भारत के 30% कपास क्षेत्र में अवैध HTBt कपास की खेती: अध्ययन
प्रयोगशाला जांच में 98.2% नमूनों में आनुवंशिक रूप से संशोधित गुण पाए गए; 41.9% नमूनों में चार जीन का संयोजन मिला, जिसमें भारत में गैर-अनुमोदित Vip3A भी शामिल
14 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: भारत के 30% कपास क्षेत्र में अवैध HTBt कपास की खेती: अध्ययन – भारत में खरीफ सीजन 2025-26 के दौरान अनुमानित 65 से 72 लाख एकड़ क्षेत्र में अनधिकृत हर्बिसाइड-टॉलरेंट बीटी (HTBt) कपास की खेती की गई। यह देश के कुल कपास क्षेत्र का लगभग 24–30% है और इससे अनुमानित 1,500 करोड़ रुपये का अनौपचारिक बीज बाजार संचालित हो रहा है। एक नए क्षेत्रीय अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है।
Unauthorised Cultivation of HTBt Cotton in India: Extent, Drivers & Implications शीर्षक वाला यह अध्ययन दक्षिण एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर (SABC) ने फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NSAI) के सहयोग से किया।
अध्ययन के तहत प्रयोगशाला में जांचे गए 98.2% खेतों के नमूनों में कम से कम एक आनुवंशिक रूप से संशोधित गुण पाया गया। वहीं, 41.9% नमूनों में चार जीन का संयोजन मिला, जिसमें Vip3A भी शामिल था। Vip3A कीट प्रतिरोध से संबंधित जीन है, जिसे भारत में खेती के लिए मंजूरी नहीं दी गई है।
इस अध्ययन में महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के 16 जिलों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने किसान सर्वेक्षण, बीज आपूर्ति श्रृंखला के आकलन और आनुवंशिक गुणों की पहचान के लिए ELISA-आधारित परीक्षणों का इस्तेमाल किया।

मजदूरों की कमी से बढ़ रहा है अनधिकृत HTBt कपास का चलन
अध्ययन के अनुसार, मजदूरों की कमी और हाथों से खरपतवार नियंत्रण की बढ़ती लागत किसानों को अनधिकृत HTBt कपास की ओर ले जाने वाले प्रमुख कारण हैं। ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल से खरपतवार नियंत्रण पर प्रति एकड़ लगभग 750–850 रुपये खर्च होते हैं, जबकि हाथों से निराई-गुड़ाई कराने की लागत 12,000–15,000 रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच सकती है।
अध्ययन में बताया गया कि ग्लाइफोसेट की खपत भी एक वर्ष में 26% बढ़ी। इसका उपयोग 2024-25 के 27,721 किलोलीटर से बढ़कर 2025-26 में 35,642 किलोलीटर हो गया। रिपोर्ट के अनुसार, इसकी एक बड़ी मात्रा अब अनौपचारिक आपूर्ति नेटवर्क के माध्यम से बेची जा रही है, जिसमें 20 लीटर के ड्रम भी शामिल हैं।
इस बीच, वर्ष 2022 से 2026 के बीच कानूनी रूप से बेचे जाने वाले Bollgard-II कपास बीजों की बिक्री में 22.3% की गिरावट दर्ज की गई।
ये निष्कर्ष बताते हैं कि किसान उत्पादन लागत कम करने और खेतों में कामकाज से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए तेजी से अनधिकृत बीज बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, किसान खरपतवार प्रबंधन को किफायती बनाने के उद्देश्य से ऐसे बीजों के लिए अनौपचारिक बाजार में अतिरिक्त टेक्नोलॉजी फीस भी चुका रहे हैं।
इंडियन सोसाइटी फॉर कॉटन इम्प्रूवमेंट के अध्यक्ष और साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के अध्यक्ष डॉ. सी.डी. मये ने कहा, “अनुमोदन के बिना जीनों का अनियंत्रित इस्तेमाल और ग्लाइफोसेट का बिना निगरानी प्रयोग प्रतिरोधी कीटों और खरपतवारों को जन्म दे सकता है, जिससे कपास की उत्पादकता को भारी नुकसान पहुंच सकता है।”
उन्होंने जोर दिया कि कृषि तकनीक का प्रभावी प्रबंधन और निगरानी तभी संभव है, जब संबंधित तकनीक को कानूनी मंजूरी प्राप्त हो।
उद्योग ने नियामकीय सुधारों की मांग की
FSII के अध्यक्ष अजय राणा ने कहा कि अनधिकृत खेती का बढ़ता दायरा किसानों की जरूरतों और औपचारिक माध्यमों से उपलब्ध तकनीकों के बीच अंतर को दर्शाता है।
राणा ने कहा, “किसान अपनी पसंद से कानून नहीं तोड़ रहे हैं। वे काला बाजार में अतिरिक्त कीमत इसलिए चुका रहे हैं, क्योंकि नियामकीय व्यवस्था उन्हें आवश्यक तकनीक उपलब्ध नहीं करा पाई है। जब एक चौथाई फसल गैर-अनुमोदित बीजों पर निर्भर हो, तो यह किसान की नहीं, बल्कि नियमन व्यवस्था की विफलता है।”
उन्होंने कपास की उत्पादकता में गिरावट को भारत की बदलती स्थिति से भी जोड़ा और कहा कि घरेलू उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए देश को अपनी कपास उत्पादन क्षमता में सुधार करना होगा।
राणा ने कहा, “कपास उत्पादन में आत्मनिर्भरता दोबारा हासिल करने और कपास अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए हर्बिसाइड-टॉलरेंट कपास और पिंक बॉलवर्म प्रतिरोधी गुण को नियामकीय मंजूरी देना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।”
अध्ययन के निष्कर्षों और सिफारिशों पर चर्चा में केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (CICR) के पूर्व निदेशक डॉ. वाई.जी. प्रसाद, FSII के महानिदेशक डॉ. परेश वर्मा, नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया के डॉ. बी.बी. पटनायक और रासी सीड्स के प्रबंध निदेशक राजेंद्रन रामासामी भी शामिल थे।
महाराष्ट्र में अनधिकृत HTBt कपास की खेती सबसे अधिक
अध्ययन के अनुसार, महाराष्ट्र अनधिकृत HTBt कपास की खेती का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। राज्य में इसका प्रसार 58% आंका गया, जबकि यवतमाल में यह आंकड़ा 76% तक पहुंच गया।
तेलंगाना में अनधिकृत खेती का स्तर 66% रहा। राज्य के महबूबाबाद में यह 82% दर्ज किया गया। आंध्र प्रदेश में इसका प्रसार 49% रहा, जबकि कुर्नूल में यह आंकड़ा 75% तक पहुंच गया।
राजस्थान में HTBt कपास का इस्तेमाल नगण्य पाया गया। हालांकि, अध्ययन में पिंक बॉलवर्म के प्रकोप से निपटने के लिए अनधिकृत BG-III बीजों की बढ़ती मांग का उल्लेख किया गया है।
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि कपास उत्पादक क्षेत्रों में खरपतवार नियंत्रण की लागत, मजदूरों की उपलब्धता और कीटों का दबाव किसानों के बीज चयन को प्रभावित कर रहे हैं।
जैव सुरक्षा, प्रतिरोध और बीज गुणवत्ता को लेकर चिंताएं
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अनधिकृत खेती का प्रभाव केवल नियामकीय नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं है। गैर-अनुमोदित आनुवंशिक गुणों वाले बीजों के इस्तेमाल से जैव सुरक्षा संबंधी अनिश्चितताएं बढ़ सकती हैं। वहीं, ग्लाइफोसेट के अत्यधिक या बिना निगरानी इस्तेमाल से खरपतवारों में शाकनाशी प्रतिरोध विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है।
अध्ययन में अनौपचारिक बाजारों से खरीदे गए बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और किसानों की शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्था के अभाव को भी प्रमुख चिंता बताया गया है। ऐसे बीज औपचारिक नियामकीय व्यवस्था से बाहर होने के कारण, बीज के अपेक्षित परिणाम नहीं देने पर किसानों के पास शिकायत निवारण के सीमित विकल्प रह जाते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अनधिकृत बीज बाजार के विस्तार को रोकने और किसानों की जरूरतों के अनुरूप तकनीक उपलब्ध कराने के लिए समयबद्ध नीतिगत कदम उठाने की आवश्यकता है।
अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, अनधिकृत HTBt कपास की खेती से निपटने के लिए नियामकीय मंजूरी, खरपतवार प्रबंधन, बीज बाजार की निगरानी और तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल पर समन्वित कार्रवाई आवश्यक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि समय पर नीतिगत निर्णय भारत के कपास क्षेत्र की उत्पादकता और दीर्घकालिक स्थिरता को बनाए रखने के साथ-साथ जैव सुरक्षा संबंधी जोखिमों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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