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राज्य कृषि समाचार (State News)

झाबुआ की अर्चना बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

दो गायों से शुरू हुआ सफर, आज हर माह दो लाख तक की आय

10 जुलाई 2026, झाबुआ: झाबुआ की अर्चना बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल – कहते हैं मेहनत, दूर दृष्टि और सही समय पर मिला सहयोग किसी भी जीवन की दिशा बदल सकता है। इंदौर संभाग के झाबुआ जिले के पेटलावद विकासखंड के ग्राम बावड़ी की श्रीमती अर्चना धर्मेन्द्र पाटीदार ने इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है। कभी केवल दो दुधारू गायों के सहारे परिवार का भरण-पोषण करने वाली अर्चना आज आधुनिक डेयरी प्रबंधन, वैज्ञानिक पशुपालन और एकीकृत कृषि प्रणाली के माध्यम से प्रतिमाह डेढ़ से दो लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं।

आचार्य विद्यासागर गौ-संवर्धन योजना से मिली आर्थिक सहायता ने उनके छोटे डेयरी व्यवसाय को आधुनिक उद्यम में बदल दिया। आज वे न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों और महिला पशुपालकों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। साथ ही अब आगे योजना पर काम करते हुए उन्होंने गौ – अभ्यारण्य बनाने की योजना पर काम शुरू किया है। संभागायुक्त डॉ. सुदाम खाड़े और झाबुआ कलेक्टर डॉ. योगेश तुकाराम भरसट द्वारा विगत दिनों श्रीमती अर्चना पाटीदार की डेयरी फार्म का अवलोकन किया गया।

छोटे डेयरी व्यवसाय से आधुनिक डेयरी फार्म तक –   12 सदस्यीय संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियों के बीच वर्ष 2012 में अर्चना ने हरियाणा से दो संकर एचएफ दुधारू गाय खरीदकर डेयरी व्यवसाय की शुरुआत की। प्रतिदिन लगभग 20 लीटर दूध का उत्पादन होता था, जिसे सांची दुग्ध समिति में विक्रय किया जाता था। सीमित आय के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। सबसे आश्चर्य की बात यह भी है कि उन्होंने गौवंश के लिए अलग- अलग बाड़े, गोबर गैस प्लांट, शेड, शेडनेट हाउस आदि मात्र आधे एकड़ में बनाया है।

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योजना से मिला संबल, बढ़ा आत्मविश्वास –  वर्ष 2022-23 में आचार्य विद्यासागर गौ-संवर्धन योजना के अंतर्गत उन्हें 3.80 लाख रुपये की इकाई पर 95 हजार रुपये का शासकीय अनुदान मिला। इस सहायता से उन्होंने पाँच उन्नत संकर एचएफ गायें खरीदीं और अपने डेयरी व्यवसाय का विस्तार किया। यही वह मोड़ था, जिसने उनकी सफलता की नई शुरुआत की।

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वैज्ञानिक पशुपालन से बढ़ा उत्पादन –  अर्चना ने आधुनिक तकनीकों को अपनाते हुए सेक्स सॉर्टेड सीमन से कृत्रिम गर्भाधान कराया। वर्तमान में उनके डेयरी फार्म में लगभग 20 दुधारू गायें और 20 उन्नत नस्ल की मादा बछियां हैं। नियमित देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन से दूध उत्पादन बढ़कर 180 से 200 लीटर प्रतिदिन तक पहुंच गया है।

संतुलित पोषण और आधुनिक तकनीक का लाभ –   अर्चना ने  पशुओं के लिए साइलेज, नेपियर घास, मिनरल मिक्सचर और संतुलित पशु आहार की व्यवस्था की, जिससे दूध उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हुई और उत्पादन लागत भी कम हुई। मिल्किंग मशीन के उपयोग से दूध की गुणवत्ता बेहतर हुई, श्रम की बचत हुई तथा पशुओं में थनेला रोग की आशंका भी घटी।

डेयरी के साथ उन्नत कृषि का सफल मॉडल – डेयरी व्यवसाय के साथ  अर्चना ने  पॉलीहाउस में टमाटर एवं मिर्च की पौध तैयार करना तथा खीरा और ककड़ी का उत्पादन शुरू किया, जिससे प्रतिवर्ष 6 से 8 लाख रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। मक्का और सोयाबीन की खेती भी उनकी आय का महत्वपूर्ण आधार है।

संसाधनों का बेहतर उपयोग बना अतिरिक्त लाभ –   अर्चना के  डेयरी फार्म में गौमूत्र और शेड के अपशिष्ट जल का उपयोग खेतों की सिंचाई में किया जाता है। गोबर से तैयार बायोगैस से परिवार का भोजन बनता है, जबकि बायोगैस स्लरी और गोबर खाद खेतों में जैविक उर्वरक के रूप में उपयोग की जाती है। इससे खेती की लागत कम हुई और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिला।

बढ़ी आय, मिला रोजगार और शिक्षा को नई दिशा –  जहां  पहले  अर्चना की  मासिक आय लगभग 40 हजार रुपये थी, वहीं आज विभिन्न कृषि एवं पशुपालन गतिविधियों से उनकी आय 1.50 से 2 लाख रुपये प्रतिमाह तक पहुँच चुकी है। उन्होंने दो स्थानीय युवाओं को रोजगार भी दिया है। बेहतर आर्थिक स्थिति के कारण उनकी पुत्री कोटा में नीट की तैयारी कर रही है, जबकि पुत्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए निजी छात्रावास में अध्ययनरत है।

दूसरे किसानों के लिए बनीं प्रेरणा –  अर्चना पाटीदार की सफलता से प्रेरित होकर आसपास के अनेक किसान वैज्ञानिक पशुपालन और आधुनिक डेयरी प्रबंधन अपना रहे हैं। उनका डेयरी फार्म आज क्षेत्र के पशुपालकों के लिए प्रशिक्षण और प्रेरणा का केंद्र बन गया है।

आगे की सोच – अर्चना का अगला लक्ष्य साइलेज निर्माण को बढ़ावा देना और स्वयं साइलेज मशीन स्थापित कर आसपास के पशुपालकों को कम लागत पर यह सुविधा उपलब्ध कराना है। साथ ही आगे गौ – अभ्यारण्य बनाने की योजना बनाकर कार्य शुरू किया है। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक सोच और शासन की योजनाओं का प्रभावी उपयोग कर पशुपालन को लाभकारी एवं आत्मनिर्भर व्यवसाय बनाया जा सकता है। श्रीमती अर्चना पाटीदार की यह सफलता बताती है कि यदि परिश्रम के साथ नवाचार और शासन की योजनाओं का सही लाभ मिले, तो ग्रामीण परिवार न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बन सकते हैं, बल्कि रोजगार सृजन और सतत ग्रामीण विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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