पराली जलाने पर रोक में प्रशासन नाकाम? केंद्र ने राज्यों को युद्धस्तर पर कार्रवाई के निर्देश दिए
मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़ीं घटनाएं,-मशीनें, करोड़ों का बजट और निगरानी तंत्र के बावजूद खेतों में क्यों जल रही पराली?
14 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: पराली जलाने पर रोक में प्रशासन नाकाम? केंद्र ने राज्यों को युद्धस्तर पर कार्रवाई के निर्देश दिए – पराली जलाने की घटनाएं रोकने के लिए हर साल योजनाएं बनती हैं, मशीनें बांटी जाती हैं और करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद खेतों में पराली जलने की घटनाएं जारी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्रशासनिक तंत्र इन पर प्रभावी रोक लगाने में सफल क्यों नहीं हो पा रहा है?
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 13 अक्टूबर को नई दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय बैठक में राज्यों को पराली प्रबंधन के लिए युद्धस्तर पर काम करने के निर्देश दिए। मंत्रियों ने जिला कलेक्टरों को मैदान में उतरकर निगरानी करने और गांव स्तर पर ठोस कार्ययोजना बनाने को कहा।
मध्य प्रदेश में बढ़ीं घटनाएं
बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच पिछले वर्ष की तुलना में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं 53.3 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में करीब 32 प्रतिशत घटीं। इसके विपरीत मध्य प्रदेश और राजस्थान में घटनाओं में वृद्धि पर चिंता जताई गई। हालांकि, इन दोनों राज्यों में वृद्धि के विस्तृत आंकड़े जारी विवरण में नहीं दिए गए।
3.54 लाख मशीनें, फिर भी किसानों के सामने समस्या
केंद्र के अनुसार, राज्यों को अब तक 3.54 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं। पिछले 8 वर्षों में पराली प्रबंधन योजना के तहत 4200 करोड़ रुपये भी जारी किए गए। इसके बावजूद मशीनों की उपलब्धता, पुरानी मशीनों की मरम्मत और छोटे किसानों को रियायती दर पर सेवाएं मिलने की स्थिति पर सवाल बने हुए हैं।
शिवराज सिंह चौहान ने निर्देश दिए कि बंद पड़ी मशीनों को तत्काल चालू किया जाए और कस्टम हायरिंग सेंटरों से छोटे किसानों को सस्ती दरों पर मशीनें उपलब्ध कराई जाएं। उन्होंने कहा कि मशीनें केवल कागजों में नहीं, खेतों में चलनी चाहिए।
क्या जवाबदेही तय होगी ?
पराली प्रबंधन के लिए केंद्र से वित्तीय सहायता और मशीनें उपलब्ध कराने के बावजूद घटनाओं में वृद्धि प्रशासनिक निगरानी और योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करती है। क्या जिला प्रशासन ने गांव स्तर पर समय रहते तैयारी की? क्या मशीनें जरूरत के समय किसानों को मिलीं? और क्या पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई?
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी स्पष्ट किया कि निगरानी केवल उपग्रह आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहनी चाहिए। दोपहर 3 बजे के बाद उपग्रह निगरानी में अंतराल के दौरान जमीनी गश्त और विशेष दलों से निगरानी करने के निर्देश दिए गए।
समाधान केवल रोक लगाने में नहीं
कृषि मंत्री ने पराली को जैविक खाद, पशु चारा, बिजली, बायो-सीएनजी और बायो-इथेनॉल उत्पादन से जोड़ने पर जोर दिया। इसके लिए किसानों को सस्ते विकल्प और उद्योगों तक सीधी आपूर्ति व्यवस्था उपलब्ध करानी होगी।
अब असली परीक्षा राज्यों और जिला प्रशासन की है। पराली जलाने पर रोक के निर्देश तभी प्रभावी होंगे, जब मशीनें समय पर उपलब्ध हों, किसानों को व्यावहारिक विकल्प मिलें और प्रशासनिक जवाबदेही जमीन पर दिखाई दे।
किसानों के लिए चेतावनी: पराली न जलाएं, नुकसान से बचेंराली जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति और लाभकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित होते हैं।
नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई और आर्थिक दंड का जोखिम है।
· अगली फसल की बुवाई के लिए सुपर सीडर, हैप्पी सीडर और मल्चर जैसी मशीनों का उपयोग करें।
· मशीनें उपलब्ध न हों तो कृषि विभाग, सहकारी समिति या कस्टम हायरिंग सेंटर से संपर्क करें।
· पराली को खाद, पशु चारे या औद्योगिक उपयोग से जोड़कर अतिरिक्त आय की संभावना तलाशें।
पराली जलाने से तत्काल खेत खाली हो सकता है, लेकिन इसका नुकसान मिट्टी, पर्यावरण और खेती को उठाना पड़ सकता है।
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