क्या अब ‘उग्र आंदोलन’ से ही होगी मांगे पूरी ?
लेखक: मधुकर पवार
31 जुलाई 2026, नई दिल्ली: क्या अब ‘उग्र आंदोलन’ से ही होगी मांगे पूरी ? – हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर युवाओं का आंदोलन, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता के विरोध में पंजाब के किसानों का दिल्ली कूच और मध्यप्रदेश में खाद वितरण, मूंग की सरकारी खरीदी और अन्य मांगों को लेकर किसान आंदोलन हुए । इनके पहले भी आंदोलन होते रहे हैं ।
अब ऐसा महसूस हो रहा है कि सरकारों के कान तब तक नहीं खुलते, जब तक सड़कों पर भीड़ न उतर आए, आंदोलन उग्र न हो जाए, राजनीतिक दबाव न बढ़ जाए और मीडिया की सुर्खियाँ सरकार का पीछा न करने लगें। ज्ञापन, निवेदन, प्रतिनिधिमंडल, शांतिपूर्ण धरना और संवाद, ये सब जैसे औपचारिकताएँ बनकर रह गए हैं। वास्तविक निर्णय तब होता है, जब सत्ता को राजनीतिक नुकसान का भय दिखाई देने लगता है। इससे एक खतरनाक राजनीतिक संस्कृति जन्म ले रही है, जिसमें जनता के बीच यह विश्वास बनता जा रहा है कि शांतिपूर्ण नागरिक की अपेक्षा आक्रोशित नागरिक की आवाज़ अधिक प्रभावी होती हैं तथ सरकारें भी उनकी ही सुनती हैं। प्रश्न यह नहीं है कि सरकारें मांगें क्यों मानती हैं। प्रश्न यह है कि वे मांगों को तब तक क्यों टालती हैं, जब तक परिस्थितियाँ विस्फोटक न हो जाएँ? यदि समाधान अंततः देना ही था, तो उसे पहले क्यों नहीं दिया गया? क्या लोकतंत्र में संवाद की जगह अब टकराव ने ले ली है? यह प्रवृत्ति केवल किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं है। सत्ता बदलती रही है, लेकिन शासन की कार्यशैली में यह मनोविज्ञान लगभग स्थायी हो गया है। विपक्ष में रहते हुए हर आंदोलन लोकतंत्र की आवाज़ लगता है और सत्ता में आते ही वही आंदोलन व्यवस्था के लिए चुनौती दिखाई देने लगता है।
यही भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है। किसी भी आंदोलन के संदर्भ में सभी सरकारों की रणनीति भी यह रहती है कि पहले आंदोलन को नज़रअंदाज़ करो। फिर उसके जनसमर्थन का आकलन करो। उसके बाद उसे राजनीतिक रंग देकर उसकी वैधता पर प्रश्न उठाओ। यदि इसके बाद भी आंदोलन जारी रहे और राजनीतिक नुकसान की आशंका बढ़े, तब वार्ता की मेज़ सजाओ और समाधान की घोषणा कर दो। प्रश्न यह है कि यदि अंतिम चरण में संवाद ही करना है, तो पहला चरण संवाद का क्यों नहीं होता? सरकारें अक्सर यह मानकर चलती हैं कि अधिकांश आंदोलन समय के साथ स्वतः कमजोर पड़ जाएंगे। कुछ लोग थक जाएंगे, कुछ आर्थिक कारणों से लौट जाएंगे, मीडिया का ध्यान किसी नए विषय पर चला जाएगा और मामला धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। यह राजनीतिक गणित कई बार सफल भी हो जाता है। लेकिन जब यही गणित गलत साबित होता है, तब सरकारों को वही निर्णय लेने पड़ते हैं जिन्हें पहले टाला गया था। इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी कीमत जनता को च्कानी पड़ती है ।
भोपाल में किसानों का मूंग खरीदी को लेकर आंदोलन इसका ताज़ा उदाहरण है। आंदोलन के बाद आश्वासन मिला और आंदोलन समाप्त हो गया। लेकिन इसके समानांतर केंद्र सरकार का पत्र एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। केंद्र ने स्पष्ट किया कि ग्रीष्मकालीन मौसम 2025-26 के लिए मध्य प्रदेश को मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के अंतर्गत 4,54,580 मीट्रिक टन मूंग खरीदी की स्वीकृति पहले ही दी जा चुकी थी। यह पूरे देश में स्वीकृत कुल 5,23,243 मीट्रिक टन का लगभग 87 प्रतिशत है। केंद्र का यह भी कहना है कि राज्यों को खरीदी का कोई “लक्ष्य” नहीं दिया जाता, बल्कि पीएम-आशा योजना के प्रावधानों के अनुसार प्रारंभिक स्वीकृति प्रदान की जाती है। 29 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार राज्य में केवल लगभग 60 हजार मीट्रिक टन मूंग की खरीदी हुई थी और केंद्र ने राज्य सरकार से खरीदी तेज़ करने का आग्रह किया। यदि यह तथ्य सही हैं, तो प्रश्न केवल इतना नहीं रह जाता कि किसान आंदोलन क्यों हुआ। बड़ा प्रश्न यह है कि किसानों तक सही जानकारी समय पर क्यों नहीं पहुँची? यदि पर्याप्त स्वीकृति उपलब्ध थी, तो खरीदी की गति धीमी क्यों रही? यदि कोई प्रशासनिक बाधा थी, तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं किया गया? और यदि राज्य का पक्ष अलग है, तो दोनों सरकारों ने संयुक्त रूप से भ्रम दूर करने का प्रयास क्यों नहीं किया? लोकतंत्र में सूचना का अभाव अक्सर असंतोष का सबसे बड़ा कारण बनता है।
इसी तरह मध्यप्रदेश में किसानो6 को खाद प्रदान करने के लिए ई-टोकन प्रणाली शुरू की गई जिससे किसानों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है । खाद वितरण की नई व्यवस्था से किसानों को हो रही परेशानी से सरकार वाकिफ है लेकिन समय रहते इसमे सुधार की कोई कोशिश नहीं की गई । जब किसान आंदोलन शुरू हुआ तब सरकार ने ई-टोकन प्रणाली को स्थगित किया । यदि सरकार इस दिशा में पहले ही कोई सकारात्मक निर्णय ले लेती तो किसानों को राहत मिलती और सरकार की भी फजीहत नहीं होती । सरकारों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में धैर्य की भी एक सीमा होती है। यदि संवाद की जगह मौन ले ले, यदि पारदर्शिता की जगह राजनीतिक बयानबाज़ी आ जाए और निर्णय केवल दबाव के बाद हों, तो जनता का विश्वास कमजोर होता है। सबसे बड़ा खतरा यही है कि समाज में यह संदेश स्थापित हो जाए कि शांतिपूर्ण संवाद से नहीं, बल्कि सड़क पर शक्ति प्रदर्शन से समाधान मिलता है।
यह लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं है। जब सरकारें आंदोलनों के शुरुआती दौर में चेतावनियों की उपेक्षा करती है, तो आंदोलनकारी भी यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जब तक दबाव नहीं बनेगा, तब तक निर्णय नहीं होगा। परिणामस्वरूप आंदोलन की भाषा और स्वर बदल जाते हैं और कभी-कभी उसका चरित्र भी बदल जाता है। इसकी जिम्मेदारी केवल आंदोलनकारियों पर नहीं डाली जा सकती; शासन की प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। लोकतंत्र में सरकार की असली ताकत विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि विरोध को सुनने में होती है। एक परिपक्व सरकार वही है जो भीड़ इकट्ठी होने से पहले जनता की बात सुन ले, न कि तब जब हालात राजनीतिक संकट का रूप में तब्दील न हो जाए। यदि सरकारें संवाद को प्राथमिकता दें, पारदर्शिता बनाए रखें और समय पर निर्णय लें, तो सड़क और सत्ता के बीच टकराव की दूरी स्वतः कम हो जाएगी। यदि निर्णय का पैमाना केवल राजनीतिक दबाव रहेगा, तो आम जनता में यह संदेश जाएगा कि लोकतंत्र में अब शांतिपूर्ण आंदोलन नहीं, बल्कि उग्र आंदोलन ही सबसे प्रभावी माध्यम बन चुके हैं। हो सकता है अब भविष्य में होने वाले आंदोलनों में और हिंसक प्रदर्शन देखने क़ो मिले इसलिए सरकारों को हर परिस्थिति में संवाद के जरिये ही समाधान खोजना चाहिए और यही तरीका लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने में सहायक सिद्ध होगा ।
- आंदोलनों की बढ़ती तीव्रता और लोकतंत्र की चुनौत
- संवाद नहीं, दबाव के बाद निर्णय की प्रवृत्ति
- सत्ता और विपक्ष का बदलता राजनीतिक दृष्टिकोण
- आंदोलनों के प्रति सरकारों की पारंपरिक रणनीति
- टालमटोल की राजनीति और जनता की कीमत
- मूंग खरीदी विवाद: तथ्य, भ्रम और प्रशासनिक प्रश्न
- सूचना के अभाव से बढ़ता असंतोष
- ई-टोकन व्यवस्था: समय पर सुधार क्यों नहीं?
- संवादहीनता से कमजोर होता जनविश्वास
- दबाव की राजनीति और आंदोलनों का बदलता स्वरूप
- लोकतंत्र की मजबूती का आधार: समय पर संवाद और समाधान
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