एल नीनो का संकट: सरकार, कृषि वैज्ञानिक और किसानों की परीक्षा
लेखक: मधुकर पवार
10 जुलाई 2026, नई दिल्ली: एल नीनो का संकट: सरकार, कृषि वैज्ञानिक और किसानों की परीक्षा – एल नीनो के संभावित प्रभाव के कारण इस वर्ष मानसून की अनिश्चितता ने एक बार फिर भारतीय कृषि के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। भारत की लगभग आधी खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है, इसलिए मानसून में थोड़ी-सी भी कमी सीधे किसानों की आय, खाद्यान्न उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। हालांकि चुनौती बड़ी है, लेकिन इस बार सकारात्मक पक्ष यह है कि वैज्ञानिक संस्थान और केंद्र सरकार दोनों समय रहते सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।
यदि इन प्रयासों को खेत स्तर तक प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो कम वर्षा की स्थिति को भी बड़े संकट में बदलने से रोका जा सकता है। वर्षा के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जून महीने में देश में वर्षा सामान्य से 33 प्रतिशत कम रही थी। जुलाई के प्रारंभिक दिनों में वर्षा में सुधार के बाद यह कमी घटकर 24 प्रतिशत रह गई है। इसी प्रकार कम वर्षा वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर 178 रह गई है। यह सुधार उत्साहवर्धक अवश्य है, लेकिन अभी भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं कही जा सकती। विशेषकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में विशेष सतर्कता की आवश्यकता बनी हुई है।
मानसून की देरी का सीधा असर खरीफ की बुवाई पर दिखाई दे रहा है। अभी तक देश में 350.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 91.95 लाख हेक्टेयर कम है। सबसे अधिक प्रभाव सोयाबीन और कपास जैसी फसलों पर पड़ा है। ऐसे समय में कृषि विशेषज्ञों द्वारा मक्का, बाजरा, मूंग तथा अन्य कम अवधि और कम पानी वाली फसलों की सलाह व्यावहारिक और समयानुकूल मानी जानी चाहिए। इस संकट के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कृषि वैज्ञानिक केवल समस्या का वर्णन नहीं कर रहे, बल्कि उसका व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि वर्षा सामान्य से कम रहे तो किसान इसे संकट के बजाय अवसर में बदल सकते हैं। इसके लिए कोदो, कुटकी, रागी और सांवा जैसे मोटे अनाज सबसे उपयुक्त विकल्प हैं।
इन फसलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है, देर से बुवाई होने पर भी संतोषजनक उत्पादन मिल जाता है तथा बीज की मात्रा कम होने से लागत भी घटती है। सूखा, सीमित संसाधन और जलवायु परिवर्तन जैसी परिस्थितियों में भी ये फसलें अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करती हैं। आज विश्व स्तर पर इन्हें “सुपर फूड” और “सुपर ग्रेन” के रूप में पहचान मिल रही है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण इनकी बाजार मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना भी मजबूत हुई है। बदलते जलवायु परिदृश्य में मोटे अनाज केवल वैकल्पिक फसल नहीं, बल्कि कृषि सुरक्षा का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। प्रत्येक किसान के पास अपनी आकस्मिक कृषि कार्ययोजना (कॉन्टिन्जेंसी प्लान) पहले से तैयार होनी चाहिए। खेती अब केवल पारंपरिक अनुभव से नहीं, बल्कि मौसम आधारित वैज्ञानिक निर्णयों से संचालित होगी। कौन-सी फसल कब बोनी है, वर्षा कम होने पर विकल्प क्या होगा और सीमित जल में उत्पादन कैसे सुरक्षित रखा जाए, इन सभी प्रश्नों का उत्तर पहले से तैयार रहना चाहिए। सकारात्मक पक्ष यह भी है कि केंद्र सरकार ने इस वर्ष संभावित परिस्थितियों को देखते हुए अप्रैल से ही तैयारी प्रारंभ कर दी थी।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के सहयोग से संभावित प्रभावित जिलों के लिए आकस्मिक कार्ययोजनाएं तैयार कर राज्यों को उपलब्ध कराई गई हैं। जून में चलाए गए “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत 1.24 लाख से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए तथा 80 लाख से अधिक किसानों तक सीधे पहुंच बनाई गई। बीज उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए लगभग 1.75 लाख क्विंटल राष्ट्रीय बीज भंडार तैयार रखा गया है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर किसानों को वैकल्पिक बीज तत्काल उपलब्ध कराए जा सकें। किसान क्रेडिट कार्ड अभियान के अंतर्गत 30 जून तक प्राप्त 1.14 लाख आवेदनों में से 94 हजार से अधिक स्वीकृत किए जा चुके हैं। साथ ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत अधिकाधिक किसानों को जोड़ने का प्रयास जारी है, जिससे प्राकृतिक आपदा की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। प्रशासनिक स्तर पर भी निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया गया है।
एल -नीनो मॉनिटरिंग सेल, क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप, राज्य स्तरीय नियंत्रण कक्ष तथा नियुक्त अधिकारी लगातार मानसून, बुवाई, फसल और बाजार की स्थिति पर नजर रख रहे हैं। यदि यह व्यवस्था समय पर निर्णय लेने और किसानों तक त्वरित सलाह पहुंचाने में सफल रहती है तो संभावित नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। कृषि विस्तार तंत्र को गांव-गांव तक सक्रिय करना होगा। प्रत्येक विकासखंड में किसानों को मौसम आधारित सलाह, वैकल्पिक फसल चयन, जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई तथा मोटे अनाजों की उन्नत खेती करने के लिए प्रेरित करना होगा। कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और स्थानीय वैज्ञानिकों की भूमिका इस समय सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। ऐसे में भारतीय कृषि को भी पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर जलवायु-अनुकूल खेती की ओर तेजी से कदम बढ़ाने होंगे। मोटे अनाजों का पुनरुत्थान, वैज्ञानिक सलाह का पालन, समय पर सरकारी सहायता और किसानों की जागरूकता इन्हीं चार स्तंभों पर कृषि का सुरक्षित भविष्य निर्भर करेगा। अल नीनो की चुनौती हमें यह संदेश देती है कि खेती का भविष्य केवल अच्छी बारिश पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच, समय पर तैयारी और परिस्थितियों के अनुरूप फसल चयन पर आधारित होगा। यदि किसान, वैज्ञानिक और शासन मिलकर इसी दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो कम वर्षा भी भारतीय कृषि की प्रगति को रोक नहीं सकेगी, बल्कि आत्मनिर्भर और जलवायु-सक्षम कृषि व्यवस्था की नींव मजबूत करेगी।
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