Ad DesktopAd TabletAd Mobile
राज्य कृषि समाचार (State News)

अफीम का संतुलित पोषण प्रबंधन

लेखक: डॉ. रोशन गलानिया, सहायक प्राध्यापक, राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर, उद्यानिकी महाविद्यालय, मंदसौर (म.प्र.) – 458001

20 अक्टूबर 2026, भोपाल: अफीम का संतुलित पोषण प्रबंधन –

उपयोगिता एवं महत्व

भारतवर्ष में अफीम की खेती का महत्व प्राचीन काल से एक औषधीय पौधे के रूप में जाना जाता है। विभिन्न प्रकार की गुणकारी औषधियों में उपयोग करने तथा विदेशी मुद्रा अर्जित करने का यह एक प्रमुख स्रोत है। अफीम से 40–42 प्रकार के उपक्षार (एल्कलॉइड्स) निकाले जाते हैं। मुख्य रूप से मॉर्फिन, कोडीन, थीबेन, थियामिन व पापावेरिन निर्मित किए जाते हैं, जो कि बहुत से शारीरिक एवं मानसिक विकारों के निदान में प्रभावकारी पाए गए हैं। यह पीड़ानाशक, संग्रहक, आनंददायक, निद्राजनक तथा उत्तेजक होता है। इसके अलावा इसका उपयोग हृदय रोग, मस्तिष्क विकार, खाँसी, श्वसन, दाँत दर्द, पेचिश, रक्तचाप इत्यादि विकारों के उपचार में भी किया जाता है।

Ad DesktopAd TabletAd Mobile
Ad DesktopAd TabletAd Mobile

अफीम के बीज को पोस्ता या खसखस के नाम से जाना जाता है। इसका उपयोग खाद्य, बीज व तेल के रूप में भी किया जाता है। बीज में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

कृषक जगत को व्हाट्सएप पर फॉलो करें
खेती-किसानी की ताज़ा खबरें, सीधे आपके फ़ोन पर
चैनल फॉलो करें

इसके अलावा डोडा छिलका या भूसी से भी उपक्षार (एल्कलॉइड) निकाला जाता है और औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है। अफीम का निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित कर देश की आर्थिक दशा सुदृढ़ करने में सहयोग मिलता है।

क्षेत्रफल एवं वितरण

भारतवर्ष में इसकी खेती तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के कुछ सीमित क्षेत्रों में ही की जाती है। इसकी खेती मध्य प्रदेश के रतलाम, मंदसौर, नीमच एवं झाबुआ जिलों में, राजस्थान के प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, झालावाड़ एवं बांसवाड़ा जिलों में तथा उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, फैजाबाद, लखनऊ, रायबरेली, बरेली, बदायूँ, आजमगढ़ तथा गाजीपुर जिलों के सीमित क्षेत्रों में की जाती है।

वर्तमान में अफीम की उत्पादकता काफी कम है, जिसके चलते प्रतिवर्ष हजारों किसानों के पट्टे (अफीम खेती के लिए लाइसेंस) निरस्त हो जाते हैं।

भूमि का चुनाव एवं तैयारी

अफीम के लिए मध्यम से गहरी भूमि, जिसकी जलधारण क्षमता एवं जीवांश की मात्रा अधिक हो, उपयुक्त होती है। दो-तीन बार आड़ी-खड़ी जुताई करें, दो बार बखर चलाएँ तथा बाद में पाटा चलाकर मिट्टी भुरभुरी कर लें। पुरानी फसल के अवशेष नष्ट कर दें। संकरी एवं कम लंबी क्यारियाँ बनाएँ।

पोषण प्रबंधन

अफीम की फसल से वांछित उत्पादन प्राप्त न होने के कई कारणों में से एक प्रमुख कारण अफीम का असंतुलित पोषण प्रबंधन है। नगदी फसल होने के कारण कृषक अफीम की फसल में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं रखना चाहता है। कृषक] अति उत्साह में कुछ पोषक तत्वों का तो आवश्यकता से अधिक मात्रा में प्रयोग कर देता है। और कभी कृषक आवश्यक कई सूक्ष्म तत्वों का प्रयोग नहीं करता है या कम मात्रा में प्रयोग करता है। अफीम में संतुलित पोषण प्रबंधन के लिए बौनी से पूर्व अपने खेत की मिट्टी की जांच आवश्यक रूप से करवानी चाहिए। मिट्टी की जांच करवाने से कृषक को अफीम की फसल में प्रदान करने वाले खाद एवं उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा का पता चलता है। मिट्टी की जांच के आधार पर ही किसान अफीम की फसल में संतुलित मात्रा में पोषण प्रबंधन कर सकता है।

जीवांश पदार्थ प्रबंधन

मिट्टी में जीवांश की उत्तम मात्रा होने पर मिट्टी की जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है साथ ही उचित जल निकास की अवस्था का निर्माण होता है। अफीम की संतुलित वृद्धि एवं उचित लेटेक्स उत्पादन प्राप्ति के लिए मिट्टी में जीवांश पदार्थ की उत्तम मात्रा का होना आवश्यक है। मिट्टी में जीवांश की मात्रा में वृद्धि के लिए कृषक देसी खाद या केंचुआ खाद का प्रयोग बुवाई से पहले कर सकते हैं। यदि कृषक बुवाई के पूर्व देसी खाद या केंचुआ खाद का प्रयोग नहीं कर पाते हैं तो ऐसे में वे खरीफ फसल की बोवनी के पूर्व भी इनका प्रयोग कर सकते हैं।

मिट्टी में जीवांश की मात्रा वृद्धि के लिए कृषक बंधु ढेचा] सनई] मूंग एवं लोबिया जैसी हरी खाद की फसल को खेत में उनके फूल आने की अवस्था के पूर्व मिट्टी में मिला देते हैं तो इससे भी मृदा में जीवांश की मात्रा में भारी वृद्धि होती है।

इसके अतिरिक्त मिट्टी में जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिए किसान भाई अफीम की खड़ी फसल में बायोगैस की स्लरी भी सिंचाई जल के साथ दे सकते हैं।

उर्वरक प्रबंधन

अफीम में संतुलित पोषण प्रबंधन के लिए बौनी से पूर्व अपने खेत की मिट्टी की जांच आवश्यक रूप से करवानी चाहिए। यदि किसी कारण से कृषक मिट्टी की जांच नहीं करवा पाता है तो वह अफीम फसल के लिए सामान्य अनुशंसित मात्रा का प्रयोग अपने खेतों में कर सकता है। ऐसी स्थिति में कृषकों को 15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 7.5 किलो फास्फोरस व 5 किलो पोटेशियम प्रति 10 आरी देना चाहिए। इसमें नत्रजन की कुल मात्रा को तीन भागों में विभक्त कर देना चाहिए वहीं स्फुर व पोटेशियम की संपूर्ण मात्रा बोनी के समय ही दे देना चाहिए।

उपरोक्त बताई गई पोषक तत्वों की मात्रा को निम्नलिखित उर्वरको के विकल्पों के अनुसार प्रयोग कर सकते हैं।

उर्वरक समूह विकल्प-1

1. यूरिया-  (पहली डोज 6.5 किलोग्राम बुवाई के समय, दूसरी डोज  13 किलोग्राम  बुवाई की 30 से 35 दिनों पर एवम अंतिम डोज 6.5 किलो बुवाई के 55 से 60 दिनों पर देवे)

2. डी ए पी – 18 किलो,

3. म्यूरेट ऑफ पोटाश-8 किलो,

4. सल्फर 2.5 किलो (दो साल में एक बार)

5. जिंक सल्फेट 2.5 किलो ग्राम (दो साल में एक बार)

उर्वरक समूह विकल्प -2:-

1. यूरिया-   (पहली डोज 9 किलोग्राम बुवाई के समय, दूसरी डोज  17 किलोग्राम  बुवाई की 30 से 35 दिनों पर एवम अंतिम डोज 9 किलो बुवाई के 55 से 60 दिनों पर देवे)

2. सिंगल सुपर फास्फेट (राकोड़िया या एस एस पी) 50 किलोग्राम

3. म्यूरेट ऑफ पोटाश-8 किलो ग्राम

4. जिंक सल्फेट 2.5 किलो ग्राम (दो साल में एक बार)

उर्वरक समूह विकल्प -3:-

1. एन पी के 12:32:16 की 26 किलो,

2. यूरिया- (पहली डोज 6 किलोग्राम बुवाई के समय, दूसरी डोज  12 किलोग्राम  बुवाई की 30 से 35 दिनों पर एवम अंतिम डोज 6 किलो बुवाई के 55 से 60 दिनों पर देवे)

3. म्यूरेट ऑफ पोटाश — नही देना है

4. सल्फर 2.5 किलो (दो साल में एक बार)

5. जिंक सल्फेट 2.5 किलो ग्राम (दो साल में एक बार)

अफीम के पोषक तत्व प्रबंधन में कुछ कार्यों को आवश्यक रूप से करना चाहिए एवं कुछ कार्यों को बिल्कुल नहीं करना चाहिए इनका विवरण निम्नानुसार है।

क्या करें

  • मिट्टी की जांच करवाना ही चाहिए।
  • अच्छी पक्की हुई गोबर खाद (चाय पत्ती के दाने जैसी) या केंचुआ खाद बोनी के पूर्व देना चाहिए। गोबर खाद 5 क्विंटल या कैचुआ खाद (वर्मी कंपोस्ट या अलसिया खाद) 2.5 क्विंटल बुवाई के 10 से 15 दिन पूर्व प्रति 10 आरी के मान से देना चाहिए।
  • नत्रजन की संपूर्ण मात्रा को तीन भागों में विभक्त कर प्रयोग करना चाहिए।
  • पोटाश, स्फुर, गंधक एवं जस्ता आदि तत्वों की पूरी मात्रा बोनी के समय ही दे देना चाहिए।
  • सल्फर की कमी वाले खेतों में सल्फर 2.5 किलो प्रति 10 आरी के मान से डाले।

क्या ना करें

  • डीएपी और पोटाश जैसे उर्वरकों को खड़ी फसल में प्रयोग ना करें
  • बाजार में उपलब्ध तथाकथित महंगे जैविक खाद व टॉनिक का प्रयोग न करें।
  • अफीम फसल की 2 माह की अवधि के पश्चात कोई भी उर्वरक ना दे।
  • उर्वरक, बीज से एक इंच नीचे डालें । दोनो को कभी भी मिश्रित कर नहीं बोएं।

यदि कृषक ऊपर बताई गई सलाहों को अपनाते है तो वे अफीम का अच्छा उत्पादन तो पा सकते है, साथ ही वे प्राप्त लेटेक्स में मॉर्फिन एवं अन्य उपक्षार की भी अधिक मात्रा प्राप्त कर सकते है।

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture