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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

यूरिया संकट – हौवा या हवा ?

(विशेष प्रतिनिधि)

यूरिया एक ऐसा उर्वरक है जिसका देश में उत्पादन व आयात दोनों ही देश की मांग से कम है। ऐसे में केंद्र ने इसे अपने नियंत्रण में रखा है। केंद्र राज्यों की यूरीया मांग का आंकलन कर उन्हें माहवार यूरीया का आबंटन करता है। राज्य ने इस वर्ष रबी में केंद्र से 18 लाख मी.टन यूरीया की मांग की थी। परन्तु केंद्र ने 15 लाख 40 हजार मी.टन यूरिया म.प्र. के लिए स्वीकृत किया। केंद्र से यूरिया आबंटन के पश्चात् प्रदेश में उसके वितरण की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की होती है।

भोपाल। एक बार फिर म.प्र. में यूरीया संकट की हवा चल पड़ी हैं। किसान लाईन में भी लग रहा है, कहीं-कहीं पुलिस के डण्डे भी खा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रदेश के किसान ने भी रबी सीजन में यूरिया के लिये लाईन लगाना, डण्डे खाना, को अपनी नियति मान लिया है। सरकार चाहे किसी भी राजनैतिक पार्टी की हो, किसान की नियति में कोई बदलाव नहीं है। देश के अन्य राज्यों, चाहे वो राजस्थान हो, चाहे वो उ.प्र. हो, चाहे पंजाब या हरियाणा हो, में कहीं भी यूरिया की कमी नहीं होती। लेकिन म.प्र. का किसान हर बार इस कमी से जूझता है और यदि आने वाले दिनों में मावठे की बारिश हुई तो यूरीया संकट अवश्यंभावी है। इस वर्ष भी रबी सीजन में अक्टूबर से ही यूरीया की कमी अपना सर उठाने लगी थी। जब प्रदेश की मांग अक्टूबर में 4 लाख 50 हजार मी.टन यूरीया की थी, केवल 2 लाख 90 हजार मी.टन यूरीया ही तो मिल पाया। इससे उपजे संकट को भांपते हुए कृषक जगत ने अपने 4 नवम्बर 2019 के अंक में यूरिया संकट की आहट से सरकार को आगाह भी किया था। यहीं लगभग 1 लाख 60 हजार मी.टन का अंतर संभवत: यूरिया की कमी का कारण बन रहा है, क्योंकि नवम्बर में प्रदेश के लिये यूरीया आबंटन (ईसीए) में न तो केंद्र सरकार ने इस अंतर को पाटने की कोशिश की न ही राज्य सरकार केंद्र से अपने इस हक को ले पाई। इसके पीछे कारण चाहे राजनैतिक हो या प्रशासनिक हों, नतीजा तो प्रदेश का किसान भुगत रहा है।

सहकारिता पर पकड़ का हथियार –

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म.प्र. सरकार ने इस जिम्मेदारी को सहकारी क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने का माध्यम समझा क्योंकि सहकारी समितियों के लिए खाद का व्यापार लाभदायक धंधा है। अत: शासन ने पहले 100 प्रतिशत यूरीया सहकारी क्षेत्र के लिये आरक्षित किया फिर इसे बदल कर 60 से 70 प्रतिशत तक सहकारी क्षेत्र के लिये आरक्षित कर दिया।

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प्रायवेट व्यापार चौपट –

परिणामस्वरूप उर्वरक वितरण का दूसरा चैनल निजी क्षेत्र यूरिया के मामले में पंगु हो गया। जब वितरण के केंद्र कम हो जायेंगे तो अंतिम छोर पर उपलब्धता स्वभाविक रूप से प्रभावित होगी। करेला ऊपर से नीम चढ़ा की तर्ज पर ”शुद्ध के लिये युद्ध” अभियान प्रारम्भ कर दिया। नतीजा ये हुआ कि पीक सीजन में निजी विक्रेता दुकानें बंद कर घर बैठ गये। जब शासन को कृषि आदानों की उपलब्धता की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिये तब कृषि महकमे के पूरे अमले को युद्ध में झोंक दिया। जब प्रदेश में पर्याप्त आदान ही उपलब्ध नहीं है तो शुद्ध के लिये युद्ध कैसा? इस सबसे घबराये किसान ने यूरीया संकट की संभावना से आंक्रात होकर पूरे रबी सीजन का यूरीया एक मुश्त उठाना शुरू कर दिया और यूरीया संकट का हौवा खड़ा हो गया।

आंकड़ों की तस्वीर –
प्रदेश के कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार 1 अक्टूबर से 19 नवम्बर तक 6 लाख 75 हजार मी.टन यूरीया प्रदेश में आ चुका था। जिसमें से 4 लाख 32 हजार मी.टन यूरीया किसानों तक पंहुच चुका था। सहकारी क्षेत्र में 93 हजार मी.टन का तथा निजी क्षेत्र में 1 लाख 50 हजार मी.टन का स्टॉक था। फर्टिलाइजर मॉनिटरिंग सिस्टम की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नवम्बर माह के 4 लाख 50 हजार मी.टन के ईसीए का लगभग 80 प्रतिशत यूरीया माह अंत तक प्रदेश में पंहुच चुका है। इसके बाद भी यूरीया संकट का हौवा कहीं न कहीं राज्य शासन की असंगत उर्वरक वितरण व्यवस्था और बेसमय के अनावश्यक युद्ध पर सवालिया निशान तो लगाता ही है। अभी भी समय है जब शासन प्रशासन 30 नवम्बर को युद्ध विराम के बाद हर स्तर पर यूरीया उपलब्धता सुनिश्चित करने की कवायद में जुट जाये।