एकड़ से शुरू करके 22 एकड़ तक पहुंचे मध्य प्रदेश के किसान, जैविक मसालों से कमा रहे सालाना ₹18-20 लाख
31 अक्टूबर 2026, विनायगा (मध्य प्रदेश): एकड़ से शुरू करके 22 एकड़ तक पहुंचे मध्य प्रदेश के किसान, जैविक मसालों से कमा रहे सालाना ₹18-20 लाख – मध्य प्रदेश के किसान राधेश्याम परिहार ने महज 3 एकड़ जमीन से जैविक खेती की शुरुआत की थी, जो आज बढ़कर 22 एकड़ तक पहुंच गई है। हल्दी, मिर्च, लहसुन और धनिया जैसे मसालों के साथ अश्वगंधा, क्विनोआ, चिया, तुलसी, सतावर और ईसबगोल जैसे औषधीय पौधों की खेती से उनकी सालाना आमदनी 18 से 20 लाख रुपये तक पहुंच गई है।
48 वर्षीय परिहार हर साल इस खेती से करीब 15 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। मसालों के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती ने उनकी आमदनी में विविधता ला दी है, जिससे किसी एक फसल के दाम गिरने पर भी उनकी कुल कमाई पर ज्यादा असर नहीं पड़ता।
प्रोसेसिंग यूनिट और सीधी बिक्री से बढ़ा मुनाफा
परिहार ने अपनी उपज को खुद प्रोसेस करने के लिए एक छोटी प्रोसेसिंग यूनिट भी लगाई है, ताकि कच्चे माल के बजाय तैयार उत्पाद बेचकर ज्यादा कीमत पाई जा सके। वे अपने उत्पादों को मालवामती ब्रांड नाम से बेचते हैं और कृषि मेलों में सीधे ग्राहकों तक पहुंचाते हैं।
बिचौलियों को हटाकर सीधी बिक्री करने से उन्हें अपनी उपज की बेहतर कीमत मिल पाती है। उनकी खेती जैविक प्रमाणन के साथ होती है, जिससे बाजार में उनके मसालों और औषधीय पौधों को प्रीमियम दाम मिलता है।
जैविक खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बजाय गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जैविक कीट नियंत्रण के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है और उपज की गुणवत्ता भी बेहतर होती है, जो ग्राहकों को आकर्षित करने में मदद करती है।
औषधीय पौधों की मांग दवा कंपनियों, आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली इकाइयों और सेहत के प्रति जागरूक ग्राहकों के बीच लगातार बढ़ रही है। अश्वगंधा और सतावर जैसे पौधों की खेती पारंपरिक मसालों की तुलना में कम पानी में भी हो सकती है, जिससे पानी की कमी वाले इलाकों के किसानों के लिए भी यह एक विकल्प बन रही है।
जैविक खेती की तरफ बढ़ने वाले ज्यादातर किसानों को शुरुआती कुछ वर्षों में उत्पादन कम मिलने और नए बाजार तलाशने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि रासायनिक खाद छोड़ने के बाद मिट्टी को प्राकृतिक तरीके से उर्वर होने में समय लगता है। मगर एक बार मिट्टी की सेहत सुधर जाए, तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में धीरे-धीरे सुधार आता है।
प्रोसेसिंग यूनिट लगाने से किसान को कच्चे माल के बजाय तैयार उत्पाद बेचने का फायदा मिलता है, जिसकी कीमत बाजार में कई गुना ज्यादा होती है। हल्दी या मिर्च को सीधे बेचने के बजाय पाउडर या अन्य उत्पाद बनाकर बेचने से किसान को उसकी उपज का बड़ा हिस्सा खुद अपने पास रखने का मौका मिलता है, जो आमतौर पर बिचौलियों और प्रोसेसिंग कंपनियों के पास चला जाता है।
परिहार जैसे किसानों की कहानी बताती है कि छोटी जमीन से शुरुआत करने वाले किसान भी सही फसल चयन, प्रोसेसिंग और सीधी मार्केटिंग के सहारे धीरे-धीरे अपनी खेती का दायरा और आमदनी दोनों बढ़ा सकते हैं। मसाले और औषधीय पौधों की खेती में मेहनत ज्यादा लगती है, लेकिन परंपरागत अनाज वाली फसलों के मुकाबले मुनाफे का मार्जिन कहीं ज्यादा रहता है।
कृषि मेलों और स्थानीय बाजारों में सीधी बिक्री करने से किसान को ग्राहकों की जरूरत और पसंद को सीधे समझने का मौका भी मिलता है। इससे वे अगले सीजन की फसल योजना इस आधार पर बना पाते हैं कि किस उत्पाद की मांग बाजार में ज्यादा है, जिससे उत्पादन और बिक्री के बीच का अंतर कम होता है।
मसाला खेती वाले इलाकों में जैविक प्रमाणन की प्रक्रिया धीरे-धीरे आसान हो रही है, जिससे छोटे व मझोले किसानों के लिए भी जैविक बाजार में अपनी जगह बनाना संभव हो गया है। परिहार जैसे किसान इसी बदलते माहौल का फायदा उठाकर अपनी खेती को आगे बढ़ा रहे हैं।
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