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राज्य कृषि समाचार (State News)

गोबर से धूप-अगरबत्ती बनाकर बबली कोरंगा ने खड़ा किया लाखों का कारोबार

20 अक्टूबर 2026, रुद्रपुर (ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड): गोबर से धूप-अगरबत्ती बनाकर बबली कोरंगा ने खड़ा किया लाखों का कारोबार – गोबर से बनी धूप-अगरबत्ती और मशरूम की खेती से शुरू हुआ एक छोटा सा प्रयास आज उत्तराखंड के रुद्रपुर इलाके में एक पूरे कारोबार में बदल चुका है। इसे चला रही हैं बबली कोरंगा, जिन्होंने सिर्फ 2,000 रुपये की शुरुआती पूंजी से अपना काम शुरू किया था।

बबली 2020 में शिव शक्ति स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं, जिसमें 11 महिलाएं हर महीने 100 रुपये की बचत करती थीं। शुरुआत में टाटा मोटर्स की संस्था आईएसडी से प्रशिक्षण लेकर उन्होंने गोबर से धूप और अगरबत्ती बनाना सीखा, और बाद में यूट्यूब से गोबर की मूर्तियां और दीये बनाने की कला भी सीख ली।

2021 में पंतनगर स्थित राज्य कृषि प्रबंधन एवं विस्तार प्रशिक्षण संस्थान (सामेती) से प्रशिक्षण लेकर बबली ने छोटे स्तर पर मशरूम उत्पादन भी शुरू किया। इसके अलावा वे 5 एकड़ पट्टे की जमीन पर जैविक खेती भी करती हैं।

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पहले प्रयास से ₹10,000, अब सालाना 10-12 लाख का कारोबार

उनके पहले ही प्रयास से करीब 10,000 रुपये की कमाई हुई थी, जिसके बाद उन्होंने “बबली एंटरप्राइजेज” नाम से अपना कारोबार खड़ा किया। आज इस कारोबार का सालाना टर्नओवर 10 से 12 लाख रुपये तक पहुंच गया है।

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गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के विस्तार शिक्षा निदेशालय ने भी बबली को रबी और खरीफ किसान मेलों में मुफ्त स्टॉल और लगातार तकनीकी सलाह देकर मदद की है। बबली अब दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें भी रोजगार से जोड़ रही हैं।

बबली कोरंगा के काम को अब राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल रही है। अप्रैल 2025 में उनकी कहानी डीडी किसान पर सीधे प्रसारित हुई थी। जुलाई 2025 में नई दिल्ली में वर्ल्ड यूथ सेंटर की ओर से उन्हें “नेशनल ग्रामीण हीरोज” पुरस्कार में विजेता चुना गया, जिसके साथ उन्हें 1 लाख रुपये की राशि भी मिली। उत्तराखंड सरकार की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री के हाथों “लखपति दीदी” का सम्मान भी मिल चुका है।

एक साथ कई काम, एक ही मंच से कमाई

बबली की खासियत यह है कि उन्होंने अपनी कमाई के लिए सिर्फ एक काम पर निर्भर रहने के बजाय कई तरह की गतिविधियां एक साथ शुरू कीं। गोबर से बने उत्पाद, मशरूम और जैविक खेती, तीनों मिलकर उनके परिवार की आमदनी को साल भर स्थिर बनाए रखने में मदद करते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर सिर्फ खेती के मौसम में ही आमदनी होती है और बाकी समय काम कम रहता है। बबली जैसे मॉडल में अलग-अलग गतिविधियां होने से महिलाओं को लगभग पूरे साल कोई न कोई काम मिलता रहता है, जिससे उनकी घरेलू आमदनी में स्थिरता आती है।

शुरुआत में बबली को भी गांव में अपने काम को लेकर संदेह और हिचक का सामना करना पड़ा था, लेकिन समूह की दूसरी महिलाओं के साथ मिलकर उन्होंने धीरे-धीरे अपना भरोसा बढ़ाया। आज वे खुद कई महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद कर रही हैं, जिससे गांव की कई और महिलाओं के लिए भी रोजगार के रास्ते खुले हैं।

उत्तराखंड के मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों में इस समय हजारों महिला स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जो छोटी बचत से शुरू होकर धीरे-धीरे स्थानीय उत्पादों का कारोबार खड़ा करती हैं। बबली की कहानी ऐसे समूहों के लिए यह भरोसा देती है कि सही प्रशिक्षण और लगातार मेहनत मिलने पर एक छोटी शुरुआत भी बड़े कारोबार में बदल सकती है।

गोबर से बने उत्पादों की मांग शहरी इलाकों में त्योहारों के मौसम में खासतौर पर बढ़ जाती है, जब लोग रसायन मुक्त और पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद खरीदना पसंद करते हैं। बबली का कहना है कि वे अब अपने उत्पादों को नजदीकी शहरों के मेलों और प्रदर्शनियों तक भी पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं, ताकि कारोबार का दायरा और बढ़ाया जा सके।

कृषि विस्तार से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक बबली जैसी महिलाओं को लगातार तकनीकी सहयोग मिलते रहना जरूरी है, ताकि वे अपने उत्पादों की गुणवत्ता और पैकेजिंग में सुधार करती रहें और बड़े बाजार में टिक सकें।

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