राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

खेती में रसायनों का संतुलित उपयोग: व्यावहारिक समाधान

09 जुलाई 2026, नई दिल्ली: खेती में रसायनों का संतुलित उपयोग व्यावहारिक समाधान – खरीफ सीजन की शुरुआत हो चुकी है। देशभर में किसान सोयाबीन, धान, कपास, मक्का और अन्य खरीफ फसलों की तैयारी में जुटे हैं। खेतों की जुताई हो रही है, बीज खरीदे जा रहे हैं और खाद-कीटनाशकों की व्यवस्था की जा रही है। इसी दौरान एक सवाल फिर सामने आता है कि जब फसल में कोई भी समस्या आएगी तो रसायन से होने वाले नुकसान जानते हुए भी किसान रासायनिक कीटनाशकों और अन्य उत्पादों का उपयोग करेगा।

मिट्टी की उर्वरता कम हो रही

आज शायद ही कोई किसान ऐसा होगा जो केमिकल के दुष्प्रभावों से अनजान हो। किसान जानता है कि लगातार रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है, लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो रहे हैं, मिट्टी सख्त होती जा रही है और फसलों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर पड़ रही है। इसके बावजूद, हर खरीफ सीजन में बड़ी संख्या में किसान फिर से इन्हीं उत्पादों की ओर लौट जाते हैं।

अधिकांश किसान छोटे और सीमांत

इसकी सबसे बड़ी वजह है किसान की आर्थिक मजबूरी। उदाहरण के लिए- भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं। उनके पास सीमित भूमि है और साल भर की आय का बड़ा हिस्सा खरीफ फसलों पर निर्भर करता है। यदि इस मौसम में उत्पादन प्रभावित हो जाए, तो पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति डगमगा सकती है। ऐसे में किसान कोई बड़ा जोखिम लेने से बचता है।

खरीफ की बुवाई के समय उसके मन में कई सवाल होते हैं- यदि उत्पादन कम हुआ तो कर्ज कैसे चुकाऊंगा? परिवार का खर्च कैसे चलेगा? बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरतें कैसे पूरी होंगी? इन्हीं चिंताओं के कारण वह वही तरीका अपनाता है, जिससे वह परिचित है। भले ही उसे पता हो कि केमिकल का अत्यधिक उपयोग लंबे समय में नुकसान पहुँचा रहा है, लेकिन उसे लगता है कि फिलहाल यही उसकी फसल को सुरक्षित रखने का सबसे भरोसेमंद तरीका है।

बाजार और आय पर निर्भरता

दूसरा बड़ा कारण है बाजार और आय पर निर्भरता। खरीफ की फसलें किसानों की वार्षिक आय का महत्वपूर्ण आधार होती हैं। उन्हें समय पर उत्पादन चाहिए, अच्छी आय चाहिए होती है। रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक अपेक्षाकृत तेजी से असर दिखाते हैं, इसलिए किसान उन्हें एक तरह की सुरक्षा के रूप में देखता है। उसके लिए तत्काल उत्पादन सुनिश्चित करना अक्सर दीर्घकालिक मिट्टी स्वास्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

उचित मार्गदर्शन नहीं

इसके अलावा, किसानों के सामने व्यावहारिक विकल्पों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। कई किसान संतुलित या कम केमिकल वाली खेती अपनाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त जानकारी और भरोसेमंद विकल्प नहीं मिल पाते। कई बार गैर-रासायनिक उत्पाद उपलब्ध नहीं होते, तो कई बार उनके उपयोग की सही विधि समझ नहीं आती। कुछ किसानों ने विकल्प अपनाने की कोशिश की, लेकिन उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। ऐसे अनुभव उनके मन में संदेह पैदा कर देते हैं। आने वाले इस खरीफ सीजन में भी लाखों किसान इसी दुविधा से गुजरेंगे। एक तरफ उन्हें केमिकल के नुकसान दिखाई देते हैं, तो दूसरी तरफ उत्पादन और आय की चिंता उन्हें पुराने तरीकों पर निर्भर बनाए रखती है। इसलिए समाधान केवल केमिकल के नुकसान गिनाने में नहीं है, बल्कि ऐसे व्यावहारिक विकल्प देने में है जो मिट्टी को स्वस्थ रखें, लागत कम करें और उत्पादन को स्थिर बनाए रखें।

संतुलित खेती एक व्यावहारिक समाधान

ऐसे समय में संतुलित खेती एक व्यावहारिक समाधान बनकर सामने आती है। संतुलित खेती का मतलब केमिकल को एकदम से बंद करना नहीं, बल्कि फसल की जरूरत के अनुसार धीरे-धीरे और समझदारी से उसका उपयोग कम करना है। इसमें मिट्टी के स्वास्थ्य, गैर-रासायनिक उत्पादों, प्राकृतिक पोषण प्रबंधन पर ध्यान दिया जाता है, ताकि उत्पादन स्थिर रहे और किसान पर अतिरिक्त जोखिम न आए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बदलाव किसान की गति से होता है। इससे किसान धीरे-धीरे रासायनिक इनपुट पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है और उत्पादन को स्थिर रखते हुए मिट्टी को उसके प्राकृतिक स्वरूप में लौटा सकता है।

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