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राज्य कृषि समाचार (State News)

किशनगंज के किसान ने आधे एकड़ में एकीकृत खेती से कमाए सालाना 10 लाख रुपए

30 अक्टूबर 2026, किशनगंज (बिहार): किशनगंज के किसान ने आधे एकड़ में एकीकृत खेती से कमाए सालाना 10 लाख रुपए – बिहार के किशनगंज जिले के ढेकसरा गांव के किसान राम कुमार बैठा ने सिर्फ आधे एकड़ यानी 0.25 हेक्टेयर जमीन पर एकीकृत खेती का मॉडल अपनाकर सालाना करीब 10 लाख रुपए की कमाई शुरू कर दी है। उनके परिवार में छह सदस्य हैं, और वे ही परिवार में एकमात्र कमाने वाले सदस्य हैं।

राम कुमार बैठा ने स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र यानी केवीके के मार्गदर्शन में अपनी छोटी सी जमीन पर गेहूं, धान, मक्का और मौसमी सब्जियों की फसल चक्र अपनाई है। इसके साथ ही उन्होंने 12 गायें और दो भैंसें भी पाली हैं, जो उनकी आय का सबसे बड़ा हिस्सा बन गई हैं।

डेयरी बनी आय का मुख्य जरिया

राम कुमार बैठा की सालाना कुल आय में से करीब 8 लाख रुपए सिर्फ डेयरी व्यवसाय से आते हैं। दूध बेचने के साथ-साथ वे गोबर का भी पूरा इस्तेमाल करते हैं, जिससे वर्मीकम्पोस्ट यानी जैविक खाद तैयार होती है।

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वे इस वर्मीकम्पोस्ट का इस्तेमाल अपने ही खेत में करते हैं, जिससे खेती में रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हुई है और मिट्टी की सेहत भी बेहतर हुई है। इसके अलावा बची हुई वर्मीकम्पोस्ट वे आसपास के दूसरे किसानों को भी बेचते हैं, जिससे उन्हें एक अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिल गया है।

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केवीके की सलाह पर उन्होंने अपनी सीमित जमीन पर फसलों की अदला-बदली इस तरह तय की है कि साल भर खेत से कुछ न कुछ उत्पादन होता रहे। गेहूं और धान की मुख्य फसलों के साथ-साथ वे मक्का और मौसमी सब्जियां भी उगाते हैं, जिससे घर के खाने-पीने की जरूरत भी पूरी होती है और बाजार में बेचने के लिए अतिरिक्त उपज भी बचती है।

राम कुमार बैठा का कहना है कि मशरूम जैसी अतिरिक्त फसलों की तुलना में डेयरी और खेती को साथ जोड़ने से उन्हें लगातार और भरोसेमंद आय मिलने लगी है। उनके मुताबिक इस मॉडल में लागत भी नियंत्रण में रहती है, क्योंकि गोबर से बनने वाली खाद के चलते बाहर से खाद खरीदने का खर्च बहुत कम हो गया है।

इतनी कम जमीन पर इतनी अच्छी कमाई की वजह से राम कुमार बैठा किशनगंज जिले के छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक उदाहरण बन गए हैं, जिनके पास जमीन तो कम है लेकिन पशुपालन और खेती को सही तरीके से जोड़कर अच्छी आय हासिल की जा सकती है। केवीके के वैज्ञानिक भी समय-समय पर उनके खेत का दौरा करते हैं और आसपास के किसानों को उनके मॉडल को अपनाने की सलाह देते हैं।

बिहार जैसे राज्य में, जहां जमीन का बंटवारा लगातार छोटे टुकड़ों में हो रहा है, राम कुमार बैठा का यह मॉडल दिखाता है कि सीमित जमीन भी अगर सही योजना के साथ इस्तेमाल की जाए, तो परिवार की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

छोटे किसानों के लिए सीख

किशनगंज जैसे सीमांत जिले में ज्यादातर किसान परिवारों के पास एक एकड़ से भी कम जमीन होती है, जिस पर सिर्फ अनाज की खेती से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। राम कुमार बैठा के मॉडल से यह साबित होता है कि अगर खेती के साथ पशुपालन को सही तरीके से जोड़ दिया जाए, तो कम जमीन भी परिवार के लिए अच्छी आय का जरिया बन सकती है।

डेयरी से मिलने वाली आय हर महीने लगभग एक जैसी बनी रहती है, जबकि फसल से होने वाली कमाई मौसम और बाजार भाव पर निर्भर करती है। इसी वजह से राम कुमार बैठा के परिवार को साल भर कमोबेश स्थिर आय मिलती रहती है, जिससे घर के रोजमर्रा के खर्च और बच्चों की पढ़ाई जैसी जरूरतें पूरी करने में आसानी होती है।

केवीके के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के एकीकृत मॉडल को अपनाने से पहले किसानों को अपने संसाधनों, जैसे पानी की उपलब्धता और पशुओं के चारे की व्यवस्था, का सही आकलन करना चाहिए। राम कुमार बैठा ने भी शुरुआत में कम पशुओं के साथ यह काम शुरू किया था, और धीरे-धीरे अनुभव के साथ अपने पशुधन और वर्मीकम्पोस्ट के कारोबार को बढ़ाया।

किशनगंज जिले के कृषि अधिकारियों के मुताबिक आसपास के कई और किसान अब राम कुमार बैठा से मिलकर इस मॉडल की जानकारी ले रहे हैं, ताकि वे भी अपनी सीमित जमीन पर इसी तरह की आय का जरिया बना सकें।

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