उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल पर लाल सड़न और जड़ सड़न का खतरा, इन दवाओं से मिलेगा बचाव
05 नवंबर 2026, लखनऊ: उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल पर लाल सड़न और जड़ सड़न का खतरा, इन दवाओं से मिलेगा बचाव – उत्तर प्रदेश में गन्ने की खड़ी फसल में लाल सड़न और जड़ सड़न रोग का खतरा बढ़ गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग, मौसम केंद्र लखनऊ की ओर से जारी राज्य कृषि मौसम परामर्श बुलेटिन में किसानों को इन दोनों रोगों से बचाव के उपाय बताए गए हैं। यह बुलेटिन 3 नवंबर की सुबह से 6 नवंबर की सुबह तक के लिए वैध है और राज्य के सभी कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए जारी किया गया है।
लाल सड़न से बचाव के लिए छिड़काव और जैविक उपाय
लाल सड़न यानी रेड रॉट गन्ने की सबसे गंभीर बीमारियों में से एक मानी जाती है, जो पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है। बुलेटिन के मुताबिक इस रोग से बचाव के लिए एज़ोक्सीस्ट्रोबिन 18.2 प्रतिशत और डाइफेनोकोनाज़ोल 11.4 प्रतिशत एससी की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
किसान जैविक तरीका भी अपना सकते हैं। इसके लिए 100 किलोग्राम गोबर की खाद में ढाई किलोग्राम स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस मिलाकर खेत में डालने की सिफारिश की गई है। बुलेटिन में यह भी चेतावनी दी गई है कि जिन खेतों में लाल सड़न का प्रकोप हो चुका है, वहां पुरानी फसल से दोबारा उगने वाली रेटून फसल बिल्कुल न लें, क्योंकि इससे रोग और फैल सकता है।
जड़ सड़न के लिए थियोफिनेट मिथाइल कारगर
गन्ने की जड़ सड़न रोग से बचाव के लिए किसान थियोफिनेट मिथाइल 70 डब्ल्यूपी या कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर पौधों की जड़ों के आसपास डालने की सलाह दी गई है।
इसी बुलेटिन में गेहूं की फसल में दीमक से बचाव के लिए क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी की 5 लीटर प्रति हेक्टेयर मात्रा पहली सिंचाई के समय इस्तेमाल करने की सलाह भी दी गई है, जिससे किसान एक साथ कई फसलों की सुरक्षा कर सकते हैं।
उत्तर प्रदेश गन्ना उत्पादन के मामले में देश के सबसे बड़े राज्यों में शामिल है, और लाखों किसान परिवारों की आजीविका इस फसल पर निर्भर है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि लाल सड़न और जड़ सड़न जैसी बीमारियां अगर समय पर नियंत्रित न हों, तो चीनी मिलों तक पहुंचने वाले गन्ने की मिठास और उपज दोनों पर बुरा असर पड़ता है।
इसीलिए किसानों को सलाह दी गई है कि वे अपने खेतों की नियमित निगरानी करें और शुरुआती लक्षण दिखते ही सिफारिश की गई दवाओं का इस्तेमाल करें। बीमारी से बचाव के लिए स्वस्थ और रोगमुक्त बीज गन्ने का इस्तेमाल करना भी ज़रूरी बताया गया है, ताकि अगली बुवाई में भी संक्रमण का खतरा कम रहे। साथ ही खेतों में पानी निकासी की सही व्यवस्था रखने की भी सलाह दी गई है, क्योंकि ज्यादा नमी से जड़ सड़न का खतरा और बढ़ जाता है।
नवंबर का महीना उत्तर प्रदेश में गन्ने की कटाई और चीनी मिलों में पेराई सीज़न शुरू होने का भी समय होता है। ऐसे में अगर खेतों में लाल सड़न या जड़ सड़न का प्रकोप रहता है, तो न सिर्फ उपज घटती है, बल्कि गन्ने में मौजूद रस की मात्रा और उसकी गुणवत्ता भी प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर किसानों को मिलने वाले भाव पर पड़ता है।
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जिन खेतों में बीमारी के लक्षण दिखें, वहां से स्वस्थ दिखने वाले हिस्सों का भी बीज गन्ने के तौर पर इस्तेमाल न करना चाहिए, क्योंकि संक्रमण शुरुआती अवस्था में आंखों से दिखना ज़रूरी नहीं है। किसानों को सलाह दी गई है कि किसी भी दवा का छिड़काव करने से पहले एक बार नज़दीकी गन्ना शोध केंद्र या कृषि विज्ञान केंद्र से अपने खेत की स्थिति की जांच करवा लें, ताकि सही समय पर सही उपाय अपनाया जा सके और फसल को होने वाला नुकसान कम से कम हो।
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