उत्तराखंड के इस गांव ने ‘अदरक की खेती’ से लिखी समृद्धि की कहानी, स्वदेशी तकनीक से किसान हर साल कमा रहे 8 करोड़ रुपए
31 जुलाई 2026, नई दिल्ली: उत्तराखंड के इस गांव ने ‘अदरक की खेती’ से लिखी समृद्धि की कहानी, स्वदेशी तकनीक से किसान हर साल कमा रहे 8 करोड़ रुपए – उत्तराखंड के देहरादून जिले के कालसी ब्लॉक स्थित डोमाट गांव ने पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय नवाचार के दम पर अदरक की खेती को ग्रामीण समृद्धि का मजबूत आधार बना दिया है। गांव के किसान ‘पंजोल’ और ‘सुखझोल’ नामक स्वदेशी प्रसंस्करण तकनीकों के जरिए अदरक का मूल्य संवर्धन कर उसे प्रीमियम गुणवत्ता वाले सूखे अदरक ‘गिल्टी’ में बदल रहे हैं। इन तकनीकों की बदौलत गांव के करीब 80 परिवार हर साल लगभग 8 करोड़ रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं।
अदरक बनी किसानों की नकदी फसल
हिमालय की तलहटी में बसे डोमाट गांव की जलवायु और उपजाऊ दोमट मिट्टी अदरक की खेती के लिए अनुकूल है। वर्षों से यहां के किसान अदरक की खेती करते आ रहे हैं। मसालों, औषधीय उत्पादों और कॉस्मेटिक उद्योग में इसकी बढ़ती मांग ने इसे गांव की सबसे लाभकारी नकदी फसलों में शामिल कर दिया है।
अदरक केवल किसानों की आय का जरिया ही नहीं है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, जल संरक्षण और भूमि कटाव रोकने में भी मददगार साबित हो रही है। स्थानीय स्तर पर इसका उपयोग सर्दी-जुकाम, मतली और सूजन जैसी समस्याओं के उपचार में भी किया जाता है।
‘पंजोल’ और ‘सुखझोल’ तकनीक से बढ़ा अदरक का मूल्य
डोमाट गांव के किसानों ने अदरक प्रसंस्करण की दो पारंपरिक तकनीकों ‘पंजोल’ और ‘सुखझोल’ को आज भी जीवित रखा है। इन तरीकों से तैयार सूखे अदरक को स्थानीय भाषा में ‘गिल्टी’ कहा जाता है, जिसकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है।
प्रसंस्करण की शुरुआत अदरक की सावधानीपूर्वक खुदाई, सफाई, ग्रेडिंग और धुलाई से होती है। किसान केवल स्वस्थ और पूरी तरह परिपक्व गांठों का चयन करते हैं, जिससे अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता बनी रहे।
‘सुखझोल’ तकनीक से बचती है मजदूरी
गांव के किसान ‘सुखझोल’ तकनीक को अधिक प्रभावी मानते हैं क्योंकि इसमें अदरक को सुखाने से पहले छिलका उतारने की आवश्यकता नहीं होती। धुलाई और ग्रेडिंग के बाद अदरक को पहले छाया में और फिर धूप में आंशिक रूप से सुखाया जाता है। इसके बाद गांव के किसानों द्वारा स्वयं विकसित रोटरी ड्राइंग मशीन में इसे सुखाया जाता है।
यह मशीन मैनुअल और 2 हॉर्स पावर मोटर दोनों विकल्पों में उपलब्ध है तथा एक घंटे में लगभग एक क्विंटल अदरक सुखाने की क्षमता रखती है। मशीन में घूमने के दौरान निकलने वाला छिलका भी बेकार नहीं जाता, बल्कि उसका उपयोग अदरक मसाला पाउडर बनाने में किया जाता है।
‘पंजोल’ तकनीक में हाथ से उतारा जाता है छिलका
‘पंजोल’ तकनीक में धुलाई, छंटाई और ग्रेडिंग की प्रक्रिया समान रहती है, लेकिन इसमें सुखाने से पहले अदरक का छिलका हाथ से सावधानीपूर्वक उतारा जाता है। यह कार्य गांव की अनुभवी महिलाएं करती हैं, जिससे अदरक के आवश्यक तेल और औषधीय गुण सुरक्षित रहते हैं। इसके बाद अदरक को रोटरी ड्रायर और फिर धूप में सुखाकर उच्च गुणवत्ता वाला उत्पाद तैयार किया जाता है।
80 परिवारों की आय का बना मुख्य आधार
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, गांव के लगभग 100 परिवारों में से 80 परिवार अदरक की खेती और उसके प्रसंस्करण को अपनी मुख्य आय का स्रोत बना चुके हैं। गांव में हर साल लगभग 25 हजार किलोग्राम सूखे अदरक का उत्पादन होता है। इसमें सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली ‘गिल्टी’ की कीमत 3,000 से 5,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिलती है, जबकि दूसरी और तीसरी श्रेणी के उत्पाद 1,500 से 2,000 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर आसपास की मंडियों में बिकते हैं।
हर साल करीब 8 करोड़ रुपये का कारोबार
‘पंजोल’ और ‘सुखझोल’ तकनीकों के जरिए तैयार किए गए सूखे अदरक की बिक्री से डोमाट गांव के किसान सामूहिक रूप से हर साल करीब 8 करोड़ रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। इससे न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि गांव की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई पहचान मिली है।
एफपीओ बनने से मिल सकते हैं और बड़े अवसर
यदि गांव में किसान उत्पादक संगठन (FPO) या सहकारी समिति का गठन किया जाए, तो किसान वैज्ञानिक तरीके से भंडारण, ब्रांडिंग और सामूहिक विपणन कर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बना सकते हैं। इससे किसानों की आय बढ़ने के साथ-साथ प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और विपणन के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
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