त करना चाहिए जिससे शासन प्रशासन में बैठे लोगों नीति निर्माताओं तथा जनता की राय की दिशा बनाने वाले प्रभावशाली लोगों तक बात पहुँच सके। यदि इस समय भी आप चुप रहे तो कोई और आपके लिए निर्णय लेगा।

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