सामान्य वर्षा से केवल 5% बदलाव पर भी 810 किसान आत्महत्याएं: 2023 की IIED रिपोर्ट में जलवायु संकट और कृषि संकट का संबंध उजागर
पांच राज्यों के अध्ययन में पाया गया कि कम वर्षा वाले वर्षों में किसान आत्महत्याओं के मामले बढ़े, जबकि मनरेगा रोजगार ने राहत देने में भूमिका निभाई
27 मई 2026, नई दिल्ली: सामान्य वर्षा से केवल 5% बदलाव पर भी 810 किसान आत्महत्याएं: 2023 की IIED रिपोर्ट में जलवायु संकट और कृषि संकट का संबंध उजागर – अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट (IIED) की 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भारत में किसान आत्महत्याओं और वर्षा की कमी के बीच गहरा संबंध सामने आया है। अध्ययन के अनुसार, सामान्य से कम वर्षा वाले वर्षों में किसान आत्महत्याओं के मामलों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव बना रहा है।
इस अध्ययन में वर्ष 2014-15 से 2020-21 के बीच छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। ये वे राज्य हैं जहां लंबे समय से कृषि संकट और किसान आत्महत्याएं चिंता का विषय रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिन वर्षों में सामान्य वर्षा से लगभग 5% तक कमी दर्ज हुई, उन वर्षों में औसतन 810 किसानों ने आत्महत्या की।
रिग्रेशन मॉडलिंग के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि यदि वर्षा में कमी बढ़कर 25% तक पहुंचती है, तो किसान आत्महत्याओं की संख्या बढ़कर लगभग 1,188 तक जा सकती है।
सूखा और कृषि संकट का बढ़ता संबंध
अध्ययन में पाया गया कि जिन वर्षों में वर्षा सामान्य से कम रही, उन वर्षों में आत्महत्याओं के मामले लगातार अधिक रहे। शोधकर्ताओं ने वर्षा परिवर्तन और किसान आत्महत्याओं के बीच संबंध समझने के लिए पियर्सन कोरिलेशन कोएफिशिएंट का उपयोग किया।
पांचों राज्यों में यह कोएफिशिएंट नकारात्मक पाया गया — छत्तीसगढ़ (-0.409), कर्नाटक (-0.665), मध्य प्रदेश (-0.439), महाराष्ट्र (-0.524) और तेलंगाना (-0.892)। इसका अर्थ है कि जैसे-जैसे वर्षा में कमी बढ़ी, किसान आत्महत्याओं के मामले भी बढ़ते गए।
भारत का बड़ा कृषि क्षेत्र आज भी मानसून आधारित खेती पर निर्भर है। विशेषकर वर्षा आधारित क्षेत्रों में किसानों के पास सिंचाई के सीमित साधन हैं और वे सीधे जलवायु जोखिमों से प्रभावित होते हैं। अनियमित मानसून, लंबे सूखे दौर और कम बारिश जैसी स्थितियां फसल उत्पादन, आय और कर्ज चुकाने की क्षमता पर सीधा असर डालती हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में सूखे की आवृत्ति और उसका दायरा दोनों बढ़े हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि 1998 से 2017 के बीच जलवायु प्रभावों के कारण भारत की जीडीपी में 2% से 5% तक की कमी आई।
आर्थिक दबाव और बाजार जोखिम भी बड़ी वजह
Ritu Bharadwaj ने कहा कि जलवायु परिवर्तन खेती को लगातार अधिक जोखिमपूर्ण बना रहा है।
उन्होंने कहा, “जलवायु संकट अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है। किसान इस संकट की सबसे पहली मार झेल रहे हैं क्योंकि उनकी आय सीधे मौसम पर निर्भर करती है।”
उन्होंने आगे कहा कि जलवायु परिवर्तन खेती को घाटे और अनिश्चितता वाला व्यवसाय बना रहा है, जिससे किसानों में मानसिक और आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, किसान आत्महत्याओं के पीछे केवल मौसम ही नहीं बल्कि कई सामाजिक और आर्थिक कारण भी जिम्मेदार हैं। नकदी फसलों पर निर्भरता, बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव, बढ़ता कर्ज, सीमित बचत और सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव किसानों की मुश्किलें बढ़ाता है।
विशेष रूप से कपास जैसी नकदी फसलों की खेती करने वाले किसान उत्पादन और बाजार दोनों तरह के जोखिमों से अधिक प्रभावित होते हैं।
मनरेगा रोजगार से आत्महत्या के मामलों में कमी
अध्ययन में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की भूमिका का भी विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन राज्यों में मनरेगा के तहत रोजगार के अवसर बढ़े, वहां किसान आत्महत्याओं के मामलों में कमी दर्ज हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, जब मनरेगा के तहत रोजगार 5 करोड़ कार्यदिवस से बढ़कर 15 करोड़ कार्यदिवस हुआ, तब किसान आत्महत्याओं की अनुमानित संख्या लगभग 1,800 से घटकर 398 रह गई।
मनरेगा रोजगार और किसान आत्महत्या के बीच भी पांचों राज्यों में नकारात्मक संबंध पाया गया — छत्तीसगढ़ (-0.830), कर्नाटक (-0.677), मध्य प्रदेश (-0.688), महाराष्ट्र (-0.691) और तेलंगाना (-0.892)।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्रामीण रोजगार योजनाएं जलवायु और आर्थिक संकट के दौरान किसानों के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकती हैं।
केवल राहत नहीं, दीर्घकालिक नीति की जरूरत
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सरकारों को केवल फसल नुकसान राहत तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को मजबूत करने, कृषि बीमा का दायरा बढ़ाने और किसानों के लिए बाजार आधारित जोखिम प्रबंधन व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि किसानों को फसल बोने और निवेश से पहले संभावित बाजार मूल्य की बेहतर जानकारी मिलनी चाहिए, ताकि वे कर्ज और लागत से जुड़े जोखिमों को समझ सकें।
इसके अलावा, ग्रामीण भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है, क्योंकि आर्थिक संकट का मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ रहा है।
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