परंपरागत धान छोड़ स्ट्रॉबेरी की खेती से अंबिकापुर के किसान को मिला नया मुनाफा
27 अक्टूबर 2026, अंबिकापुर (छत्तीसगढ़): परंपरागत धान छोड़ स्ट्रॉबेरी की खेती से अंबिकापुर के किसान को मिला नया मुनाफा – सरगुजा जिले के अंबिकापुर के रहने वाले किसान लाल बहादुर सिंह का परिवार पीढ़ियों से धान की खेती करता आया था। कुछ साल पहले उन्होंने उद्यानिकी विभाग की मदद से स्ट्रॉबेरी की खेती की तरफ रुख किया, और अब यह फसल उनके लिए अच्छी कमाई का जरिया बन गई है।
लाल बहादुर सिंह ने शुरुआत में अपनी 50 डिसमिल जमीन पर करीब 2,000 स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाए थे। हर पौधे की लागत करीब 13 रुपये आई। उद्यानिकी विभाग के अधीक्षक गंगा राम बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी एक मौसमी फल है।” इसके पौधे पुणे और महाबलेश्वर से मंगाए जाते हैं, और विभाग के मुताबिक “विंटर डॉन” किस्म के पौधे इलाके की जलवायु में सबसे अच्छा उत्पादन देते हैं।
सब्सिडी से मिली मदद
स्ट्रॉबेरी की खेती में प्रति हेक्टेयर लागत करीब 1.5 से 2 लाख रुपये आती है। इसे देखते हुए उद्यानिकी विभाग किसानों को प्रति हेक्टेयर एक लाख रुपये तक की सब्सिडी देता है, जिसमें से 80,000 रुपये पौधारोपण के लिए और 20,000 रुपये मल्चिंग के लिए दिए जाते हैं।
इस मदद से लाल बहादुर सिंह जैसे किसानों के लिए शुरुआती लागत का बोझ कुछ हल्का हो जाता है, जबकि बाजार में स्ट्रॉबेरी की कीमत अच्छी मिल जाने से मुनाफे की गुंजाइश बनी रहती है।
मुनाफे का गणित
लाल बहादुर सिंह बताते हैं, “बाजार में स्ट्रॉबेरी अभी 400 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है।” पहले साल उन्हें करीब एक लाख रुपये का मुनाफा हुआ था, जो बाद के वर्षों में बढ़कर सात लाख रुपये तक पहुंच गया।
वे कहते हैं, “समझदारी और देखभाल से इस फल की खेती करने पर अच्छा मुनाफा मिलता है।” अंबिकापुर और आसपास के इलाकों में अब कुछ और किसान भी उद्यानिकी विभाग से जानकारी लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती में हाथ आजमा रहे हैं।
सरगुजा का इलाका ठंडे मौसम के लिए जाना जाता है, और स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए यह मौसम काफी मुफीद माना जाता है। हालांकि स्ट्रॉबेरी एक नाजुक फल है, इसलिए पौधों को समय पर पानी देना, मल्चिंग बनाए रखना और कीट-रोग से बचाव पर लगातार ध्यान देना पड़ता है।
उद्यानिकी विभाग किसानों को पौध लगाने से पहले ही खेत की तैयारी, मल्चिंग शीट बिछाने और ड्रिप सिंचाई की व्यवस्था करने की सलाह देता है, ताकि पौधों को नमी और पोषण दोनों सही मात्रा में मिल सके। विभाग के मुताबिक फसल पूरी तरह तैयार होने में कुछ महीने का समय लगता है, और इस दौरान नियमित देखभाल पर ही अच्छी उपज निर्भर करती है।
स्ट्रॉबेरी की तुड़ाई शुरू होने के बाद किसानों को इसे जल्दी बाजार तक पहुंचाना होता है, क्योंकि यह फल ज्यादा दिन तक रखा नहीं रह सकता। स्थानीय बाजार के साथ-साथ आसपास के शहरों में भी इसकी मांग बनी रहती है, जिससे किसानों को फल बेचने के लिए एक से ज्यादा विकल्प मिल जाते हैं।
लाल बहादुर सिंह जैसे किसानों के अनुभव से उद्यानिकी विभाग को भी यह भरोसा मिला है कि सरगुजा की जलवायु स्ट्रॉबेरी के लिए अनुकूल है। विभाग अब आसपास के गांवों में भी किसानों को इस फसल की जानकारी देने और पौध उपलब्ध कराने पर काम कर रहा है, ताकि धान पर निर्भरता कम करने वाले और किसान भी इससे जुड़ सकें।
विभाग के अधिकारी किसानों को यह भी सलाह देते हैं कि स्ट्रॉबेरी जैसी नई फसल शुरू करने से पहले छोटे हिस्से में प्रयोग के तौर पर खेती करें, और नतीजे अच्छे मिलने पर ही धीरे-धीरे क्षेत्रफल बढ़ाएं। इससे किसानों का जोखिम कम रहता है और वे फसल की देखभाल का तरीका भी ठीक से समझ पाते हैं।
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