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राज्य कृषि समाचार (State News)

भिंडी और मिर्च की फसल में बढ़ा कीट प्रकोप, वैज्ञानिकों ने बताई दवा और मात्रा

20 अक्टूबर 2026, कोयंबटूर (तमिलनाडु): भिंडी और मिर्च की फसल में बढ़ा कीट प्रकोप, वैज्ञानिकों ने बताई दवा और मात्रा – इस समय भिंडी और मिर्च की फसल में कई तरह के कीटों का प्रकोप देखा जा रहा है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की अक्टूबर माह की सलाह में किसानों को इन कीटों से बचाव के तरीके बताए गए हैं।

भिंडी में फल छेदक कीट का असर सबसे ज्यादा देखा जा रहा है, जो फलों के अंदर घुसकर उन्हें खराब कर देता है। इसके नियंत्रण के लिए बेसिलस थुरिंजिएंसिस दो ग्राम प्रति लीटर पानी में या क्लोरैंट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी तीन मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है। खेत में फेरोमोन ट्रैप पांच प्रति हेक्टेयर की दर से लगाने की सलाह भी दी गई है।

भिंडी की फसल में पीत शिरा मोज़ेक रोग भी फैल रहा है, जो सफेद मक्खी के जरिए एक पौधे से दूसरे पौधे में पहुंचता है। इसके लिए मेथिलडेमेटॉन 25 ईसी 800 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर या थायामेथोक्सम 25 डब्लूजी 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर का छिड़काव कारगर बताया गया है। जरूरत पड़ने पर 15 दिन बाद छिड़काव दोहराया जा सकता है।

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मिर्च में थ्रिप्स और पत्ती मुड़ने की समस्या

मिर्च की फसल में थ्रिप्स कीट का प्रकोप भी बढ़ रहा है, जिससे पत्तियां मुड़ने लगती हैं और पौधे की बढ़वार रुक जाती है। इसके लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल तीन मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी या इमामेक्टिन बेंजोएट पांच एसजी चार ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

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वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि मिर्च के खेत में अगती (सेस्बानिया) की अंतरफसल लगाने से थ्रिप्स का प्रकोप कम किया जा सकता है। पत्ती मुड़ने और मोज़ेक की समस्या पर डाइमेथोएट 30 ईसी 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 100 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करने से पहले संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट करना जरूरी बताया गया है।

मिर्च में सफेद मक्खी के लिए पीले चिपचिपे ट्रैप 12 प्रति हेक्टेयर की दर से लगाने और पायरीप्रॉक्सीफेन 10 ईसी एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के छिड़काव की सलाह दी गई है। खेत के आसपास की जंगली खरपतवार हटाने से भी सफेद मक्खी का प्रकोप घटता है।

जड़ और माइट की समस्या पर भी ध्यान जरूरी

भिंडी की फसल में जड़ों पर गांठ बनाने वाला सूत्रकृमि यानी रूट-नॉट निमेटोड भी नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधे की बढ़वार रुक जाती है और पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। इसके लिए पोकोनिया क्लैमाइडोस्पोरिया जैसे जैव-नियंत्रक को गोबर की खाद के साथ मिलाकर ढाई किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डाला जा सकता है। ज्यादा प्रकोप वाले खेतों में कार्बोफ्यूरान 3जी 33.3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाने की सलाह दी गई है।

भिंडी में माइट की समस्या पर थायामेथोक्सम 25 डब्लूजी दो ग्राम प्रति 10 लीटर पानी या स्पाइरोमेसिफेन 22.9 एससी आठ मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी का छिड़काव कारगर बताया गया है। मिर्च में माइट के लिए प्रोपार्गाइट 57 ईसी तीन मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या डाइफेन्थ्यूरॉन 50 डब्लूपी 1.2 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि एक ही दवा का बार-बार इस्तेमाल करने से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता बन सकती है, इसलिए दवाओं को बदल-बदल कर इस्तेमाल करना बेहतर रहता है। जिन इलाकों में भिंडी और मिर्च की खेती बड़े पैमाने पर होती है, वहां किसानों से कहा गया है कि वे खेत के किनारों की सफाई रखें और संक्रमित पत्तियों व फलों को समय पर हटाकर नष्ट कर दें, ताकि कीट और रोग आसपास के खेतों में न फैलें।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अक्टूबर के महीने में नमी और तापमान में बदलाव के चलते सब्जियों में कीट-रोग का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए खेत का नियमित निरीक्षण जरूरी है। भिंडी और मिर्च दोनों ही तमिलनाडु के कई जिलों में बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली फसलें हैं, और समय पर कीट न पकड़ में आने से उपज और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ता है।

किसी भी दवा का छिड़काव करने से पहले मात्रा को लेकर स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से एक बार सलाह ले लेना बेहतर रहता है, क्योंकि प्रकोप की तीव्रता और फसल की अवस्था के हिसाब से मात्रा में थोड़ा बदलाव हो सकता है। वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि जैविक नियंत्रण के तरीकों, जैसे फेरोमोन ट्रैप और चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल, रासायनिक छिड़काव से पहले अपनाया जाना चाहिए, ताकि खेत में मित्र कीटों को कम से कम नुकसान पहुंचे।

जिन किसानों के खेत में अभी प्रकोप के लक्षण साफ नहीं दिख रहे, उन्हें भी सलाह दी गई है कि वे सप्ताह में कम से कम एक बार पत्तियों के नीचे और तने के पास कीट या अंडों की मौजूदगी जांच लें, ताकि समय रहते नियंत्रण किया जा सके और नुकसान बढ़ने से पहले ही रोका जा सके।

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