राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

कम वर्षा की आशंका और किसान

03 जुलाई 2026, नई दिल्ली: कम वर्षा की आशंका और किसान – वर्षा ऋतु शुरू हो चुकी है, लेकिन इस बार बारिश के साथ चिंताएं भी आई हैं। मौसम वैज्ञानिकों ने अल नीनो प्रभाव के कारण सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका व्यक्त की है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो इसका सबसे अधिक प्रभाव देश के किसानों पर पड़ेगा। कृषि प्रधान भारत की अर्थव्यवस्था आज भी मानसून पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में कम वर्षा केवल खरीफ फसलों की उत्पादकता को प्रभावित नहीं करेगी, बल्कि रबी के मौसम की खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दूरगामी प्रभाव डालेगी।

भारत में कुल कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा आज भी वर्षा पर आधारित है। खरीफ की प्रमुख फसलें जैसे सोयाबीन, धान, मक्का, कपास और दलहन सीधे मानसून पर निर्भर करती हैं। यदि वर्षा सामान्य से कम होती है तो बीज अंकुरण से लेकर फसलों की वृद्धि और उत्पादन तक हर चरण प्रभावित होगा। इससे उत्पादन घटेगा, किसानों की आय कम होगी और बाजार में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। विशेष रूप से मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, बुंदेलखंड और दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्रों में किसानों की चिंता पहले से ही बढ़ने लगी है।

स्थिति की गंभीरता केवल खरीफ तक सीमित नहीं है। कम वर्षा होने से तालाब, बांध, जलाशय आदि पर्याप्त रूप से नहीं भर पाएंगे। परिणामस्वरूप रबी फसलों के लिए आवश्यक सिंचाई जल उपलब्ध नहीं होगा। गेहूं, चना, सरसों और अन्य रबी फसलों का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। अर्थात कमजोर मानसून का असर कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका रहती है। इस चुनौती को और गंभीर बनाता है भूजल स्तर का लगातार गिरना। देश के अनेक क्षेत्रों में भूजल दोहन पुनर्भरण (रिचार्ज) की तुलना में कहीं अधिक हो रहा है।

पहले जहां 40 से 50 फीट की गहराई पर पानी उपलब्ध हो जाता था, वहीं अब कई क्षेत्रों में 1000 फीट से अधिक गहराई तक बोरिंग करनी पड़ रही है। भूजल स्तर में साल-दर-साल गिरावट दर्ज की जा रही है। बड़े किसान तो महंगे ट्यूबवेल और मोटर लगाकर पानी निकाल लेते हैं, लेकिन छोटे और सीमांत किसान इस प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट जाते हैं। जल संकट धीरे-धीरे सामाजिक और आर्थिक असमानता का कारण भी बनता जा रहा है। विडंबना यह है कि एक ओर देश के कई हिस्से हर वर्ष बाढ़ का सामना करते हैं, वहीं कुछ ही महीनों बाद वे ही क्षेत्र जल संकट से जूझने लगते हैं।

इसका मूल कारण वर्षा जल का समुचित संग्रहण और संरक्षण न होना है। प्रतिवर्ष करोड़ों लीटर पानी नदियों के माध्यम से बहकर समुद्र में चला जाता है, जबकि उसका एक बड़ा हिस्सा भूजल पुनर्भरण के लिए उपयोग किया जा सकता है। आज आवश्यकता केवल सरकारी योजनाओं की नहीं, बल्कि व्यापक जनभागीदारी की है। जल संरक्षण को जन आंदोलन का स्वरूप देना होगा। प्रत्येक गांव में तालाबों का निर्माण और पुनर्जीवन, खेत तालाब, चेक डैम, स्टॉप डैम तथा जलसंचय संरचनाओं का विकास प्राथमिकता होना चाहिए। शहरी क्षेत्रों में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग को कड़ाई से लागू करना होगा। सरकारी भवनों, स्कूलों, अस्पतालों, उद्योगों और आवासीय परिसरों में वर्षा जल संग्रहण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। कृषि क्षेत्र में भी जल प्रबंधन की नई सोच विकसित करनी होगी। अधिक पानी वाली फसलों के स्थान पर कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलों को प्रोत्साहित करना समय की मांग है।

ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को व्यापक स्तर पर अपनाना होगा। कृषि वैज्ञानिकों को भी ऐसी किस्मों के विकास पर ध्यान देना चाहिए जो कम पानी में अधिक उत्पादन दे सकें और बदलती जलवायु परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठा सकें। जलवायु परिवर्तन के दौर में मानसून की अनिश्चितता भविष्य में और बढ़ सकती है। इसलिए केवल इस वर्ष के मानसून की चिंता पर्याप्त नहीं है। हमें दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी, जिसमें जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को केंद्र में रखा जाए। यह समझना होगा कि जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि कृषि, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता का आधार है। कम वर्षा की आशंका किसानों के लिए निश्चित रूप से चिंता का विषय है, लेकिन इसे चेतावनी के रूप में भी देखना होगा। यदि सरकार, समाज और किसान मिलकर वर्षा जल की प्रत्येक बूंद को सहेजने का संकल्प लें, तो जल संकट की चुनौती को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आज लिया गया एक छोटा-सा जल संरक्षण का निर्णय आने वाले वर्षों में करोड़ों किसानों के जीवन और देश की खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित बना सकता है।

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