मध्य क्षेत्र के लिए सोयाबीन की 4 किस्मों की पहचान की गई

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सोयाबीन समन्वित अनुसंधान परियोजना की वार्षिक समूह बैठक संपन्न

19 मई 2022, इंदौर । मध्य क्षेत्र के लिए सोयाबीन की 4 किस्मों की पहचान की गई – सोयाबीन पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना की दो दिवसीय राष्ट्रीय स्तर की वार्षिक समूह बैठक बुधवार को संपन्न हो गई। अंतिम दिन सूक्ष्म जीव विज्ञान, खाद्य प्रौद्योगिकी, प्रजनक बीज उत्पादन, कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के क्षेत्र में पिछले वर्ष गए अनुसंधान परीक्षण की प्रस्तुतियों के साथ वर्ष 2022 में  किये जाने वाले अनुसन्धान कार्यक्रम निर्धारित किए गए।  मध्य क्षेत्र के लिए सोयाबीन की 4 किस्मों की पहचान की गई।

सूक्ष्मजीव विज्ञान के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2021 के दौरान पौध वृध्दि कारकों से संबंधित  विशिष्ट इनोकुलेंट्स और बैक्टीरिया की पहचान की है जो नाइट्रोजन अवशोषण के साथ-साथ अजैविक तनाव विशेषकर सूखे की स्थिति में फसल को विपरीत मौसम की स्थिति का सामना करने हेतु शक्ति प्रदान करते हैं,  अतः इसे किसानों तक ले जाने की सिफारिश की गई । खाद्य प्रौद्योगिकी से संबंधित सत्र में सोया दूध और टोफू के संबंध में उपयुक्त सोयाबीन लाइनों और जीनोटाइप की पहचान की गई है। वहीं  प्रजनक बीज उत्पादन कार्यक्रम की समीक्षा कर आगामी वर्ष के लिए किस्मवार मांग को अंतिम रूप दिया गया। वर्ष 2023 के लिए 15,919 क्विंटल प्रजनक बीज की मांग को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित कर  केन्द्रवार आवंटन किया गया। जबकि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण संबंधी  तकनीकी सत्र में संबंधित वैज्ञानिकों ने देश भर में किसानों के खेतों पर 1 एकड़ क्षेत्र के कुल 1800 अग्रिम पंक्ति प्रदर्शनों के आयोजन से सोया कृषकों को नवीनतम तकनीकों को अपनाने हेतु प्रेरित किया गया।  इन प्रदर्शनों में उन्नत किस्मों, बीज दर, बोवनी के लिए उपयुक्त कतारों की दूरी आदि जैसी पद्धतियों का मूल्याङ्कन किया जाता है।आदिवासी-उपयोजना के अंतर्गत आदिवासी किसानों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम , सोयाबीन के  प्रदर्शन प्लाट तथा खेती के लिए आवश्यक अन्य आदानों का वितरण किया जा रहा है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में टोफू / सोया दूध एवं अन्य सोया उत्पादों के लघु स्तर पर आय सृजन गतिविधियों के लिए तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।

सोयाबीन की नई किस्मे

बैठक के अंतिम सत्र में संस्थान की कार्यवाह निदेशक डॉ नीता खांडेकर ने “किस्म पहचान समिति” के माध्यम से अनुशंसित की गई 6 सोयाबीन किस्मों के नाम घोषित किए  गए। इनमें दो किस्मों वीएलएस 99 (उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र के लिए), एनआरसी 149 (उत्तरी मैदानी क्षेत्र के लिए) तथा मध्य क्षेत्र के लिए 4 किस्में एनआरसी 152, एनआरसी 150, जेएस 21-72 एवं हिम्सो-1689 की पहचान की गई है। इस वर्ष भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान में सोयाबीन की जिन 3  किस्मों की पहचान की गई, उनमें से किस्म एनआरसी 149 में उत्तरी मैदानी क्षेत्र के प्रमुख पीला मोज़ेक रोग, राइज़ोक्टोनिया एरियल ब्लाइट  के साथ-साथ गर्डल बीटल और पर्णभक्षी कीटों के लिए प्रतिरोधी है  । इंदौर से ही विकसित एक अन्य सोयाबीन किस्म एनआरसी 150 जो केवल 91 दिन में परिपक्व होती है, सोया गंध के लिए जिम्मेदार लाइपोक्सीजिनेज -2 एंजाइम से मुक्त है तथा चारकोल सड़ांध रोग के लिए प्रतिरोधी है। जबकि एनआरसी 152 नामक किस्म अतिशीघ्र पकने वाली (90 दिनों से कम), खाद्य गुणों के लिए उपयुक्त तथा अपौष्टिक क्लुनिट्ज़ ट्रिप्सिंग इनहिबिटर और लाइपोक्सीजेनेस एसिड -2 जैसे अवांछनीय लक्षणों से मुक्त है., जबकि मध्य प्रदेश के जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय से सम्बद्ध जबलपुर केंद्र से विकसित सोयाबीन की एक अन्य किस्म जेएस 21-72  पीला मोज़ेक वायरस, चारकोल रोट, बैक्टीरियल पस्ट्यूल और लीफ स्पॉट रोग के लिए प्रतिरोधी हैं व 98 दिन में पककर अत्यधिक उत्पादन देने में सक्षम है।

अंत में  डॉ. संजीव गुप्ता सहायक महानिदेशक (तिल एवं दलहन), भाकृअनुप, की अध्यक्षता में हुए  समापन सत्र  में उन्होंने विभिन्न केंद्रों के वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तावित तकनीकी एवं अनुसन्धान परीक्षणों के परिणामों पर  प्रसन्नता व्यक्त कर  तकनीकी बैकस्टॉपिंग के साथ-साथ प्रौद्योगिकियों को किसानों के दरवाजे तक ले जाने के लिए ठोस प्रयास करने पर भी जोर दिया। अंत में ,सोयाबीन फसल के अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रमों से जुड़े डॉ सुनील दत्त बिल्लोरे (भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान), डॉ फिलिप वर्गिस (अघरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट  , पुणे), डॉ जी जे पटेल (आनंद कृषि विश्वविद्यालय, गुजरात) डॉ रामगिरी (कृषि महाविद्यालय सीहोर) वैज्ञानिक को सोसायटी फोर सोयाबीन रिसर्च एंड डेवलपमेंट की ओर से सम्मानित किया गया।

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