किसानों की सफलता की कहानी (Farmer Success Story)

पहाड़ी बंजर भूमि पर मिश्रित जैविक खेती का मिशन

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सुशील का सराहनीय प्रयास

  • दिलीप दसौंधी, खरगोन

30 जनवरी 2023, पहाड़ी बंजर भूमि पर मिश्रित जैविक खेती का मिशनमहेश्वर तहसील में चोली-बबलाई मार्ग पर स्थित पहाड़ी इन दिनों आकर्षण का केंद्र बनी हुई है, क्योंकि यहाँ एक मिशन के तहत मूलत: राजस्थान निवासी श्री सुशील अजमेरा (61) द्वारा पहाड़ी की 25 बीघा ज़मीन पर मिश्रित जैविक खेती की जा रही है। यहाँ जैविक तरीके से सब्जियां उगाई जाती है। इस पहाड़ी पर खिले विभिन्न फूल और उगे फलदार वृक्षों का मनोरम दृश्य मन को सुकून देता है।

सब्जी,फलदार पौधे और फूलों की बहार

वाणिज्य और विधि स्नातक श्री अजमेरा ने कृषक जगत को बताया कि 60 वर्ष की आयु के बाद जैविक खेती को एक मिशन के रूप में करने का प्रण लिया था। यह उसीकी फलश्रुति है। इस पहाड़ी की करीब 70 त्न ज़मीन पथरीली है और मात्र 30 प्रतिशत मिट्टी है। नीचे तराई में किए गए बोर से टैंकर में पानी भरकर ऊपर टैंक में डाला जाता है और फिर ड्रिप से सिंचाई की जाती है। मल्चिंग भी लगाई है। इस जंगल खेती में कई प्रकार की सब्जियां देखने को मिलेगी जिसमें हरी और लाल भिंडी, 6 फीट लम्बी लौकी, गोल लौकी, सामान्य और सफ़ेद गिलकी, देसी, हरा और चेरी टमाटर, सामान्य और गहरा हरा करेला, हरा/काला बैंगन, हरी मिर्च, टैंसी, ग्वारफली के अलावा अम्बाड़ी की लाल/हरी भाजी के साथ ही धनिया, गाजर, मूली, पालक, मेथी, हल्दी, चुकंदर और स्ट्राबेरी भी है। वहीं फलदार वृक्षों में केला, अमरुद के 100-100 पौधों  के अलावा सुरजना, अगस्त्य और अरंडी के 1000 पौधे लगाएं हैं। पहाड़ी वन क्षेत्र के जंगली पौधे भी लगाए गए हैं। इसके साथ ही सरकारी नर्सरी महेश्वर से लेकर लगाए  गए पौधे नीम, गूलर, पीपल, बरगद, बिल्व, अमलतास, आंवला, जामुन, कदम्ब, मीठा नीम, पारिजात और तुलसी भी हैं। जबकि फूलों में  गेंदा, चमेली, चम्पा, गुलाब, मेहँदी, कनेर तथा  विशेष रूप से सिंदूर, अर्जुन, शीशम, बांस, करंज, खमैर और गूगल के पौधे भी लगाए गए  हैं।

गौ वंश की रक्षा एवं विस्तार

श्री अजमेरा ने बताया कि आज़ादी बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय महामंत्री रहने के दौरान हैदराबाद में राष्ट्रीय चिंतन शिविरों में देश के विभिन्न विद्वानों के साथ आयुर्वेद, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, संस्कार, मानवता आदि विषयों पर हुए गंभीर वार्तालाप ने इस कार्य हेतु प्रेरित किया। 2000-2016  के दौरान तेलंगाना में सबसे पहले गौ वंश आधारित खेती को शुरू किया। गौ वंश की रक्षा एवं विस्तार में रूचि रखने वाले वहां के संपन्न और सक्षम सेवकों को 150 गौ वंश उपहार में दिया था, जिसमें बलिष्ठ सांड भी शामिल थे। इनका मानना है कि गायों की सच्ची सेवा किसान ही कर सकता है। इस पहाड़ी पर भी कच्छ की 32 काकरेज, गाय, बछड़े और सांड का गौ वंश रखा गया है।

प्रोफेशन नहीं मिशन

श्री अजमेरा ने कहा कि जैविक खेती प्रोफेशन नहीं, बल्कि मिशन है। जिसमें जैविक सब्जियों को सामान्य दरों पर बेचना चाहते हैं, क्योंकि सामान्यत: किसानों को सब्जियों का थोक में भाव में कम मिलता है, जबकि फुटकर में जैविक सब्जियां बहुत महंगी  बिकती हैं । सब्जियां  पूर्णत: जैविक हैं। उर्वरक और कीटनाशक नहीं डालते हैं। इससे लागत  कम आती है। हालाँकि  चारानाशक  का इस्तेमाल नहीं करने से निंदाई का खर्च बढ़ जाता है। पौधों को 40 प्रतिशत पोषक तत्व जीवामृत से मिल जाते हैं। ब्रम्हास्त्र ,अग्निअस्त्र और फसल चक्र के  प्रयोग से अच्छे नतीज़े  मिले हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआत में उपभोक्ताओं को जैविक सब्जियों की ओर उन्मुख करने के लिए घर-घर जाकर नि:शुल्क सब्जियां वितरित की। लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिली और सब्जियों के स्वाद की सराहना हुई। इससे प्रेरित होकर वेजिटेबल ऑन व्हील्स के तहत वैन में ताज़ी जैविक सब्जियां इंदौर की चुनिंदा कॉलोनियों में निर्धारित ग्राहकों की मांग पर हर सप्ताह भेजी जाती है। अधिक प्रतिसाद मिलने पर ऐसी 10 वैन तैयार की जाएंगी।  इस सेवा प्रकल्प में सहयोग के लिए कुछ दैनिक मजदूर हैं, वहीं कृषि कार्य के लिए 20-25  लोगों को रोजग़ार भी मिल रहा है।

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